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ज़िंदगी ओ ज़िंदगी

सेवा आयोग: सीबीआई लाने वाले युवाओं के सपने भस्‍म

: जिसने सच खोला, उसे पांच हजारी अपराधी बनाया पुलिस ने : लोक सेवा आयोग की सीबीआई जांच मूल रूप से 2019 आम चुनाव पर निर्भर करेगी : जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती तब तक कई छात्र ओवरएज हो जाएंगे और इनका अमूल्य समय बर्बाद होता रहेगा :

अशोक पांडेय

इलाहाबाद : ( गतांक से आगे ) डॉ अनिल यादव के कार्यकाल का सभी परिणाम विवादित रहा। तीन हजार  से अधिक मुकदमे आयोग के खिलाफ माननीय उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में चलें चले। जरा सोचिए! क्या प्रतियोगी छात्र मुकदमा लड़ने आता है?

उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के इतिहास में 29 मार्च 2015 पीसीएस 2015 प्रारंभिक परीक्षा का पेपर लीक होता है । छात्रों के उग्र आंदोलन के बाद प्रथम पाली का परीक्षा निरस्त किया गया और छात्रों के साथ गंदा मजाक किया गया।यह सिलसिला यहीं नहीं रुकता है। समीक्षा अधिकारी 2016 का पेपर भी लीक होता है जिसका जांच आज भी लंबित है और अभ्यर्थियों के अमूल्य समय को बर्बाद किया जा रहा है।यह सब एक सुनियोजित तरीके से होता रहा और भ्रष्टाचार का सिलसिला बढ़ता गया। हमारे नौजवानों के भविष्य के साथ खिलवाड़ होता रहा सरकारें चुप थी और नौजवान परेशान था।

लोकतंत्र को यदि हम उत्तर प्रदेश के परिपेक्ष में देखें,तो यहां लोकतंत्र में लोक खत्म हो गया था। और तंत्र ही बचा था।इसका तत्कालीन उदाहरण उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग में व्याप्त भ्रष्टाचार के विरुद्ध में उतरे लाखों प्रतियोगी छात्रों पर 48 बार लाठीचार्ज 7 बार फायरिंग वाटर कैनन,आंसू गैस के गोले छोड़े गए । प्रतियोगी छात्रों को जेल भेजा गया बात यहीं नहीं खत्म होती है। कई बार तो  छात्रों पर संगीन धाराएं लगाई गई। जैसे 7A /CLA गुंडा एक्ट। यहां तक कि कुछ छात्रों को 5000 का इनामी अपराधी तक घोषित कर दिया गया था। इस बात से उस समय में लोकतंत्र का अनुमान लगाया जा सकता है । लोक सेवा आयोग के भ्रष्टाचार को करीब से समझने और लिखने वाले इलाहाबाद के वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश मिश्रा कहते हैं, आयोग में त्रिस्तरीय आरक्षण व्यवस्था जब लागू हुआ तो छात्रों ने इसके खिलाफ आंदोलन किया बाद में आयोग ने इसे बदला तो भ्रष्टाचार खुलकर सामने आया।

उस समय  इलाहाबाद के SP सिटी रहे शैलेश यादव ने आंदोलन को कुचलने का पूरा प्रयास किया लेकिन असफल रहे।  आयोग पर लगातार लिखने वाले इलाहाबाद के वरिष्ठ संवाददाता विकास गुप्ता जी कहते हैं कि अनिल यादव की नियुक्ति ही गलत तरीके से हुई थी। जब एक  डिग्री कॉलेज का प्रधानाचार्य को लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष  चुना गया तो  लोगों को सोचना चाहिए । वहीं जब डॉ अनिल यादव भर्तियों में खुलकर भ्रष्टाचार करने लगे तो लोगों की नींद टूटी लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। आगे विकास गुप्ता जी ने सीबीआई के परिपेक्ष में कहा कि यदि आम चुनाव के बाद भी सीबीआई ऐसे काम करती रही तो बेहतर परिणाम की उम्मीद है ।

