Meri Bitiya

Saturday, Mar 23rd

Last update02:57:01 PM GMT

मेरी बिटिया डॉट कॉम अगर आपको पसंद हो, आप इस पोर्टल के लिए सुझाव, समाचार, निर्देश, शिकायत वगैरह भेजने के इच्‍छुक हों तो meribitiyakhabar@gmail.com पर हम आपकी प्रतीक्षा कर रहे है.

Advertisement

हत्‍या-व्‍यथा। क्रूर मां नहीं, हत्‍यारे आप खुद हैं

: बेबस झांसी की रानी वाली यह दारूण-गाथा पूरे समाज की क्रूरता का प्रतीक है : मातृ दिवस पर नमन की नौटंकी नहीं, ठोस संकल्‍प लीजिए : नमन के बजाय अगर आप अपने स्‍वार्थों के बजाय समाज की महिलाओं की भावनाओं को सम्‍मान दें तो कितना भव्‍य माहौल बन जाए : बेबस मां -दो :

कुमार सौवीर

लखनऊ : इसके पहले कि घरवाले कुछ समझ पाते, अपनी सौरी ( प्रसव-कक्ष ) में लेटी वह महिला अचानक तेज आवाज में चीखी। उसने उस नवजात को उसकी टांगों से पकड़ा। बच्‍ची को उसी तरह उल्‍टा लटकाये हुए वह घर के आंगन तक चीखती हुई पहुंची। शोर सुन कर घर के लोग आंगन पर आ गये। इसके पहले कि वहां मौजूद कुछ लोग समझ पाते, धोबीपाट की शैली में महिला ने उस बच्‍ची को उस जमीन पर जोरों से पटक दिया। कई बार। तब तक, जब तक उस बच्‍ची लहू-लुआन होकर मौत के हवाले न हो गयी।

घरवाले यह समझ गये कि उस महिला की मानसिक स्थिति बिगड़ गयी है। वह पगला गयी, और अब अपनी इस नवीं बच्‍ची को खा गयी यह डायन।

मैं हमेशा आजीवन आभारी रहूंगा यूपी हाईकोर्ट में वरिष्‍ठ न्‍यायाधीश रह चुके अपने अग्रज समान शख्‍स का, जिन्‍होंने मुझे इस महिला की कहानी से पहचान करायी। इस श्रंखला में मैं इस महिला को हत्‍यारिन या डायन के तौर पर पुकारने का अपराध सपने में भी नहीं कर सकता। मेरे लिए तो यह महिला बाकायदा झांसी वाली बेबस रानी-मां थी। इस झांसी की रानी मां इतिहास में भले कोई प्रभाव नहीं डाल पायी, लेकिन उसने अपने क्रूरतम व्‍यवहार से अपने आसपास के समाज पर एक जोरदार तमाचा तो जरूर ही मारा। भले ही यह स्‍वीकारोक्ति उस महिला ने अपने पूरे भोलेपन में और अनजाने में ही कर डाली थी, लेकिन उसने उस भयावह सच का खुलासा कर दिया जिसे सुन कर मेरी आत्मा कांप उठी। भय और आत्‍मग्‍लानि से रोंगटे खड़े हो गए कि हम जैसे लोग ही समाज नामक ऐसी बेहद संवेदनशील संगठन को अपने निम्‍नतम व्‍यवहार के चलते ही उसे क्रूरतम संस्था का रूप देने में नहीं हिचकते हैं।

यह सज्जन हाईकोर्ट के पूर्व जस्टिस रह चुके हैं। बेहद सहज, सरल, तार्किक और माननीय भावों का समावेश है इन में। अपने न्‍यायिक जीवन में उन्‍होंने न केवल किसी घटना उसके पूरे कानूनी परिवेश में ही विवेचन कर फैसला देने की भरसक कोशिश की। लेकिन साथ ही साथ, जब कभी ऐसी घटनाओं का जिक्र होता है तो वह अपने फैसलों को दरकिनार कर उस घटना के मानवीय पक्षों को समझने के लिए अपने दिल को टटोलते हैं, और फिर खोजने की कोशिश करते हैं कि असल पीड़ा क्‍यों-कब-कैसे-कितनी-कहां है। सहज भी है, कोई व्यक्ति भले ही किसी पद पर हो, कभी न कभी अपने अंतर्मन को तो टटोलता ही है।

जैसा उन्‍होंने मुझे बताया, अपने एक नवजात बच्चे की हत्या के मामले में एक महिला अदालत में पेश की गई थी। यह महिला कोई और नहीं, बल्कि उस उसी नवजात मृत बच्ची की मां थी। कहने की जरूरत नहीं थी कि खचाखच न्याय कक्ष में मौजूद सभी लोग यह जानना चाहते थे कि यह महिला कैसे इतनी क्रूर हो गई जिसने अपने कलेजे के टुकड़े को अपनी छाती का दूध पिलाने, उसकी किलकारियों को सुनने और उसको दुलराने-सहलाने-चूमने के बजाय सीधे उनके मौत के घाट उतारने का फैसला कर लिया।

बस शुरू हो गई। वकीलों के बहस तर्क-वितर्क शुरू हुए। पूछताछ में महिला ने भी स्वीकार कर लिया कि उसने ही अपनी नवजीत बच्ची को मौत के घाट उतारा है। उसने कुबूल किया कि उस महिला ने उसने जो कुछ भी किया है, वह उसके लिए कुछ भी सजा भुगतने को तैयार है। साफ हो गया कि उस बच्ची की असली हत्यारिन वह महिला ही थी। उसकी इस स्‍वीकारोक्ति के बाद अब एक वकील का कहना था कि यह हत्‍यारिन है, इसलिए उसे फांसी दी जानी चाहिए। जबकि दूसरे पक्ष का तर्क था कि उस महिला का यह कृत्‍य उसके पागलपन के चलते हुआ है, इसलिए उसे पागलखाने में भेजा जाना चाहिए।

कुछ भी हो, कोई भी पक्ष इस बच्‍ची को उसकी ससुराल या उसके मायके में भेजने को तैयार नहीं था। सभी भयभीत थे कि न जाने कब यह महिला किसी अन्‍य पर भी इसी तरह का कातिलाना हमला कर दे, कोई भी भरोसा नहीं। (क्रमश:)

यह श्रंखलाबद्ध आलेख है। इसके बाकी किस्‍सों को पढ़ने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

बेबस मां

Comments (0)Add Comment

Write comment

busy