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फुफ्फा चिल्‍लाए कि जोगियापुरा में फाड़ी जा रही है चड्ढी

: भाईजारापार्टी के महामंत्री के इशारे पर डण्‍ठल बाबू ने उनकी चड्ढी में तेजाब डाल दिया : क्‍वेरी हुई कि सोयल बाबू ने 25 लाख रूपयों की तेल की शीशी क्‍यों मांगी, क्‍या इस्‍तेमाल करेंगे, किस पर प्रयोग होगा : ढिबरीदीन के गेस्‍टॉपो में फत्‍ते को नमाज की शैलियां सिखानी शुरू हुई। पहले ही प्रयास में आह, फिर वाह :

कुमार सौवीर

लखनऊ : सचिवालय के आसपास आज दोपहर अचानक ही डुगडुगी बजने से लोग चौंक गये। साथ में ही गगनचुम्‍बी नारों पर टंकार सुनायी पड़ने लगी। संगत में थे  चिमटा, डमरू और खड़ताल, झमाझमा बजना शुरू हो गया। पता चला कि राजभवन के आसपास से यह जुलूस निकला है और सचिवालय के आसपास पहुंच गया है। जब मजमा जोरदार जुट चुका, तो माइक लेकर फलाने ने ऐलान कर दिया कि जोगियापुरा में फत्‍ते की चड्ढी कमलीवाले लोगों ने सुलगाकर छेददार बना डाली है। हाय हाय। फलाने का निष्‍कर्ष था कि कमल की यह चड्डी अब चड्ढी नहीं रही, बल्कि बिलकुल जाली बन गयी है, छलनी बन गयी है। जहां 72 नहीं, बल्कि अब तो बेशुमार छेद दिख रहे हैं। हवा, पानी, मच्‍छर, कीड़ा-मकौड़े आराम से आ-जा रहे हैं, जैसे एक्‍सप्रेस-वे पर हों। इस चड्ढी में जो भी रख दो, वह या तो उड़ जाता है, गिर जाता है या फिर टपक जाता है। पहनने का औचित्‍य ही बेमतलब हो गया है। पहनना या नहीं पहनना के बीच का फर्क भी गुम हो गया है। चड्ढी शब्‍द में जितने भी अक्षर हैं, सब छनछनाकर बिखरे जा रहे हैं।

बीच बाजार हंगामा हुआ तो खोजबीन शुरू हो गयी। पता चला कि फत्‍ते मूलत: कमलपुरम के रहने वाले हैं, और उनको जोगियापुरा के कुछ काली-कमली वालों ने फंसा कर बर्बाद कर दिया है। दरअसल,  फत्‍ते ने अपने बुढ़ऊ फलाने फुफ्फा से शिकायत की कि वे अपनी अलगनी पर चड्ढी सुखा रहे थे। इसी बीच भाईजारापार्टी के कुछ लोगों ने मना किया, बोले कि अगर अपनी चड्ढी सुखा कर उसमें बैक्‍टीरिया खत्‍म करना है, तो 25 लाख की आने वाली सुगंधित तेल की शीशी लेकर आना पड़ेगा। फत्‍ते के पास इतनी हैसियत नहीं थी, तो उन्‍होंने मना कर दिया। इस पर भाईजारापार्टी के महामंत्री उनील कंसल बाबू के इशारे पर सोयल बाबू ने उनकी चड्ढी में तेजाब डाल दिया। अब जब अनजाने में फत्‍ते ने उसे पहना, तो वह बुरी तरह कनकना पड़ा। मारे तेजाबी गरमी के, पूरा गुप्‍तांग झुलस गया।