आयोग के खिलाफ लड़ने वाले प्रतियोगियों से कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाले देश के कई अफसर, सामाजिक कार्यकर्ता और राजनेता भी शामिल थे। उनमें से एक आईजी अमिताभ ठाकुर कहते हैं कि अनिल यादव के कार्यकाल में  भ्रष्टाचार हुआ था। लेकिन अब सीबीआई की जांच शुरू होने से एक बेहतर परिणाम की उम्मीद है। वहीं छात्रों के मार्गदर्शक के रुप में कार्य करने वाले पूर्व मंडलायुक्त बादल चटर्जी जो रोड से लेकर कोर्ट तक छात्रों के हित लिए लड़ते रहे। वह कहते हैं कि जो लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष या सदस्य बनाये जाते उनको ईमानदार कर्मठ और जातिवाद से ऊपर उठा होना चाहिए। किसी विद्वान को ही लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष बनाया जाना चाहिए जिसके अंदर दृढ़ इच्छाशक्ति और सुशासन स्थापित करने क्षमता हो।

खैर निजाम बदला सरकार बदली और नौजवानों को उम्मीद की किरण दिखाई दी नई सरकार से। चुनाव के समय भाजपा के बड़े-बड़े नेताओं ने वादा किया था कि लोक सेवा आयोग की सीबीआई जांच जरूर होगी अगर सरकार बनेगी तो अंत में बीजेपी सरकार प्रचंड बहुमत से उत्तर प्रदेश में आई।सरकार ने अपने वादे को पूरा करते हुए 31 जुलाई 2017 को लोक सेवा आयोग की सीबीआई जांच की सिफारिश केंद्र सरकार से की और केंद्र सरकार ने 24 नवंबर 2017 को इसे स्वीकृति प्रदान कर दिया। यह जांच 1 अप्रैल 2012 से 31 मार्च 2017 तक की भर्तियों के लिए किया गया है। सीबीआई ने 5 मई 2018 को पहला FIR दर्ज कराया यह कहते हुए कि हमारे पास व्यापक रूप से गड़बड़ियों के साक्ष्य हैं। इसमे सरकारी व गैर सरकारी व्यक्तियों की संलिप्तता पाई गयी है। सूत्रों की माने तो सीबीआई जांच टीम ने 600 से अधिक परीक्षाओं के परिणाम की प्राथमिकता तय की है। प्रमुखता से पीसीएस 2015 समीक्षा 2014 लोअर पीसीएस  2013 तथा पीसीएस 2011 में अधिक अनियमितता दिखाई दे रहा है। लोक सेवा आयोग की  व्यापक छानबीन कर सभी जरूरी दस्तावेजों को सीज कर दिया गया है। जल्द ही गिरफ्तारी भी की जा सकती है।

यदि वर्तमान स्थिति को देखें तो निसंदेह छात्रों में उत्साह दिखाई दे रहा है। लेकिन साथ में निराशा भी है क्योंकि नौजवानों का अमूल्य समय जो बर्बाद हो रहा है। पहले तो प्रतियोगी भ्रष्टाचार के भेंट चढ़ गए।और अब जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती तब तक कई छात्र ओवरएज हो जाएंगे और इनका अमूल्य समय बर्बाद होता रहेगा। यह सोचनीय विषय है ?जानकारों का मानना है कि अगर सीबीआई जांच सत्ता के दबाव से हटकर हुआ तो तत्कालीन सरकार तक जाएगी। लोक सेवा आयोग की सीबीआई जांच मूल रूप से 2019 आम चुनाव पर निर्भर करेगी । परिणाम क्या होगा ?

