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"बिटिया जनी है" सुन कर मां ने नवजात को मार डाला

: ससुराल के लोग बोले कि बच्‍ची को भी खा गयी यह डायन : बच्चे का लिंग निर्धारण कर पाना तो दैव-इच्छा होती है : अल्टीमेटम मिल चुका था कि इस बार अब मुन्‍ना ही चाहिए : हर बार उसकी ससुराल में नामवाला वंशज यानी किसी कृष्ण के जन्म की प्रतीक्षा होती रहती : बेबस मां -तीन :

कुमार सौवीर

लखनऊ : (गतांक से आगे ) इसी बीच पीठासीन अधिकारी उस महिला से एक सवाल पूछ बैठा कि क्या तुम्हें अपनी नन्ही बच्ची का गला दबोचने और उसे मार डालने के पूरे दौरान एक बार भी उस बच्ची पर दया नहीं आई ?

सच बात यह है कि यह एक ऐसा माकूल सवाल था, जिसका जवाब हर शख्‍स चाहता था। सभी जानना चाहते थे कि उस बच्ची की हत्या करते समय उस महिला पर क्या भाव रहा होगा। उधर यह सवाल उठते ही इस महिला में मानो एक भयानक विस्‍फोट हो गया। उसके सब्र का बांध टूट गया। उसे फफक-फफक कर रोते देख पहले तो सारा न्‍याय-कक्ष भौंचक्‍का हो गया, लेकिन जल्‍द ही सभी लोग नम आंखों से हिचकियों की ओर बढ़ने लगे। भावावेश में बुरी तरह रोती हुई महिला ने जो कुछ भी बयान किया वह मौजूद सभी लोगों को भीतर तक हिला दिया। वहां मौजूद सभी लोग शर्म के मारे जमीन पर गड़े जा रहे थे। कोई भी एक दूसरे से आंखें नहीं मिला पा रहा था सभी लोग कनखियों से लेकिन भरी आंखों से उस महिला को देखने की कोशिश कर रहे थे सभी लोग सुनने को उतावले थे और महिला हिचकियों में अपने शब्द टप-टप गिरा रही थी।

महिला ने जो भी किस्सा बताया, उसके मुताबिक उसकी शादी गरीब 16 साल पहले हुई थी। ससुराल वाले बड़े अरमान के साथ प्रतीक्षा कर रहे थे कि उनकी बहू की गोद कब भरेगी और कब एक सलोना मुन्ना खिलखिलाता सभी के हाथों पहुंच जाएगा, पूरे घर को अपने किलकारियों से गुंजा देगा। लेकिन साल भर बाद जब इस परिवार में एक जन्‍म हुआ तो लोगों के मन पर जैसे कोई पक्षपात हो गया। वजह नहीं कि उस महिला ने कोई जीवित प्रसव नहीं किया बल्कि सच यह थी कि उस महिला ने मुन्ना नहीं, बल्कि मुन्‍नी जनी थी। यह घटना इस परिवार पर किसी गहरे तुषारापात से कम नहीं रही। सभी ससुरालीजन भी आखिर क्या करते। उन्हें अगले जन्म की प्रतीक्षा करनी थी, जब मुन्नी नहीं बल्कि घर का चिराग जन्मेगा। दो साल बाद फिर इस महिला ने फिर जन्म दिया। लेकिन हा-दैवयोग की ही बात तो थी कि इस बार भी इस महिला ने मुन्ना नहीं, बल्कि मुन्नी को जन्म दे दिया था।  पूरे घर पर जैसे कोई श्‍मशान बन गया हो। हर व्यक्ति गमगीन था। लेकिन फिर भी वक्त को बढ़ना ही था। अगले जन्म में लोग अपनी उम्मीदें पूरी होते देखना चाहते थे लेकिन इस महिला ने तीसरी संतान के तौर पर फिर एक मुन्नी पैदा कर दी। और उसके बाद फिर चौथी जन्‍मी मुन्नी, पांचवी भी मुन्‍नी, छठवीं भी मुन्‍नी, सातवीं मुन्‍नी और आठवीं भी मुन्‍नी ही पैदा हुई।

