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ज़िंदगी ओ ज़िंदगी

एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर यानी पिघलना चट्टानों का

: वो दिन लद गए जब पति-पत्नी एक-दूसरे के लिए मरने-जीने को तैयार रहते थे : प्रोफेशनल लाइफ के साथ पर्सनल लाइफ भी प्रैक्टिकल बना दिया लोगों ने : एक-दूसरे के इमोशन्स और फिलिंग से दूर : पत्नी की प्रेग्नेंसी के चलते सेक्सुअल डिज़ायर पूरी न होने से पुरुषों के एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर की संभावना बढ़ जाती है :

मोनिका जौहरी

मुम्‍बई : बदलती लाइफस्टाइल, बढ़ती आकांक्षाएं, उम्मीदें या विश्‍वास की कमज़ोर होती डोर… वजह चाहे जो भी हो, मगर ये सच है कि पिछले एक-डेढ़ दशक से हमारे देश में एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर के मामले बढ़े हैं.आख़िर क्यों लोगों को अपने घर के बाहर प्यार तलाशना पड़ रहा है, क्यों शादी का रिश्ता कमज़ोर होता जा रहा है ? आइये जानते है

दो तरह के होते हैं एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर्स :-विशेषज्ञों की मानें तो एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर ख़ासकर दो तरह के होते हैं :-

पहला सेक्सुअल और दूसरा इमोशनल. सेक्सुअल एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर में दो ऐसे लोग क़रीब आते हैं, जो अपने-अपने पार्टनर से संतुष्ट नहीं होते और अपनी सेक्सुअल डिज़ायर को पूरा करना चाहते हैं. इमोशनल एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर दो लोग एक-दूसरे से भावनात्मक रूप से जुड़ने के लिए क़रीब आते हैं. रिसर्च के अनुसार, अधिकांशतः महिलाएं इमोशनल अटैचमेंट यानी भावनात्मक ज़ुडाव के चलते एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर की ओर क़दम बढ़ाती हैं जबकि पुरुष अक्सर सेक्सुअल डिज़ायर को पूरा करने के लिए.

कमज़ोर होते रिश्ते :-प्रोफेसर एवं काउंसलर रश्मि अग्निहोत्री के अनुसार, “वो दिन लद गए जब पति-पत्नी एक-दूसरे के लिए मरने-जीने को तैयार रहते थे. आज रिश्तों की डोर कमज़ोर हो गई है. जिसे टूटने में पलभर का भी समय नहीं लगता. इसकी सबसे बड़ी वजह है प्यार में कमी. यंगस्टर्स प्यार से ज़्यादा अब अपने कंफर्ट को महत्व देने लगे हैं. वो जीवनसाथी का चुनाव इसलिए नहीं करते, क्योंकि वो उनसे प्यार करते हैं, बल्कि अपनी सहूलियत के लिए ऐसे जीवनसाथी का चुनाव करते हैं, जिनके साथ को नहीं, बल्कि जिनके साथ वो ज़िंदगी को एंजॉय कर सकें. ऐसे में जब रिश्ते की नींव ही कमज़ोर होती है, तो रिश्ता टूटने में देरी नहीं लगती.”

समय की कमी ने लाई प्यार में कमी :-रिसर्च के अनुसार, वर्क प्लेस पर एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर की संभावना अधिक होती है. आज मेट्रो सिटीज़ में अच्छी लाइफस्टाइल के लिए कपल्स ने ख़ुद को इस हद तक बिज़ी कर दिया है कि उनके पास घर-परिवार की छोड़िए, एक-दूसरे के लिए भी समय नहीं है. 8-10 घंटे की जॉब और ट्रैवलिंग में 1-2 घंटे बर्बाद करने के बाद वो इस क़दर थक जाते हैं कि एक-दूसरे से बात करने कि बजाय नींद की आगोश में जाना ज़्यादा पसंद करते हैं. नतीजतन दोनों के बीच दूरियां बढ़ती जाती हैं और पार्टनर की प्यार की कमी की भरपाई के लिए वो बाहर प्यार तलाशने लगते हैं.

