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साक्षात बंदर हैं ऐसे डॉक्‍टर, एकसाथ दर्जन जिलों में छलांग

: थमा दी गयी मोटी रकम की गड्डियां, डिग्री की फोटोकॉपी दिखा कर हथियाया अल्‍ट्रासाउंड सेंटर :  फर्जीवाड़ा से अनुमति, कई सेंटरों में एक ही डॉक्टर, धड़ल्‍ले से हो रहे पंजीकरण से अल्ट्रासाउंड के दुरूपयोग की आशंका भारी : कन्‍याभ्रूण संरक्षण- तीन :

कुमार सौवीर

लखनऊ : ऐसे रेडियोलाजिस्ट जिले के कई कई अल्ट्रासाउंड केन्द्रों में रजिस्टर्ड है जिसका प्रमाण आरटीआई से मिल चुका है। ऐसा फर्जीवाडा और अल्ट्रासाउंड का दुरूपयोग रोकने के लिए कई सेंटरों में एक ही डॉक्टर के रजिस्ट्रेशन की अनुमति पर भी रोक लगनी चाहिए। उपरोक्त तथ्यों को देख कर यह आवश्यक हो जाता है की आने वाले समय में ऐसे डॉक्टर्स को चिंहित कर उनकी भी अल्ट्रासाउंड योग्यता का टेस्ट लेना या उनकी ६ माह की ट्रेनिंग कराना अच्छी अल्ट्रासाउंड जांचों तथा जांचोपरांत सही इलाज के लिए परमावश्यक है जिससे स्वास्थय सेवाओं का स्तर ऊँचा रहे और मरीजों के स्वास्थ्य से किसी प्रकार का खिलवाड न हो सके। इसकी संस्तुति पीसीपीएनडीटी एक्ट के २०१४ में संशोधित नियमों में की गयी है।

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डॉक्‍टर

नियम तो इस बात की है कि अल्‍ट्रासाउंड के लिए हर जिले के सीएमओ या पीसीपीएनडीटी के समुचित अधिकारी इस प्रकार के रेडियोलाजिस्ट की सूची तैयार करें। इसमें ऐसे रेडियोलोजिस्ट्स के अल्ट्रासाउंड ज्ञान का आंकलन हो सके और किसी भी तरह की कमी पाए जाने पर अल्ट्रासाउंड ट्रेनिंग कराई जा सके। लेकिन ऐसा होता नहीं है। वहज है भारी भ्रष्‍टाचार। अक्षम लोग अपनी डिग्रियों का किराया वसूल कर सड़कछाप सेंटरों के हाथों में अपनी डिग्री बेच लेते हैं। इसकी एवज में उन्‍हें हर महीने या हर हफ्ते मोटी रकम मिल जाती है। सेंटर की अनुमति सीएमओ से हासिल करने में आने वाला पूरा खर्चा ऐसे सेंटर के मालिक ही उठाते हैं।

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चिकित्‍सक

इसका खुलासा तब हुआ जब प्रमुख न्‍यूज पोर्टल मेरी बिटिया डॉट कॉम ने पूरे देश और खास तौर पर यूपी के सभी जिलों में सरकारी कागजों और वहां दर्ज सूचनाओं का जायजा लिया। मेरी बिटिया डॉट कॉम ने इस अभियान के तहत प्रदेश के सभी मुख्‍य चिकित्‍सा अधिकारियों, मुख्‍य चिकित्‍सा अधीक्षकों, जिलाधिकारियों, पीसीपीएनडीटी के तहत गठित समिति के पदाधिकारियों, सभी मेडिकल कॉलेजों तथा देश के सभी एम्‍स और भारतीय चिकित्‍सा परिषद तथा सभी प्रदेशों के चिकित्‍सा परिषदों से इस बारे में विस्‍तृत जानकारियां हासिल करने का प्रयास किया था।

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दुर्दशा कन्‍या भ्रूण की

इस प्रयास के तहत जो भी सूचनाएं मिलीं, वे हैरतनाक, आश्‍चर्यजनक होने के साथ ही प्रशासनिक व सरकारी कामकाज के बेहद अराजक और खतरनाक स्‍तर तक की थीं। इन सूचनाओं से साफ स्‍पष्‍ट होता है कि कन्‍या भ्रूण के संरक्षण और कन्या भ्रूण हत्‍या के खिलाफ झंडा उठाने वाले पीसीपीएनडीटी कानून के अनुपालन की असलियत क्‍या है। साफ पता चला है कि जिस कानून को कन्या भ्रूणहत्या रोकने के उद्देश्‍य के लिए बनाया और लागू कराया गया था, वह अपंग साबित हो रहा है।

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भगवान धन्‍वन्तरि

सीटी स्कैन और एमआरआई से लिंग  की जांच अल्ट्रासाउंड से भी ज्यादा सटीक तरीके से की जा सकती है. लिंग जाच के कारण लगातार गिरते जा रहे स्‍त्री : पुरूष अनुपात को देखते हुए सीटी स्कैन और एमआरआई को भी पीसीपीएनडीटी एक्ट के दायरे में शीघ्रतम लाना भी अनिवार्य हो गया है। इस तथ्य पर अभी तक किसी का ध्यान न जाने की वजह से इन दोनों जांचो के गलत उपयोग के बारे में किसी को पता ही नहीं है। इनको को एक्ट के दायरे में लाने के साथ ही साथ ये भी आवश्यक होगा की केवल उन्ही रेडियोलाजिस्ट का रजिस्ट्रेशन हो जो भारतीय चिकित्‍सा परिषद द्वारा मान्यता प्राप्त डिग्री के धारक हों तथा जिनके समय में उनके विभाग में सीटी स्कैन और एमआरआई की मशीन लग चुकी हो और वो इन जांचो को करने योग्य हों। अन्य रेडियोलाजिस्ट के लिए योग्यता का टेस्ट और उसे पास न करने पर ट्रेनिंग का नियम लागू किया जाना होगा जिससे इन जांचो का लिंग परीक्षण में गलत उपयोग करने वाले रेडियोलाजिस्ट पर लगाम लगायी जा सके.

पेट में पहचान कर मारी जा रही हैं भविष्‍य में स्‍त्री बन सकने वाले कन्‍या-भ्रूण। सड़क-नाले के किनारे गुमटी खोले अप्रशिक्षित और झोलाछाप डॉक्‍टरों की करतूतों पर मेरी बिटिया का एक सशक्‍त हमला। पूरा मामला समझने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिए:-

कन्‍या-भ्रूण

अधिकांश अल्‍ट्रासाउंड सेंटर का मतलब अब किसी कत्‍लगाह से कम नहीं रह गया है, जहां मां के पेट में जन्‍म लेने की तैयारी कर रहे कन्‍या भ्रूण की आपराधिक पहचान कर उसे मौत के घाट उतारने की साजिशों की जाती हैं। इससे जुड़ी खबरों को देखने को अगर इच्‍छुक हों तो कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

कन्‍या भ्रूण के कत्‍लगाह

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