हर बार वह महिला गर्भवती होती गई, हर बार उसकी ससुराल में नामवाला वंशज यानी किसी कृष्ण के जन्म की प्रतीक्षा होती रहती। हर बार ऐसी सारी उम्मीद बुरी तरह टूटती। हर बार पिछले बार के मुकाबले पूजा, पाठ, मनौती, पनौती, संकल्प जैसे कार्यक्रम शुरू होते गए और हर बार ऐसे पाखंडों, टोटकों की असलियत टूटती रही। लेकिन सबसे ज्यादा प्रताड़ना तो उस महिला की होती थी जो पूरे परिवार के लिए जन्म भी दे रही थी और जन्म देने के बाद भी उस पर तानों और आरोपों का सैलाब थोपा जाता था। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह अब क्या करे। परिवार के लोग आखरी बार अल्टीमेटम दे चुके थे कि चाहे कुछ भी हो जाए, इस बार अब मुन्‍ना ही चाहिए। अब वह महिला अगर कुछ करती भी तो क्या करती। बच्चे का लिंग निर्धारण कर पाना तो दैव-इच्छा होती है। अगर दैव-इच्छा नहीं होती तो कृष्णजी अपनी मां देवकी के पहले ही प्रसव में जन्म में ही न पैदा हो जाते। क्यों उसके एवज में 8 बच्चियों को मौत के घाट उतारा जाता। वह महिला हमेशा चाहती थी कि अपने ससुराल के वालों की एक बच्चा पैदा कर उनकी बोलती बंद कर दे। लेकिन हर बार वह हार जाती थी। फिर अवसाद, अपनी ही शर्म से जमीन धंसने की लालसा पालने लगती थी।

कुछ ही दिनों बाद ही ससुराल वालों को पता चल गया कि बहू के पांव फिर भारी हैं। फिर टोटके लगाने शुरू हो गए, फिर पूजा-पाठ, फिर संकल्प, फिर पाखंड और फिर बार-बार यह ताईद करने की सख्त कोशिश कि चाहे कुछ भी हो, इस बार मुन्ना, और सिर्फ मुन्‍ना।

जो जैसे-जैसे दिन प्रसव के आने लगे, महिला की बेचैनियां और घरवालों के उत्साह मिश्रित आशंकाएं पूरे घर में जब जोड़ती जा रही थी। ऐन वक्‍त पर दाई बुलायी गयी। ससुराल वाले के लोग कान लगाये  धड़कनें थामे परेशान थे। दाई ने कुछ ही देर में अपना काम निपटाया, और फिर मायूस भाव में ऐलान किया कि:- बिटिया जनी है।

यह सुनते ही पूरा परिवार सन्नाटे में आ गया सभी लोग अपने-अपने कमरे में शोकाकुल हो गए। दाई अपने काम निपटा कर चली गई। बची वह महिला और उसकी वह बाकी आठ बच्चियां, जो आपस में हंसना, खेलना, रोना, चिल्लाना, झगड़ने में व्‍यस्‍त थीं। जबकि उधर महिला की मनोदशा बेहद गंभीर थी। उसकी समझ में ही नहीं आ रहा था कि उस से कौन सा अपराध हुआ। वह खुद को असहाय और निरर्थक मानने लगी। उसे खुद पर शर्म आ रही थी कि वह इतना भी नहीं कर पाई कि वह अपने ससुराल वालों की अपेक्षाओं के अनुरूप उन्हें गुड्डा दे पाती। इस महिला को पश्‍चाताप और अवसाद के साथ ही साथ धीरे-धीरे इस नई नवजात बच्ची के प्रति घृणा और क्रोध की ज्वाला की तरह धड़कने लगी। घृणा और उपेक्षा के चलते उसने इस नई जन्मी बच्ची को अपनी छातियों तक छूने तक की इजाजत नहीं दी। बच्ची रोती रही, लेकिन घर के बाकी लोग उसकी ओर बिल्कुल उपेक्षा भाव में थे। कौन उस अभागी बच्‍ची की ओर ध्‍यान देता।

पूरा दिन दिन बीत गया। अब वह बच्ची धीरे-धीरे रोने की आदत भूलती जा रही थी। वजह यह कि भूख-प्यास से वह अशक्‍त होती जा रही थी। इतना भी नहीं कर पा रही थी कि रो भी सके। साफ था कि वह भूख-प्यास से बेदम होती जा रही है। लेकिन इस महिला में क्रोध-घृणा और नैराश्‍य भाव लगातार बढ़ता जा रहा था।

और आखिरकार उसने सबके घरवालों के सामने ही उसे पटक कर मार डाला। घरवाले यही समझे कि उसकी मानसिक स्थिति बिगड़ गयी है, वह पगला गयी है और अब अपनी इस बच्‍ची को भी खा गयी यह डायन। (क्रमश:)

यह श्रंखलाबद्ध आलेख है। इसके बाकी किस्‍सों को पढ़ने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

बेबस मां

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