ज़रूरत से ज़्यादा प्रैक्टिकल होना :-सबसे आगे निकलने की होड़ और बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने युवाओं बहुत कम उम्र में प्रैक्टिकल बना दिया है. प्रोफेशनल लाइफ के साथ-साथ वो अब अपनी पर्सनल लाइफ के बारे में भी प्रैक्टिकल होकर सोचने लगे हैं. एक-दूसरे के इमोशन्स, फिलिंग आदि से उन्हें कोई ख़ास मतलब नहीं होता. ऐसे में ख़ुद को ख़ुश रखने के लिए वो प्रैक्टिकल तरी़के से सोचते हुए एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर को ग़लत नहीं समझते.

स्ट्रेस कम करने के लिए भी रखते हैं अफेयर :-रिसर्च की मानें तो मेट्रो सिटीज़ में रहने वाले कपल्स हेक्टिक लाइफस्टाइल और स्ट्रेस को कम करने के लिए एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर रखते हैं. इस विषय में मनोवैज्ञानिक निमिषा रस्तोगी कहती हैं “वर्क प्लेस पर होने वाले एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर की एक वजह स्ट्रेस भी है, जिससे छुटकारा पाने के लिए कुछ पाटर्नर अपने कलीग के साथ सेक्सुअल रिलेशन बनाते हैं. इससे उन्हें सुख का एहसास होता है और वो ख़ुद को संतुष्ट भी महसूस करते हैं. ऐसे लोग एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर को ज़्यादा एंजॉय करते हैं, क्योंकि ऐसे अफेयर्स में पार्टनर के प्रति उन पर किसी तरह की कोई ज़िम्मेदारी नहीं होती है.”

ईगो भी है एक वजह :-जहां प्यार होता है, वहां अहंकार की कोई जगह नहीं होती, लेकिन आज कपल्स के बीच प्यार के लिए कोई जगह नहीं है, उनकी नज़र में ईगो ही सबसे बड़ा हो जाता है, जिसकी वजह से न वो पार्टनर के आगे कभी झुकते हैं और ना ही कभी आपसी सहमति से रिश्तों की नींव को मज़बूत बनाने की कोशिश करते हैं. नतीजतन अहंकारवश हमसफ़र के आगे झुकने की बजाय वो किसी और से रिश्ता जोड़ना बेहतर समझते हैं.

एक्स्पर्ट स्पीक ( ताकि न आए ऐसी नौबत ) :-किसी ने सच ही कहा है ताली एक हाथ से नहीं बजती, अगर आप दोनों के बीच किसी तीसरे ने जगह ले ली है, तो इसका मतलब स़िर्फ ये नहीं कि आपका पार्टनर ही ग़लत है, हो सकता है कि कुछ कमी आपमें भी हो.अपनी शादी को एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर से बचाने के लिए निम्न बातों का ध्यान रखें :-झगड़ा छोटा हो या बड़ा, एक-दूसरे से बातचीत बंद न करें, अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करें और समस्या का हल ढूंढ़ें. वरना आपकी चुप्पी आपके रिश्ते में दरार डाल सकती है. न स़िर्फ शारीरिक संतुष्टि, बल्कि पार्टनर की मानसिक संतुष्टि का भी ख़्याल रखें, कई बार पार्टनर मानसिक सुख और सुकून की आस में भी किसी तीसरे की ओर क़दम बढ़ाते हैं, ख़ासकर महिलाएं.

घर या बाहर की अनगिनत ज़िम्मेदारियां भले ही आपके कंधों पर हों, मगर जीवनसाथी को नज़रअंदाज़ करने की ग़लती न करें. आपकी ओर से ध्यान हटने पर हो सकता है कि उनका ध्यान किसी दूसरे में लग जाए.ख़ुशहाल शादीशुदा ज़िंदगी के लिए स़िर्फ एकसाथ घर में रहना काफ़ी नहीं, पार्टनर के साथ क्वालिटी टाइम बिताना भी ज़रूरी है.