इस प्रकार यदि हम उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग में देखें तो विचित्र स्थिति उत्पन्न हो गई है। वस्तुतः स्वतंत्रता के इन वर्षों में लोगों में जो चेतना जागृत हुई है उसका भी राजनेताओं ने गलत लाभ उठाया है।अतः नौजवानों की चेतना संकीर्ण चेतना बनकर  क्षेत्रवाद, जातिवाद और सांप्रदायिकता जैसी समस्याओं के रूप में देखने को मिलती है ।इस तरह हम संक्षेप में भारतीय समाज के परिदृश्य ओर दृष्टि डालें तो संविधान के आदर्शों जैसे स्वतंत्रता, समानता, भ्रातृत्व, सामाजिक न्याय, पंथनिरपेक्षता और कानून के शासन से काफी दूर दिखता है ।यही नहीं नक्सलवाद, सांप्रदायिकता, क्षेत्रवाद और जातिवाद की शक्तियां नकारात्मक रूप में उभरी है। जो भारत में एकता और अखंडता के प्रयासों को निरंतर कमजोर कर रही हैं ।

सेवा आयोग: 40 हजार सीधी भर्तियों में खुली बेईमानी

: राजनीतिक रहनुमाओं के इशारों पर डॉ अनिल यादव ने खड़ा किया भ्रष्टाचार का साम्राज्य : लोअर पीसीएस 2008-2009 के अंकपत्र बहुत दिनों तक जारी नहीं किए गए : आरटीआई से सूचना मांगने पर आयोग का एक ही राग था कि सूचना अदेय है :

अशोक पांडेय

इलाहाबाद : अखिलेश सरकार में बेरोजगारों को राहत दिलाने के अनेक घोषणाएं की गयी थीं। लेकिन देश में शायद ही कोई ऐसी सरकार रही होगी, जिसने यूपी के बेरोजगार युवाओं के सपनों का सामूहिक नरमेध नहीं किया हो। और यह भी किसी सोची-समझी साजिश के तहत किया गया, जिसमें सरकार और प्रशासन के आला अफसर भी शामिल थे। नजीर रही उप्र लोकसेवा आयोग की कार्यशैली, जहां जातीय और जेबों के बल पर नौकरी बाकायदा बेची-थमायी गयीं। बाकायदा गिरोह की तरह सपा सरकार ने अपने चहेतों को आयोग का मुखिया बनाया, जिसने बेरोजगारों के मुंह पर खूब तमाचे मारे। इसका विरोध करने वालों को प्रताडि़त किया गया, ताकि वे विचलित हो जाएं। लेकिन जो अडिग रहे, उन्‍हें आपराधिक मामलों में फंसाया गया। और आखिरकार वे ओवरएज भी हो गये।

हमारे संविधान के भाग -14 के अनुच्छेद 315- 323 तक लोक सेवा आयोग के बारे में उपबंध है। भारतीय शासन अधिनियम 1935 के तहत 1 अप्रैल 1937 को उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग का गठन किया गया। जिसका उद्देश्य था कि योग्य ईमानदार ,कर्मठ ,प्रशासनिक अधिकारियों का चयन करना, किंतु विगत वर्षों से लोक सेवा आयोग में खुलकर भ्रष्टाचार हुआ है। इस भ्रष्टाचार के जनक रहे डॉक्टर अनिल यादव की नियुक्ति 1 अप्रैल 2013 को तत्कालीन सरकार ने सभी नियमों और कानूनों को ताख  पर रखकर किया था। डॉ अनिल यादव की नियुक्ति 83 योग्य उम्मीदवारों मे अंतिम मे थे । जिनमें वैज्ञानिक, आईएए , आईपीएस, आईएफएस, मेजर आदि को दरकिनार कर डॉ अनिल यादव की नियुक्ति मात्र इसलिए की गई थी ताकि भ्रष्टाचार का सम्राज्य खड़ा किया जा सके। और अपने चहेतों को गलत तरीके से नियुक्ति दी जा सके।

