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सरकारी भूमि की लूट-गंगा: हर पत्रकार ने डुबकी लगायी

: चोर का दिल कित्‍ता, बस इत्‍ता भर। पकड़े जाने की भनक मिली, तो प्‍लॉट-श्‍लॉट छोड़ भाग निकले बड़े-बड़े पत्रकार : क्‍या न्‍यूज चैनल, क्‍या हिन्‍दुस्‍तान और क्‍या दैनिक जागरण और अमर उजाला, लूट में सब ने अपना हाथ धोया :

कुमार सौवीर

लखनऊ : तो गोंडा के बकैत और दबंग समाजवादी पार्टी के नेता तथा पूर्व मंत्री पंडित सिंह की सल्‍तनत जब चकनाचूर होकर भाजपा की सरकार की तूती बजने लगी, तो पंडित सिंह अपनी सारी हेकड़ी भूल गये और अपने में ही सिमट होने को मजबूर हो गये। जिले का प्रशासन और पुलिस महकमा अब नये वजीरों-सिपहसालारों की शह पर चलने लगा। प्राथमिकताएं बदलने लगीं। मौके की नजाकत देखते हुए एक वकील ने प्रशासन के पास एक अर्जी लगा दी कि सरकारी जमीन पर पत्रकारों ने अवैध कब्‍जा कर लिया है। सूत्र बताते हैं कि कहने की जरूरत नहीं कि इस नये विवाद से जुड़े लोगों को बदले समीकरणों के मद्देनजर बाकायदा राजनीतिक शरण भी थी। ऐसे में पहले प्रशासन के दफ्तरों में फंसी इस मामले से जुड़ी फाइलों पर धूल झाड़ने-फूंकने की कवायद शुरू हो गयी।

सूत्र बताते हैं कि नये प्रशासन के तेवर देख कर पंडित सिंह से जुड़े लोग खुद ही हैरान हो गये थे। उनके खेमे की समझ में ही नहीं आ रहा था कि वे अब अपनी खाल बचायें, या पत्रकारों को सौंपी गयी अवैध सल्‍तनत की पैरवी करें। नतीजा, पंडित सिंह ने इस विवाद से अपना पल्‍लू झाड़ लिया। यह देखते ही लाभान्वित हो चुके पत्रकारों की छुच्‍छी ही निकल गयी। अफरा-तफरी का माहौल हो गया पत्रकारों के खेमे में। अब चूंकि यह पत्रकारों की एकजुटता के चलते जमीन पर कब्‍जा नहीं हुआ था, बल्कि पंडित सिंह की करीबी ही उनके लाभान्वित होने की पहली और इकलौती शर्त बन गयी थी। ऐसे में लुटे-पिटे पत्रकारों ने अपनी इज्‍जत बचाये रखने का ही फैसला कर लिया और एक के बाद एक अधिकांश पत्रकार इस जमीन से अपना दावा चुपचाप छोड़ कर भाग गये।

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पत्रकार पत्रकारिता

सूत्र बताते हैं कि पंडित सिंह की इस योजना में तकरीबन 20 पत्रकारों को लाभ मिला। जिन पत्रकारों को बड़े-बड़े और मनचाहे साइज के प्लाट थमाये गये थे और प्‍लॉट मिलने के बाद जो पत्रकार उस अवैध जमीन पर अपना मकान बनाने के सपने पाले घूम रहे थे, इनमें दैनिक जागरण के धनंजय तिवारी, हिंदुस्तान के कमर अब्बास, अमर उजाला के अरुण मिश्र, न्‍यूज नेशन  और डीडी न्‍यूज के कैलाश वर्मा, बदलता स्वरूप के नरेंद्रलाल गुप्ता, पीटीआई के जानकी शरण द्विवेदी, हिंदुस्तान के ही संजय तिवारी के अलावा ओम शर्मा, यदुनंदन त्रिपाठी, दैनिक जागरण वाले गोविंद मिश्रा, जो सीतापुर चले गए हैं, ईटीवी और नेटवर्क- 18 के देव मणि त्रिपाठी और जी-समूह के अंबिकेश्वर प्रताप पांडे समेत कई पत्रकार शामिल थे।

खैर, यह तो रही पत्रकारों की यह राम-कहानी। लेकिन इससे भी ज्‍यादा दिलचस्‍प किस्‍सा तो उन लोगों का है, जो खुद को बहुत तेज-तर्रार और बहादुर साबित करने की डींगें हांका करते थे। सरकारी जमीन की इस लूट का खुलासा होने के बाद पत्रकारों ने डर के मारे अपना दावा तो उन प्‍लॉटों पर तत्‍काल छोड़ दिया। लेकिन मजेदार बात यह रही कि उनमें से अधिकांश अब इस बारे में कोई बात ही नहीं करना चाहते हैं। प्रमुख न्‍यूज पोर्टल मेरी बिटिया डॉट कॉम ने गोंडा के ऐसे प्रभावित पत्रकारों से सवाल पूछना शुरू किया, तो अधिकांश पत्रकारों ने इस बात से ही साफ इनकार कर दिया कि वे इस जमीन घोटाले में संलिप्‍त थे। ऐसे पत्रकारों ने हकलाते हुए जवाब दिया कि उन्‍होंने ऐसे धोखेबाजी वाले घोटाले का शुरू से ही विरोध किया था। ( क्रमश:)

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Comments (1)Add Comment
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written by कैलाश नाथ वर्मा, May 21, 2018
कुमार शौवीर जी अपनी जानकारी पक्की कर ले आप ने जो कीचड़ उछाला है उसमें कैलाश नाथ वर्मा का का दूर दूर तक कोई वास्ता सरोकार नही है लगता है कि आपने अपना मानसिक संतुलन खो दिया है जिसके कारण बिना किसी साक्ष्य सबूत के आप द्वारा कीचड़ उछाल दिया जाता है । जिस दिन आप उपरोक्त साबित कर देंगे उस दिन जिसमे आप का कुत्ता खाता है खिला दीजिएगा। आपने अच्छा सिला दिया,जब आपको आपके अन्य साथियों के साथ पब्लिक ने खदेड़ा था और पुलिस चौकी पर रोके गए थे तो मैंने ही मदद कर आपको साथीयो के साथ लखनऊ सुरक्षित भिजवाया था उसे भुलगये।

कैलाश नाथ वर्मा संवाददाता डीडी न्यूज़,न्यूज़ नेशन गोण्डा

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