न स़िर्फ पार्टनर, बल्कि शादी जैसे पवित्र बंधन पर भी विश्‍वास रखें.पार्टनर पर हावी न हों. जीवनसाथी को उनके मन मुताबिक जीने दें. कई मामलों में पार्टनर का डॉमिनेटिंग होना भी एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर की वजह होता है.रिसर्च के अनुसार, ऐसी महिलाएं जिनके पति कई महीनों या वर्षों के लिए घर-देश से दूर रहते हैं, वो एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर की ओर जल्दी आकर्षित होती हैं.रिसर्च के अनुसार, पत्नी की प्रेग्नेंसी के चलते सेक्सुअल डिज़ायर पूरी न होने से पुरुषों के एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर की संभावना बढ़ जाती है.

दूसरे की बीवी हड़पने के चक्‍कर में है "जोशीला" विधायक

: अमनम‍णि त्रिपाठी पर चल रहा है अपनी ही बीवी की हत्‍या का संगीन आरोप, उसके बावजूद उन्‍हें अब दूसरे की बीवी भी चाहिए : मधुमिता शुक्‍ला और सारा हत्‍याकाण्‍ड से कलंकित है यह त्रिपाठी-खानदान : बांगरमऊ में अपनी करतूतों को झंडा बुलंद कर रखा था कुलदीप सेंगर ने : जोगीजी आह-आह दो :

कुमार सौवीर

लखनऊ : यूपी के पूर्वांचल में ऐसे ही अपराधी छवि वाले एक माननीय विधायक जी, जो नेपाल से सटे विधानसभा से चुनाव जीत गये। इस विधायक ने एक दूसरे युवक की पत्नी को अपनी पत्नी करार दे दिया है। वह भी एकतरफा इश्‍क में। नारा यह है कि दूसरे का माल अब मेरा ही होगा, किसी ने छुआ या नजरें तरेंरीं तो अंजाम बहुत बुरा होगा। विधायक जी ने उस युवक को इतना तक धमका दिया कि अगर उसने अपनी इस नई नवेली प्रेमिका से बातचीत करने की कोशिश तक की तो उसका अंजाम बहुत बुरा होगा। बातचीत पर जब युवक ने अपना प्रतिरोध दर्ज करना चाहा तो इस माननीय जी ने गालियों की बौछार फेंकीं, और धमकियों का कींचड़ डालने की चेतावनी तक दे डाली। बोले कि:- मादर----, मैं तुम्‍हारा जीना मुहाल कर दूंगा। इस विधायक की एक फोन-कॉल की ऑडियो-क्लिप आजकल वायरल हो चुकी है, जिसमें इस "जोशीले" विधायक ने इस युवक से को धमकी दी है कि वह उसकी पत्नी से भूलकर भी न तो फोन करें और ना ही बातचीत करें। विधायक ने यह धमकी दी है कि अगर उसकी बात नहीं मानी गई तो उसका अंजाम बहुत बुरा होगा। इस विधायक का कहना था वे उस महिला के पति बन चुके है और अब उससे कोई रिश्ता कत्‍तई न रखे।

यह किस्सा अमरमणि त्रिपाठी है उसकी पत्नी का नहीं है बल्कि या गुल खिलाया है इस दंपत्ति के चिराग अमनमणि त्रिपाठी ने आपको याद होगा सिर्फ डेढ़ साल पहले सारा नाम की युवती की हत्या हुई थी अमनमणि त्रिपाठी उसी सारा का पति था और दिल्ली से कार में लौटते समय एक दुर्घटना में सारा की मौत हो गई थी। पुलिस ने इस मामले की जांच की तो पाया कि सारा की मौत दुर्घटना में नहीं बल्कि बाकायदा हत्या थी और यह हत्या अमन त्रिपाठी ने की थी। यह खुलासा होने के बाद पुलिस ने अमन मणि त्रिपाठी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था लेकिन नौतनवा विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय एमएलए जीतने के बावजूद अमनमणि त्रिपाठी किसी छुट्टा सांड की तरह अपने अपराध में लिप्त हैं। बेखौफ।