यह शिकायत सुनते ही बुढऊ फलाने फुफ्फा का अंग-अंग फुंक गया। उनकी सलाह पर ही फत्‍ते ने ईमेल से फलाने फुफ्फा के पास शिकायत भेज दी। अब फलाने फुफ्फा चूंकि नागपुर में प्रशिक्षित हैं, इसलिए उन्‍होंने फत्‍ते की शिकायत पर पूरा ब्‍योरा-खर्रा लिख कर जोगियापुरा के मुखिया को एक चिट्ठी रजिस्‍टर्ड डाक में पोस्‍ट-ऑफिस को भेजी थी। यह भी दर्ज कर दिया कि डण्‍ठल बाबू 25 लाख रूपयों की तेल की शीशी क्‍यों मांग रहे हैं, उसका क्‍या इस्‍तेमाल करेंगे, किस पर प्रयोग किया जाएगा, वगैरह-वगैरह। वह ढमाके के आफिस पहुंची तो जरूर, लेकिन ढमाके के आफिस में किसी साजिश की तहत जोगियापुरा सचिवालय के दफ्तर की दराज से किसी ने चुपके से निकाल लिया है।

हालांकि कहने वाले लोग यहां तक भी कहते हैं कि अमित-टोला के उनील कंसल बाबू के इशारे पर ही जोगियापुरा में पूरा गैंग-संचालित होता है। जोगियापुरा-गैंग के मुखिया है सोयल बाबू। और जोगियापुरा-टोला में जितने लोग हैं, उनमें से ज्‍यादातर लोग उनील कंसल बाबू के इशारे पर हैं। अमित-टोला के गज्‍जू-बाबू ने ही उनील कंसल को वहां का जंगल-सेकरेटरी अधिकृत किया है। अब चूंकि जोगियापुरा के मूल निवासियों को उनील बाबू की अति-सक्रियता नापसंद है, इसलिए उन्‍होंने ही यह पत्र चुपके से उठाया है, और जनसाधारण के विचार-विमर्श हेतु उसकी फोटोकॉपी करवा कर  वायरल कर दिया है।

यह पता चलते ही कंसल बाबू की कमलिनी जैसी पत्तियां एकदम से भक्‍क-सुलग गयीं। उन्‍होंने जोगियापुरा के दारोगा ढिबरीदीन को बुलाया। मजेदार बात यह कि ढिबरीदीन कहने को तो जोगियापुरा में तैनात है, लेकिन असल में वह है अमित-टोला के उनील कंसल का खासुलखास। काम फन्‍नेदार करता है। ढिबरीदीन को खूब पता है कि फत्‍ते कहां मिलेगा, उसकी नस किधर है, डण्‍डा कहां से आयेगा, प्रवेश-द्वार किधर है, किस पर तरह को नमाज की शैली में झुकाया जाता है। ढिबरीदीन को खूब पता है। दारोगा है तो क्‍या हुआ, उसे कानून-शानून से तो कोई मतलब ही नहीं होता है। अरे घाट-घाट का पानी पिये हुए है यह ढिबरीदीन।

तो भइया, उसने गोल्‍डेन-चैरियट मंगवाया, जिसमें पचासों सारथी जुते हुए थे। यह स्‍वर्ण-रथ पूरे सम्‍मान के साथ फत्‍ते के घर पहुंचा। सारथियों ने बिना पूछे-ताछे फत्‍ते को अपने कांधे पर ऐसे टांग लिया जैसे फत्‍ते जी सीधे ओलम्पिक में गोल्‍ड-मैडल जीत कर लौटे हों। पब्लिक जयजयकारा लगाती ही रही, और ढिबरीदीन ने अपने गेस्‍टॉपो में फत्‍ते को नमाज की शैलियां सिखानी शुरू कर दी। पहले ही प्रयास में ही आह की चीत्‍कार निकली, और उसके कुछ ही मिनट बाद ही वाह-वाह वाह-वाह की स्‍वर-लहरियां बिखेरती कोयल की कू-हू कू-हू निकलने लगी। मौसम सुखद हो गया। जो बौर आम पर भराभर गया था, वह पके आम में तब्‍दील हो गया।

फत्‍ते सम्‍पूर्ण विश्राम के लिए अज्ञात-स्‍थान की ओर प्रस्‍थान कर गया, जबकि ढिबरीदीन ने डण्‍डा दूर फेंक दिया। उसका इस्‍तेमाल आखिर करते भी ढिबरीदीन, तो क्‍या करते। उसमें थोड़ी गंदगी जो लग चुकी थी न, इसलिए।

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