ज्ञातव्य है कि डॉ अनिल यादव के खिलाफ विभिन्न जिलों में अनेक संगीन आरोपों में मुकदमे दर्ज हैं। जिसमें जनपद आगरा के न्यू कैंट थाने में केस संख्या 553/85 धारा तीन गुंडा एक्ट 861/91 धारा 506 आईपीसी थाना शाहगंज में केस संख्या 98/83, 235 /83, 413/ 83 ,553/83 थाना हरीपर्वत में केस संख्या 13084 एवं थाना लोहा मंडी में केस संख्या 464 /84 के अंतर्गत अनेक को संगीन आरोपों में मुकदमे दर्ज हैं । खैर बाद में माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 14 अक्टूबर 2015 को अनिल यादव की नियुक्ति को रद्द कर दिया। वैसे लोक सेवा आयोग में आयोग्यों की भरमार थी और अभी भी है। जैसे फरमान अली, मेजर संजय यादव तत्कालीन सचिव जिनको उच्च न्यायालय ने अयोग्य घोषित किया था।

डॉ अनिल यादव के भ्रष्टाचार के कुछ मिसाल देखिए। उत्तरप्रदेश लोक सेवा आयोग ने अपनी SDM के पदों पर 3 भर्तियों में 86 में से 56 पदों पर एक ही जाति के अभ्यर्थियों को चयन कर लिया। पीसीएस 2011 में 389 में से 72 एक ही जाति के व्यक्ति चयनित कर लिए गए। साक्षात्कार में पिछड़े वर्ग के 111 पदों के लिए एक ही जाति के विशेष 54 अभ्यर्थी बुलाए गए और इनमें से 45 का चयन कर लिया गया । जाति विशेष जाति के ही 27 अभ्यर्थी सामान्य वर्ग में भी चयनित कर दिया गया । डॉ अनिल यादव के निर्देश पर सबसे पहले तो पीसीएस परीक्षा में त्रिस्तरीय आरक्षण व्यवस्था लागू कर दी गई लेकिन जब इस पर विवाद हुआ तो यह बदल दिया गया। इस बदलाव के दौरान ही सारी पोल खुल ही गई। इस बदलाव से मुख्य परीक्षा का परिणाम संशोधित करना पड़ा और 176 चयनित अभ्यर्थी बाहर हो गए। जिसमें ज्यादातर एक ही जाति के थे।

यह सिलसिला यहीं रुका नही बल्कि जारी रहा, जब कृषि विभाग में तकनीकी सहायकों के 6628 पदों की भी भर्ती हुई। आरोप यह है कि विज्ञापन जारी होने के बाद अन्य वर्गों की सीटें कम करके उन्हें पिछड़ी वर्ग में शामिल कर दिया गया। विज्ञापन में सामान्य के 3616 अनुसूचित जाति के 2221 अनुसूचित जनजाति के 235 और OBC के 566 पद बताए गए ।लेकिन बाद में ओबीसी के लिए आरक्षित पदों की संख्या 2029 कर दी गई। इससे हुआ यह कि सामान्य वर्ग के पद 2515 और अनुसूचित जाति के 1882 पद रह गए। अंतिम परिणाम जब आए तो ओवरलैपिंग करके ओबीसी के सफल अभ्यर्थियों की संख्या बढ़ाकर 3116 हो गई। इसी परिणाम को माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने संशोधित करने का आदेश दिया। लेकिन आयोग सुप्रीम कोर्ट जाकर स्टे ले लिया यह मामला आज भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।

लोअर पीसीएस 2008-2009 के अंकपत्र बहुत दिनों तक जारी नहीं किए गए क्योंकि डॉ अनिल यादव ने अपने चहेतों को 50 में 35 से 38 नंबर तक साक्षात्कार में दे दिया। अगर अंक पत्र जारी होता तो आयोग के अध्यक्ष का एक और काला कारनामा उजागर होना तय था। पीसीएस -2013 से प्रारंभिक परीक्षा में परीक्षा केंद्र आवंटन की नई प्रणाली लागू की गई जिसमें मनमाने ढंग से केंद्रों का आवंटन कराया गया जिससे अपने चहेतों को लाभ पहुंचाया जा सके।