अब जरा इस विधायक का चेहरा भी देख लीजिए। यह विधायक उस खानदान का है जहां अपनी प्रेमिकाओं का देह-शोषण के बाद उनकी हत्या की जाती है। वह भी किसी पारिवारिक परंपरा की तहत। इतना ही नहीं, इस परिवार की ख्याति पूर्वांचल के त्रिपाठी खानदान से है जिसका मुखिया है अमरमणि त्रिपाठी। अमरमणि त्रिपाठी कई पार्टियों से विधायक रह चुका है और राजनीति में उसकी छवि एक अय्याश, दलाल और प्रोफेशनल हत्यारे की है। आपको बता दें प्रतिभाशाली कवियत्री मधुमिता शुक्ला को अपने प्रेम में फंसाने के बाद अमरमणि त्रिपाठी में उसकी हत्या कर दी थी। यह हत्या तब हुई जब मधुमिता शुक्ला 5 महीने की गर्भवती थी। इस मामले की सुनवाई के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश हाईकोर्ट के बजाय उत्तराखंड हाई कोर्ट में कराने का फैसला किया था ताकि किसी भी मामले में अमरमणि किसी कोई भी अडंगे बाजी न कर पाए और ना ही न्यायिक प्रक्रिया को बाधित कर सकें। इस मामले में अमरमणि त्रिपाठी और उसकी पत्नी भी शामिल थी और अदालत में इन दोनों को मधुमिता शुक्ला और उसके गर्भस्थ बच्चे की हत्या के आरोप में आजीवन कारावास की सजा दे रखी है। फिलहाल यह दोनों ही पति-पत्नी जेल मैं चक्की पीस रहे है।

अब जरा आइए यूपी के बाकी विधायकों और उनके रिश्तेदारों की करतूत का खुलासा दिखा दिया जाए। उन्नाव के बांगरमऊ विधायक कुलदीप सिंगर ने जिस तरह एक व्यक्ति को पूरी तरह मार कर अधमरा कर दिया और उसे को जेल ठूंस दिया वह अपने आप में यूपी सरकार की असफलताओं का सबसे बड़ा झंडा है। जिसमें पुलिस और प्रशासन के साथ ही साथ डॉक्टर भी शामिल थे। लेकिन उस मृत व्यक्ति के बदन में आयीं चोटों पर कोई भी चर्चा करने की जरूरत ही नहीं समझी गई। नतीजा यह हुआ कि जेल में इलाज ही नहीं कराया गया। जबकि उसके पेट की आतें पिटाई से बुरी तरह चोटिल हो गई थीं। शरीर में बाहर और भीतर भारी लगातार रक्त स्राव हो रहा था। पीड़ा से तड़प-तड़प कर इस युवक ने 5 दिन बाद ही जेल में दम तोड़ दिया। (क्रमश:)

एक बरस में ही यूपी सरकार की कलई उतरने लगी है। समाजवादियों की सरकार की भीषण गुण्‍डागर्दी से त्रस्‍त होकर जनता ने लपक कर अपने वोट भगवा-कटोरे में झरझरा कर उड़े लिया था, कि चाहे कुछ भी हो जाए, दमघोंटू अखिलेश सरकार से पिंड छूट जाए। लेकिन एक बरस होते-होते ही भाजपा सरकार ने सपा-सरकार के रिकार्ड तक चकनाचूकर कर दिये। फिलहाल तो बलात्‍कारों और हत्‍याओं की बाढ़ से यूपी सुलग रहा है, तो अराजकता का माहौल से जनता त्राहि-माम त्राहि-माम चिल्‍ला रही है। उधर सत्‍ता से जुड़े जनप्रतिनिधियों की गुण्‍डागर्दी ने यूपी का कमल सुखा डालने की साजिश बुन दी है। यह एक श्रंखलाबद्ध आलेख है, जिसको हम लगातार क्रमश: प्रकाशित करने जा रहे हैं।

