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बहुत खबर-डरपोंक निकला लखनऊ का बड़ा दरोगा

: गीदड़ों के झुंड में फंसा शेर भी बहुत असहाय हो जाता है : थाने की ड्योढ़ी पर नाक रगड़ना शुरू करने की नौबत आ गयी : बड़े दरोगा की शान में गुस्ताखी की है उस पत्रकार ने, हम डंडा पेलेंगे :

कुमार सौवीर
लखनऊ :
एक खबर क्या छप गयी, लखनऊ के आला टोपीक्रेट के सिर की टोपी और पैरों तले जमीन डोलने लगी। इंस्पेक्टरों से लेकर पश्चिम क्षेत्र के एसपी तक की परेड करा दिया एसएसपी ने। एसएसपी को सम्मानित करने वाले व्यवसायियों की चूड़ी भी टाइट कर दो। मकसद सिर्फ इतना कि इस खबर लिखने वाले रिपोर्टर की एसएसपी के सामने पेशी कराओ, और माफी मंगवा कराओ। लेकिन इससे पहले तो वह खबर रुकवा दो।
किस्सा कोताह यह, कि अमीनाबाद के कुछ व्यवसायियों ने राजधानी के बड़े दरोगा यानी एसएसपी दीपक कुमार का सम्मानित करने के लिए एक छोटा सा समारोह आयोजित किया था। इस छोटे से समारोह में दीपक कुमार पों-पों सायरन बजाते बड़े लाव-लश्कर के साथ आये। माला-शाला पहना, गुलदस्ता थामा, इधर-उधर बोतल से पानी निकाल पर पानी पिया,
बिस्कुट-काजू भी कुतरा, तोहफे में मिली तलवार को म्यान से निकाल कर उसे भांज दिया भी। कुछ इस तरह कि वही होगा, जो अब तक किसी भी पूर्ववर्ती से हर्गिज नहीं हो पाया था। मोबाइल पर सर्फिंग की। इसी बीच सरकार-बहादुर को नींद आ गयी, तो लगे खर्राटे लेना। एक पत्रकार ने उनके सोते वक्त की फोटो खींच ली। फोटो मिली तो पत्रकार ने उस पर खबर लिख दी। तो बस तहलका मच गया।
लखनऊ के एसएसपी दीपक कुमार ने यह खबर पढ़ी तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। फिर पहले तो उस समाचार संस्थान को फोन करने के लिए पश्चिम क्षेत्र के कप्तान को टाइट किया। कप्तान ने उस संस्थान के मालिक और संपादक की चूड़ी कसना शुरू कर दिया। नतीजा, खबर हटा दी गयी। यकीन चूंकि बड़े दरोगा का गुस्सा सातवें आसमान पर था, इसलिए सूत्र बताते हैं कि उसके बाद अमीनाबाद के इंस्पेक्टर को टाइट किया गया। इंसपेक्टर की पैंट ढीली होने लगी तो उसने उन आयोजक व्यवसाइयों की कलई उतारने की कवायद शुरू कर दी।
उधर जब व्यापारी लोगों को जब पुलिस वालों की ऐसी तत्परतानुमा करतूत का पता चला, तो उनके दिल-दिमाग तक पर हवाइयां उड़ने लगीं। दांव उल्टा पड़ते देख सबके होश गुम होने लगे। लगे सब हलकान होने। थाने की ड्योढ़ी पर नाक रगड़ना शुरू करने की नौबत आ गयी, तो बोले,  "सरकार हजूर अन्नदाता माई-बाप! मेरी क्या गलती जो जुलुम चल रहा है? बताओ मैं क्या करूँ?"
पुलिस ने दिखाया डंडा, और कहा कि इस पत्रकार को हवालात तक पहुंचाना है। बड़े दरोगा की शान में गुस्ताखी की है उस पत्रकार ने। हम उसके भित्तर डंडा पेलेंगे। जिम्मेदारी तुम्हारी है, तुमने ही समारोह किया था। अब तुम ही समझना। बचना चाहते हो तो इसके लिए एक अर्जी लिखो। मैं रिपोर्ट दर्ज कर उसका तियाँ-पांचा कर दूंगा।
थाने पर ही व्यापारियों ने अर्जी लिखी और थमा दिया अमीनाबाद के इंस्पेक्टर को। उसने फौरन अपनी जांच रिपोर्ट लिख दी यह खबर दुष्ट भावना से लिखी गई है और इसका कड़ा दंड दिया जाना उचित होगा। फेसबुक और ट्विटर पर अपना पेज बनाये पुलिस वाले अपना सारा कानून-व्यवस्था का धंधा छोड़छाड़ के सिर्फ इसी की प्रतीक्षा कर रहे थे। अपलोड कर दिया कि सारा गड़बड़ इस पत्रकार की ही है।
इस पर जब बड़े दरोगा से जोहेब से बातचीत की तो दीपक कुमार का कहना था कि खर्राटे लेने की कोई बात ही नहीं थी। दरअसल वे उस समारोह में सो नहीं रहे थे बल्कि चिंतन कर रहे थे। और चिंतन भी ऐसा वैसा नहीं समाज और लखनऊ की सुरक्षा कानून व्यवस्था और शांति को बनाए के लिए रणनीति तैयार करने के लिए मदद कर रहे थे। और यह इसलिए आवश्यक था ताकि राजधानी के बड़े आला अफसर और मंत्री संत्री के साथ ही साथ मुख्यमंत्री और राज्यपाल भी ठीक से मंथन और चिंतन की अपनी प्रक्रिया चिंतानीय बना सकें। इसके लिए मनन में जुटे थे मगर तुमने उलटी-उलटी खबर लिख दी। इससे मनन की सारी प्रक्रिया ही भ्रष्ट हो गई है। चलो आओ, माफी लिखो।
मरता क्या न करता। बिल्ली की मांद में चूहा बेहद असहाय होता है। जुहेब आलम ने बड़े दरोगा को यह लिख कर के दे दिया कि, "यह हो सकता है मुझसे कोई गलती हुई हो, कोई भ्रम हुआ हो. इसलिए मैं गलती मान रहा हूं।"
लेकिन सवाल यह है इस मुद्दे को लखनऊ के बड़े दरोगा ने अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न क्यूं बना लिया।
कुछ ना कुछ खास बात तो है ही।

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