डॉ अनिल यादव के इशारों पर हर प्रारंभिक परीक्षा मे॑ 15 से 20 प्रश्नों के उत्तर जानबूझकर गलत रखे जाते थे। जिससे वह अपने लोगों को अनुचित लाभ पहुंचा सकें  खैर इसका अनुसरण आज भी यूपीपीएससी के चेयरमैन कर रहे हैं । नजीर तत्कालीन उदाहरण पीसीएस 2017 है ।

पारदर्शिता के नाम से  जाने जाना वाला उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग इसे डॉ अनिल यादव ने 22 अप्रैल 2015 को प्रस्ताव के तहत अपारदर्शी बना दिया। अब चयनित अभ्यर्थियों के नाम व पता नहीं दिया जाएगा केवल अनुक्रमांक व रजिस्ट्रेशन के आधार पर परिणाम घोषित किए जाएंगे । इसके तहत अब खुलकर भ्रष्टाचार किया गया।

डॉ अनिल यादव ने तो आरटीआई कानून को भी मजाक बनाकर रख दिया था जब 2 प्रतियोगियों ने एक ही सत्र की मुख्य परीक्षाओं की कॉपी आरटीआई के माध्यम से देखनी चाही तो जहां एक को बताया गया कि कपिया जला दी गई वही दूसरे को उसकी कॉपी दिखा दिया गया । आरटीआई के माध्यम से कोई सूचना मांगता तो आयोग के पास एक ही सूचना हमेशा होती कि यह सूचना अदेय है । यदि बहुत कोशिश के बाद दी जाती तो वह अस्पष्ट और दिग्भ्रमित होता था । खैर सिलसिला आज भी जारी है।

प्रतियोगी छात्रों का आरोप है कि करीब 40 हजार सीधी भर्तियों में खुलकर भ्रष्टाचार हुआ।और आरक्षण के नियमों का खुलेआम उल्लंघन हुआ। सीधी भर्ती के ऐसे  परिणामों को आयोग कुछ ही घंटों में अपनी वेबसाइट से हटा देता था ताकि लोगों को पता ना चल सके।

इनके कार्यकाल के अंतर्गत मुख्य परीक्षा के प्राप्तांकों के स्कैनिंग और मॉडरेट के आड़ में एक खास जाति के अभ्यर्थियों को अप्रत्याशित तौर पर फायदा पहुंचाया गया। वर्तमान समय में सीबीआई ने इस बात को अपने FIR में स्वीकार किया है। (क्रमश:)

जिला अस्पताल में दलाली, पत्रकार पर मुकदमा

: अस्पताल में चल रहा है पत्रकारों में लपड़-झपड़, मामला कोतवाली पहुंचा : मनबढ़ अस्पतालकर्मियों ने नगर मजिस्ट्रेट पर भी मढ़े थे फ़र्ज़ी आरोप : जिला अस्पताल में चलती है चन्द पत्रकारों की सल्तनत :

मेरीबिटिया संवाददाता

बहराइच : भयादोहन के अभिप्राय बने एक कथित पत्रकार पर रंगदारी वसूलने के मामले में अभियोग दर्ज हो गया है। शहर के कोतवाली नगर अन्तर्गत निवासी अमित सिंह की तहरीर पर पत्रकार फराज अंसारी के विरूद्ध धारा 386 पंजीकृत है। मुकदमा वादी अमित सिंह ने अपने तहरीर में उल्लेख किया कि अपने को पत्रकार बताने वाले फराज अहमद अंसारी को जब प्रार्थी दिनांक 28 मई, 18 सायं को जब जिला अस्पताल के पीछे खड़ा था तभी फराज अहमद अंसारी अपने पूरे गैंग के साथ आया और कट्टा निकालकर जान से मारने के नियति से धमकाते हुए पचास हजार का गुण्डा टैक्स मांगा और धमकी दिया कि पैसा नहीं दिया तो जान से मार देगे। पीडि़त किसी तरह जान बचाकर भागा।