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जोगीजी आह-आह

पूरे शहर में उसकी धाक थी, मगर चुनाव हार गया

: जन-सरोकारों से जुड़ कर अपनी संवेदनशीलता का प्रदर्शन करना, और पदार्थवादी चुनाव में जीतना अगल-अलग बात है : शहर छोटा सा सही, मगर बच्‍चों व अभिभावकों का लाडला था यह मेधावी युवक : हर शख्‍स तुम्‍हें बहादुर और परिश्रमी मानता है, लड़ जाओ चुनाव : जीत गया कुमार सौवीर -तीन :

कुमार सौवीर

लखनऊ : यह एक मेधावी, जुझारू और जन-समर्पित युवक की कहानी है। गरीब परिवार था, लेकिन इसके बावजूद गढ़वाल के श्रीनगर में रहने वाले इस युवक ने गणित से एमएससी किया था। नौकरी तो मिली नहीं, तो उसने ट्यूशन शुरू कर दिया। पूरे मोहल्‍ले में उसकी पढ़ाई की धाक हो गयी। आसपास के स्‍कूली-कालेज के छात्र उसके पास आने लगे। ज्‍यादातर गरीब परिवार के छात्र थे। उनकी ऐसी हैसियत नहीं थी कि वे पैसा दे सकते, उधर इस युवक को भी गरीबी की पीड़ा का खूब अहसास था। ऐसा में पढ़ाई होने लगी, ट्यूशन से पैसा आये या न आये। युवक के पास भीड़ लगने लगी। पूरे श्रीनगर में उसको सम्‍मान मिलने लगा। अधिकांश छात्र और उसके अभिभावक तक उसके चरण-स्‍पर्श कर अपना जीवन धन्‍य करने लगे।

परिवार में दायित्‍व बढ़ने लगे, तो इस युवक ने इधर-उधर हाथ संभावनाएं खोजना शुरू कर दिया। एक गम्‍भीर अभिभावक ने सलाह दी कि नौकरी नहीं है तो कोई बात नहीं। जब तक नहीं मिल पा रही है, तब तक ट्यूशन को व्‍यावसायिक तौर पर शुरू कर दो, लेकिन कट्टर के साथ। मगर युवक से यह नहीं हो पाया। उसके अपने आदर्श थे, और बेरोजगारी के दंश की अनुभूतियां भी। वैसे भी वह ज्ञान बांटने में विश्‍वास करता था, किसी कठोर साहूकार की तरह निर्मम उगाही नहीं। जिस में क्षमता हो, वह पैसा दे। और जिसके पास पैसा न हो, वह मुफ्त में पढ़े। यही फलसफा था उस युवक का। यह जानते-बूझते भी कि उसके इस संकल्‍प और आदर्श की आड़ में कई छात्र और अभिभावक ट्यूशन की फीस देने से कतराते हैं। लेकिन इससे क्‍या फर्क पड़ता है। जिसे जो करना हो, वह करता रहे। किसी की बेईमानी भरी हरकत से हम अपना विश्‍वास कैसे डिगा सकते हैं, यह साफ मानना था इस युवक का।

इसी बीच श्रीनगर नगर पालिका परिषद का चुनाव की तारीख घोषित हो गयीं। उसने तय किया कि वह इस बार चुनाव लड़ेगा, और अपना भविष्‍य राजनी‍ति में खोजेगा-खंगालेगा। साथियों से बातचीत की, ढांढस बढने लगा। लोग बोले कि तुम्‍हारे बारे में तो पूरे शहर को जानकारी है, हर शख्‍स तुम्‍हें बहुत बहादुर और परिश्रमी मानता है। ईमानदार हो, कलंक नहीं है, बिना पैसा लिये भी लोगों के बच्‍चों को पढ़ाते हो, और कमाल की पढ़ाई कराते हो। लड़ जाओ बेटा, लड़ जाओ। कूद पड़ो इस नये रणक्षेत्र में।

