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दबंग-नेता के फुसलाने से पत्रकार बर्बाद, पूंजी भी लुटी

: फ्री-फण्‍ड की जमीन की लूट-खसोट में अपना मन नहीं मार पाये पत्रकार, शनि की ढैया ने सपने बिखेर डाले : दबंग मंत्री की हुक्‍मउदूली कर पाने का साहस नहीं पाया था प्रशासन : किसी ने किसी से उधार लिया, तो किसी ने अपनी बीवी-मां के गहने गिरवीं-रहन कर पैसा जुटाया :

कुमार सौवीर

लखनऊ : आपको बता दें कि करीब 4 साल पहले गोंडा के एक बकैत और दबंग ठाकुर नेता के करीबी लोगों ने सरकारी जमीन का कब्जा किया था। उस वक्‍त यह नेता समाजवादी पार्टी में मंत्री की कुर्सी पर काबिज था। इसी नेता ने सोचा था कि अगर भविष्‍य में उसकी सरकार जमीन सूंघ गयी, तो उस सरकारी जमीनों का क्‍या होगा, जो उनके कब्‍जे में शामिल हो चुकी है। ऐसे में फैसला यह हुआ कि बाद में भी उनकी सरकार हटने की हालत में भी इस नेता के लोगों का कब्‍जा इस जमीनों पर बरकरार रहे, इसके लिए उन्होंने करीब 5 एकड़ जमीन का बंटवारा अपने कुछ खास पत्रकारों को दिलाने की कोशिश की थी। खास बात यह थी कि तब के प्रशासन ने इस कब्जे को विधिमान्य नहीं माना। मगर सरकार के दबंग मंत्री की हुक्‍मउदूली कर पाने का साहस नहीं पाया था प्रशासन। इसलिए सरकारी जमीन पर लालायित लोगों को इतनी सहूलियत जरूर मुहैया करा दी कि यह पत्रकार उस जमीन पर कब्जा करते रहें, लेकिन प्रशासन अपनी आंख नहीं खोलेगा।

सूत्र बताते हैं कि इस बकैत नेता का नाम है पंडित सिंह। सूत्रों के अनुसार मुलायम सिंह यादव ने एक मामले में बीमारी की हालत में अस्‍पताल पहुंचाने के लिए सरकारी हेलीकॉप्‍टर क्‍या दिला गया, पंडित सिंह की तूती बजने लगी। पंडित सिंह की पहचान अपने विरोधियों को अपने विरोधियों को एक ऐसे अभद्र और अश्लील बातें करने और फोन पर गालियां देने की रही है। पंडित सिंह ने अपनी यह छवि कुछ इस तरह बना ली है,  जो किसी को कहीं भी किसी भी सीमा तक गाली दे सकता है। उसके आक्रमण से बृज भूषण सांसद से लेकर आम पत्रकार और आम आदमी भी बुरी तरह आहत होता रहा है।

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विशाल ककड़ी: हाथ का हथियार, पेट का भोजन

लेकिन कुछ पत्रकारों ने पंडित सिंह की इस योजना को परवान चढ़ा दिया। मंत्री की इजाजत होते ही लेखपाल और तहसीलदार मौके पर पहुंच गये। जब बाकी पत्रकारों को इसकी भनक लगी, तो वे भी परस्‍पर राग-द्वेष भूल कर जमीन की इस लूटमार में शामिल हो गये। सूत्र बताते हैं कि पंडित सिंह को साफ लगा कि उनकी योजना सफलीकृत होने ही वाली है। पत्रकारों को इशारा दिया गया कि वे जल्‍द से जल्‍द अपने-अपने प्‍लॉट पर बाउंड्री बनवा लें, और यथाशीघ्र मकान बनवा लें। ताकि बाद कोई झंझट न हो पाये।

फिर क्‍या था, आनन-फानन सरकारी जमीनों की लूट मच गयी। किसी ने किसी से उधार लिया, तो किसी ने अपनी बीवी-मां के गहने गिरवीं-रहन कर पैसा जुटाया। कुछ लोगों ने इसके लिए दलाली की रकम लगायी, तो किसी ने अपने रिश्‍तों का वास्‍ता देकर मोटी रकम उगाही। जमीन की लूट न हुई, खाला का खजाना हो गया। जिसको देखो, वही फीता-इंची टेप लिये घूम रहा था। देखते ही देखते सभी ने कब्‍जा ले लिया। जिसके पास कम पैसा था, उसने छोटी बाउंड्री बनवायी, लेकिन जिसके पास कुछ ज्‍यादा रकम जुट पायी, उन्‍होंने ऊंची बाउंड्री तैयार करा दी। लेकिन दो पत्रकार ऐसे भी थे, जिन्‍होंने चुटकियों में ही अपने आलीशान मकान खड़े कर दिये। कुछ इस शैली में तत्‍परता दिखायी गयी पत्रकारों की ओर से, कि वे भविष्‍य में बाकी पत्रकारों को सरकारी जमीन पर अवैध कब्‍जा करने के अभियान के प्रति आम पत्रकारों और जन-साधारण में सजग, जागृत और प्रचार में जुटेंगे।

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पत्रकार पत्रकारिता

एक सूत्र ने चुटकी लेते हुए बताया है कि मानो इन पत्रकारों ने फैसला कर लिया है कि वे दीन-हीन पत्रकारों के बीच उन्‍हें अवैध कब्जा-मित्र के तौर पर सभी को बाकायदा  प्रशिक्षण देंगे। इसके लिए वे मौके पर जाएंगे ताकि उन्हें अवैध कब्जों और उस पर निर्माण करने के व्यवहारिक और जमीनी तरीकों से लैस किया जा सके। यह अवैध कब्जा मित्र पत्रकार इन पत्रकारों की उनकी आय के अतिरिक्त भी दीगर स्रोतों को जुटाने के लिए प्रशिक्षित करेंगे। और वह भी बिना हींग फिटकरी के।

जिस भी पत्रकार से इस बर्बाद-किस्‍सा से बातचीत की गयी, उसने बहुत पीड़ा के साथ इस मामले में पंडित सिंह और प्रशासन को आड़े हाथों लिया। उन्‍होंने बताया कि वे लालच में फंस गये। एक वरिष्‍ठ प्रशासनिक अधिकारी ने स्‍वीकार किया कि तब के मंत्री पंडित सिंह इस मामले में खासा दबाव बनाये रखे थे। लेकिन पंडित सिंह से बातचीत करने की कई कोशिशें की गयीं, लेकिन उनसे बात नहीं हो पायी। (क्रमश:)

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