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ज्ञानी लोग ऐसे हाथ मिलाते हैं कि वियाग्रा तक शरमा जाए

: बेईमानों के पास अद्भुत सांगठनिक एकता, ईमानदार बिखरे-बिखरे : बेईमान के पास चिलांडलुओं-तेलांडुओं की बाकायदा फौज दिखेगी : धत्‍त त्‍तेरी ईमानदार की। तुमसे तो लाख अच्‍छे हैं बेईमान : वाकई नीर-क्षीर विवेकी हैं बेईमान :

कुमार सौवीर

लखनऊ : आप किसी भी बेईमान के पास जाइये। उसके आसपास चिलांडलुओं-तेलांडुओं की बाकायदा फौज दिखेगी, जबकि ईमानदार लोगों के चेहरे से तुनुक-मिजाजी टप्‍प-टप्‍प चूती-टपकती रहती है। जिन्‍हें औसत क्षमता-बुद्धि है, वे हमेशा प्रफुल्लित दिखेंगे। दौड़-दौड़ कर काम करने-कराने में महारत होगी उनमें। उनका एक औरा या प्रभा-मंडल होगा। उनके आसपास लोगों की भीड़ होगी, आने-जाने वाले को पुकारेंगे, लिपटेंगे, सम्‍मान देंगे। तनिक बात पर भी वे सब एकमत हो जाते हैं बेईमान, साथी को संकट देखते ही वे एकजुट हो जाते हैं। भले वो ईमानदार हो या बेईमान। जबकि जिन्‍हें आप क्षीर-विवेकी यानी पढ़े-लिखे मानते हैं, वे अक्‍सर अक्‍खड़, ऐंठू, घमण्‍डी दिखेंगे। अक्‍सर तो दूसरों को गरियाते रहेंगे। गर्मजोशी कोसों दूर, दूसरों की ओर अपना हाथ ऐसे सौंपेंगे, कि वियाग्रा तक अपनी असफलता पर शर्मिंदा हो जाए। सिर्फ ज्ञान बघारेंगे, तुनुक-मिजाजी टप्‍प-टप्‍प चूती-टपकती रहेगी।

आज यूं ही एक बहस में शामिल हो गया मैं। प्रश्‍न था कि नीर -क्षीर विवेकी होना य़ा किसी से अप्रभावित होना, आप को अकेला व नीरस बना सकता है? प्रश्‍न के साथ ही समाधान भी देने की कोशिश की थी अवध बार एसोसियेशन के पूर्व महामंत्री आरडी शाही ने। मैंने भी अपना ज्ञान छौंका कि नीर-क्षीर विवेकी होने का अर्थ कभी भी नीरस और अकेला कदापि नहीं हो सकता। जो तलछट तक के मर्म को समझने गया है, वह वापसी में अगर अकेला और नीरस बन गया, तो मैं नोटरी प्रमाणपत्र जारी करवा सकता हूं कि ऐसा व्‍यक्ति रेन-कोट पहन कर स्‍नान करने की कोशिश करता रहा है, और इस तरह अपने ऐसे स्‍नान-कर्म से शुद्ध होने का भरम दूसरों पर थोपता रहा है। ऐसा व्‍यक्ति नीर-क्षीर विवेकी कैसे हो सकता है? और अगर ऐसा दावा करने वाले ने स्‍वप्‍न में भी क्षीर को नहीं अपनाया, केवल भयभीत ही रहा है। ऐसे में तो दर्प-घमण्‍ड की ही चट्टानी-फसल ही होगी। नीर-क्षीर विवेकी तो केवल वही हो सकता है जो जल के कण-कण-परमाणुओं तक पहुंचने के लिए उत्‍सुक हो, और उसी जिज्ञासा भाव में वहां गहरे तक पहुंच चुका हो। और यह अच्‍छी तरह समझ चुका हो कि वह नीर-क्षीर के ऊपर नहीं, उसके जैसे असंख्‍य तत्‍वों में से एक है। ऐसे व्‍यक्ति सरल, प्राणवान, जीवन्‍त और सतत जिज्ञासु होगा, दर्प के विपरीत ध्रुव पर।

अब जरा बेईमान और ईमानदार के चरित्र का विश्‍लेषण कीजिए, तो सारी धुंध साफ हो जाएगी। जिन्‍हें आप बेईमान कहते हैं, वे अपने साथी को संकट देखते ही एकजुट हो जाते हैं। भले वो ईमानदार है अथवा बेईमान। हमला कर बैठते हैं। शिकार के पहले से ही वे अपनी-अपनी भूमिकाओं का निर्धारण कर देते हैं कि किसको किस ओर से कैसा हमला करना है जाहिर है कि हमला सटीक होता है, और शिकार चारों खानों चित्‍त। उसके बाद वे अपने शिकार के टुकड़े-टुकड़े करते हैं, अपने-अपने हिस्‍से पर बंटवारा करते हैं।

जबकि ईमानदारों में सांगठनिक क्षमता का धात लगातार टपकता ही रहता है। ऐसे लोग अपने आसपास के करीबी लोगों के प्रति अनजाने से भय से ग्रसित होते हैं। एक-दूसरे को नीचा गिराना, चुगली करना, माखौल उड़ाना जैसी गतिविधियों में होते हैं। आदर्श का गजब पाखंड उनके चेहरे पर किसी दैवीय नूर की तरह छाया रहता है। इतना कि बेईमानियों के हर दमकते सूरज को वे पछाड़ दें। मैं बहुत ईमानदार हूं, इकलौता ईमानदार हूं। मुझसे जो लोग जुड़े हुए हैं, सिर्फ इसलिए जुड़े हैं क्‍योंकि उनके अपने निजी भ्रष्‍ट एजेंडे हैं। वे भेड़ की खाल में छिपे भेडि़ये होते हैं। चूंकि मैं पवित्र हूं, इसलिए मैं अपने पवित्र एजेंडे को सफलीभूत करने-कराने के लिए ऐसे पाखंडियों का साथ ले रहा हूं, लेकिन वक्‍त आते ही उनका काम लगा दूंगा। क्‍योंकि मैं ईमानदार हूं, और केवल ईमानदारों को ही प्रश्रय दूंगा। और चूंकि मैं इस जगत में इकलौता ईमानदार हूं, इसलिए बाकी सारे लोग बेईमान हैं।

और भी सबसे बहुत महत्‍वपूर्ण सवाल तो यह है कि आखिर आप किसी को बेईमान किस आधार पर घोषित कर देते हैं। जब भी देखिये-सुनिये, पता चलता है कि खुद को ईमानदार कहलाने वाला शख्‍स उन सभी बाकी लोगों को बेईमान साबित करने का प्रमाणपत्र जारी करता रहता है, लेकिन जब उसका निजी मामला फंसता है, तो फिर उसी बेईमान के सामने गिड़गिड़ाता है। और जैसे ही उसका काम निकल जाता है, आपकी निगाह में आपका वही मददगार आपकी निगाह में दोबारा गिर जाता है।

आप अपने इसी ओढ़े हुए दर्प में दबे रहते हैं, कि आप श्रेष्‍ठ हैं, और इसी बीच कोई तीसरा उनका काम लगा कर भाग निकल जाता है।

सॉरी यार। प्रवचन तो बाद में बढेगा, लेकिन इतना जरूर बताते जाइयेगा कि आप बेईमान हैं कि ईमानदार। वह क्‍या है कि दोस्‍ती की पींगें तो जात को पहचान कर ही तो की जा सकती है न, इसलिए।

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