तो भइया, वह आदर्शवादी युवक चुनाव-समर में कूद पड़ा। डंका बज गया। जिससे भी पूछो, हर शख्‍स उसकी साख पर कासीदे काढ़ने लगा था। प्रचार जोरों पर चला, मगर बिना खर्चा के। युवक का साफ कहना था कि जब हमें कमीशन नहीं खाना है, घूस नहीं खानी है, तो हम अनावश्‍यक क्‍यों खर्चा करें। हमारी सारी पूंजी तो हमारी साख ही है, और इस बारे में हर शख्‍स को खूब जानकारी है, तारीफ होती है मेरे कामधाम की।

चुनाव हुआ। मतदान हुआ। मतगणना हुई। घोषणा भी हो गयी। और यह क्‍या, यह युवक बुरी तरह पराजित हुआ। बस चंद दर्जन वोट ही इस युवक को मिले। इसके बावजूद उसने पत्रकारिता का कोर्स किया, कुछ वक्‍त बाद उसे नौकरी भी मिल गयी।

कल तक गढ़वाल के श्रीनगर में अपनी चप्‍पल चटखाने वाला वह युवक आज झांसी विश्‍वविद्यालय में पत्रकारिता विभाग का प्रमुख है। नाम है चंडीप्रसाद पैन्‍यूली। (क्रमश:)

यह तो है उन महान लोगों की कहानी, जो भले ही चुनावी दंगल में हार गये, लेकिन उनके आदर्श आज भी लोगों के दिल-दिमाग में ताजा हैं, नजीर बने हुए हैं। ऐसी हालत में कुमार सौवीर की हैसियत क्‍या है, आखिर किस खेत की मूली हैं कुमार सौवीर, यह सवाल सहज ही अपना सिर उठा लेता है। उत्‍तर प्रदेश राज्‍य मुख्‍यालय मान्‍यताप्राप्‍त संवाददाता समिति के चुनाव में मैं हार गया। मगर मैं इस पराजय को अपनी एक बड़ी जीत के तौर पर देखता और मानता हूं। मेरी इस मान्‍यता और अडिग आस्‍था-विश्‍वास को लेकर मेरे खुद तर्क हैं, और इतिहास में बेहिसाब नजीरें भरी पड़ी हैं। अगले कुछ अंकों में मैं अपनी इस हार नुमा बेमिसाल विजयश्री का सेहरा आप सब को दिखाऊंगा, और उसकी व्‍याख्‍या भी करूंगा। मेरी उस श्रंखलाबद्ध लेख को पढ़ने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

नैतिक रीढ़ का नाम है कुमार सौवीर

हमारे चैनल का क्‍या हुआ, पूछा था अखिलेश ने

: ब्रजेश मिश्र के तलाक के बाद अब तक इद्दत की मियाद खत्‍म हो गयी, तो नेशनल वायस का नया तलाक-नामा तैयार हो गया : गजब खेल है कि पता ही नहीं चल पाता कि किसने कितनी रकम का भुगतान किया, शर्तें भी खामोश : सवाल यह है कि अब बिजेंदर सिंह का अगला हाथ क्‍या होगा :