अर्जी के मुताबिक पीडि़त के अनुसार उसने घटना की सूचना नगर कोतवाली में मोबाइल से सूचना दिया। नगर कोतवाली पुलिस द्वारा बताया गया कि आप थाने आकर लिखित सूचना दे। पीडि़त द्वारा थाने में दिए गए तहरीर में उल्लेख किया है कि फराज अंसारी उसकी हत्या कर सकता है। पीडि़त ने पुलिस से प्राण रक्षा की गुहार लगाई है। पीडि़त की तहरीर पर कोतवाली नगर पुलिस ने फराज अंसारी के विरूद्ध संज्ञीय अपराध कारित करने का अभियोग पंजीकृत किया। प्रभारी निरीक्षक ने बताया कि मुकदमा दर्ज हो गया है। पुलिस विवेचना कर रही है। गुणदोष पर मुकदमें को निष्पादित किया जायेगा।

एक अख़बार ने इस मामले पर खबर छपी है कि इस मुकदमे के दर्ज होने पर दीवाली जैसा जश्न रहा जिला चिकित्सालय में। कथित पत्रकार फराज अंहमद अंसारी के विरूद्ध अभियोग दर्ज होने के बाद जिला चिकित्सालय के कर्मियों में खासा उत्साह देखने को मिला। चिकित्साकर्मियों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि फराज अहमद अंसारी पत्रकारिता की आड़ में चिकित्सा कर्मियों का भयादोहन करता है। विशेषकर महिला स्वास्थ्यकर्मियों ने बताया कि फराज अहदम अंसारी के विरूद्ध पंजीकृत मुकदमा उनके लिए दीवाली जैसे पावन जैसा उत्सव है। विशेषकर महिला चिकित्सा कर्मियों कहना है कि फराज अंसारी पत्रकारिता के नाम पर उन पर रौब गांठता था। देर रात तक अस्पताल में विचरण करता था।

आपको बता दें कि जिला अस्पताल में चन्द पत्रकारों की सल्तनत चलती है। यह लोग निर्माण से लेकर स्तरहीन दवाएं खपाने की साजिश में लिप्त हैं। खुद को पत्रकार के तौर पर घोषित अधिकांश ऐसे पत्रकारों की छवि किसी शातिर अपराधी से कम नहीं है।

उधर पत्रकार फ़राज़ अंसारी को झूठे मुकदमों में फंसाकर बदनाम करने की साजिश के विरोध में एक बैठक आयोजित कर पत्रकार अपनी रणनीति तय करने जा रहे हैं। जिसमे सभी पत्रकार इस मामले पर आगे की कार्यवाही की जा सके।

कप्‍तान की प्रेसकांफ्रेंस में वकीलों-पत्रकारों में झंझट

: प्रेस-कांफ्रेंस में जुट गये वकील, पत्रकारों ने ऐतराज किया तो हुआ हंगामा : दलाली को लेकर एक-दूसरे ने खूब की परस्‍पर आरोपों की बौछार, और गालियां बेहिसाब : इन्‍हीं दोनों गुटों ने ही पुराने कप्‍तान राकेश शंकर के इशारे पर बुनी थी साजिशें :