कुमार सौवीर

लखनऊ : एक भारी रकम अदा करने के बाद यह चैनल विजेंद्र के हाथ से निकलकर बृजेश मिश्रा के पास पहुंच गया। कामधाम अब धूमधाम से शुरू हुआ। अपनी स्टाइल वाले और सच बेचते नारे के साथ बृजेश की फोटो प्रदेश भर की सड़क से लेकर रेलवे स्टेशन बस अड्डा और एयरपोर्ट तक लग गई जिसमें बृजेश की फोटो के साथ आक्रामक का अंदाज नेशनल वायस के भोपू बने दिख रहे थे। लेकिन 3 महीने में ही बृजेश को पता चल गया कि उनके साथ धोखा हुआ। पता चला इस डील में बिजेंदर ने नेशनल वायस के नाम पर एक टोपा जैसा भोंपू थमा दिया है। पहली बार बृजेश को गच्चा मिला, और भारी रकम का धक्का बृजेश मिश्रा पर पड़ गया। इतना ही नहीं, ब्रजेश को यह भी पता चल गया कि अगर उन्होंने तत्काल इस डील को खारिज नहीं किया तो उनके कैरियर पर गहरा दाग पड़ जाएगा। जिसमें उनका भविष्य भी तबाह हो जाएगा।

यह समझते ही बृजेश ने नेशनल वॉइस से अपना पिंड छुड़ाया और एक नया चैनल शुरू कर दिया। नाम रखा भारत समाचार। गनीमत है कि प्रयोगधर्मी बृजेश मिश्रा फिलहाल इस नए भारत समाचार न्यूज़ चैनल की परफॉर्मेंस से संतुष्ट हैं। यह चैनल उनकी उम्मीदों पर फिलहाल ठीकठाक चल रहा है। लेकिन यह तो पता नहीं है कि इस नई डील का एक किस करवट बैठा था और उसने कितना भुगतान किसको किसने किया लेकिन यह तो तय हो ही गया कि विजेंदर सिंह को उनका यह चैनल वापस मिल गया।

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पत्रकार पत्रकारिता

लेकिन अब साल भर बाद फिर संकट उठ गया है नेशनल वॉइस को लेकर। पता चला है कि विजेंद्र सिंह ने  यह चैनल किसी दूसरे को थमा दिया है और उससे उसके एवज में सारी रकम अदा हो गई। लेकिन यह रकम कितनी है पता नहीं चल पा रहा है। लेकिन इतना जरूर है कि इसमें लेनदेन भारी-भरकम हुआ है।

सूत्र बताते हैं यह डील समाजवादी पार्टी के एक बड़े नेता ने की है। यह नेता समाजवादी पार्टी की पिछली अखिलेश सरकार में दौरान ही राजनीति में जन्‍मा था,  और जाहिर है कि सपा में वह नवोदित नेता है। इसका श्रीचरण समाजवादी पार्टी में घुसा था इस नेता के पिता एक बड़े नौकरशाह बताये जाते हैं। जिनकी करीबी समाजवादी पार्टी के पूर्व मुखिया मुलायम सिंह यादव के साथ थी।

कहने की जरूरत नहीं जिन हालातों में नेशनल वॉइस का अंदाज यूपी की खबरें की टोन और उनके तेवर में बदलाव कैसा रखेगा। क्‍योंकि उसके नए खरीददार समाजवादी पार्टी के एक बड़े नेता हैं इसलिए इस चैनल की आवाज नेशनल वॉइस के बजाय समाजवादी वॉइस या बीजेपी-विरोधी वॉइस के तौर पर ज्यादा प्रभावी हो सकती है। एक सूत्र ने बताया कि इस नए चैनल की इस रिलांचिंग की रूपरेखा के पहले पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश सिंह ने एक कार्यक्रम में एक बार चर्चा भी करते हुए सवाल उठा दिया था कि हम लोगों का चैनल कब लांच होगा। ( क्रमश: )

किसी बड़े खेल के मैदान में दर्जनों खिलाडि़यों के बीच बार-बार पर लात खाने पर अभिशप्‍त हो चुका है यूपी का पहला न्‍यूज चैनल नेशनल वायस। खबरों की दुनिया में शायद इतनी बदतरीन किस्‍मत किसी भी चैनल की नहीं रही होगी, जितनी इस नेशनल वायस की हुई है। बार-बार निकाह, और फिर बार-बार मुताह। गजब छीछालेदर फैल रही है इस चैनल में।

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नेशनल वायस चैनल का नया मुताह


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