मेरी बिटिया संवाददाता

देवरिया : 50 हजार का इनामी जिला पंचायत अध्यक्ष के सम्बन्ध में एसपी रोहन पी कनय द्वारा आयोजित प्रेस वार्ता के अंत मे पत्रकरो और वकीलों में जमकर जुबानी तीर तलवारें चली। पत्रकरो का रोष प्रेस वार्ता में आये दो वकीलों से था जो पत्रकारों का काम धाम छिनने में लगे थे। एसपी के प्रेस वार्ता में एक वकील ने सवाल पूछना शुरू किया ही कि एक पत्रकार ने इस पर खेद प्रकट किया की प्रेस वार्ता पत्रकारो के लिए हैं। जिस पर वकील प्रीतम मिश्रा आगबुला हो गया और प्रेस वार्ता स्थल पर हुआँ हुआँ शुरू होने लगा।जिसको देख एसपी ने खुद पत्रकारों को शांत रहने का इशारा किया।प्रेस वार्ता खतम होते ही वहां बंगाल का काला जादू नजर आने लगा।बहसबाजी तेज होने लगी इसी बीच दूसरे वकील विनय श्रीवास्तव ने पत्रकारों पर दलाली से सम्बंधित टिप्पणी कर दी। ऐसा सुनते ही पत्रकारिता को कर्म समझने वाले कुछ पत्रकारों ने वकीलों को गलियों से नवाजा।वकीलों की जमकर जुबानी जुताई की गई।

फिर क्या था एक वरिष्ठ पत्रकार वो दिन भी याद दिला दिया जब मतगणना के दौरान वरिष्ठ पत्रकार चंद्र प्रकाश पांडेय का लाठीचार्ज में पुलिस द्वारा मार कर सर फोड़ने तथा पॉकेट से पैसा निकालने की घटना के बाद पत्रकारों में आक्रोश व्याप्त हो गया था जबकि पुलिस अधीक्षक द्वारा आयोजित रात्रि भोज में जाने को लेकर वाट्सऐप पर चलाए गए वाद विवाद मैसेज और डिनर में खाना ना खा पाने से अपमानित 24 ब्रांडेड एवम ओरिजनल पत्रकारों ने कुछ अज्ञात पत्रकारों पर प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी। दर्ज प्राथमिकी के बाद कोतवाली पुलिस जो पुलिस अधीक्षक के निर्देशन में पत्रकारों को विरोध करने से रोकने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाने में लगी थी। जिस हथकंडे में पुलिस द्वारा बेकसूर पत्रकारों के घर दबिश देकर दुर्व्यवहार करना भी शामिल था। परंतु पीड़ित पत्रकार पक्ष ने अपना रास्ता नहीं बदला कुछ दलाल प्रवृत्ति के पत्रकार पुलिस अधीक्षक के खास बनने की चाह में अपने ही वर्ग का विरोध करना शुरू कर दिया।

आपको बताते चलें कि विगत दिनों पुलिस अधीक्षक का स्थानांतरण होने के बाद नए पुलिस अधीक्षक ने जब कार्यभार संभाला तो पत्रकारों के विरोध करने वाला ग्रुप उन का खासमखास बनने की चाह रखते हुए पुनः पुरानी प्रवृत्ति को जीवित करना चाहा, परंतु नजारा ही दिनांक 27 मई को बदल गया जब पुलिस अधीक्षक ने जिला पंचायत अध्यक्ष रामप्रवेश यादव की गिरफ्तारी पर प्रेस वार्ता का आयोजन किया तो उस पत्रकार वार्ता के दौरान उपस्थित वकील को देख पत्रकारों ने जनपद के सबसे बड़े दलाल समझकर टीका टिप्पणी करना शुरु की। उसी बीच वकील के साथ आए हुए एक व्यक्ति ने 1 दिसंबर की घटना का याद दिलाते हुए सरेआम भोज में जाने वाले पत्रकारों को दर्ज प्राथमिकी में वादी बने 24 पत्रकारों को सरेआम दलाल कहना जब शुरू कर दिया। इस पर ईमानदार छवि के पत्रकारों के सम्मान को ठेस पहुंची जिस का विरोध ईमानदार छवि के पत्रकारों ने तो किया वही 24 पत्रकार जो प्राथमिकी दर्ज करा कर दलाल साबित हुए मुंह छुपाते हुए भाग खड़े हुए एक कहावत है कि "आसमान पर थूकने तो अपने ही ऊपर छींटे पड़ेंगे " आखिर पड़ ही गया।

(एक पत्रकार द्वारा भेजे गये पत्र के अनुसार )

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