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पत्रकार हैं बांगड़-बिल्‍ला, आज फिर मनायेंगे श्रमिक-दिवस

: अभी भी वक्‍त है। कलम में ईमानदारी की स्‍याही भर कर मैदान में उतरो और दल्‍लागिरी बंद करो : क्‍या तुम्‍हें पता है कि समाज में आज कोई तुम्‍हें दलाल कहता है, तो कोई खबरंडी : अधिकांश लोग तो पत्रकारिता की अर्थी सजाने में व्‍यस्‍त हैं : श्रमिक-दिवस एक :

कुमार सौवीर

लखनऊ : बाकी बात तो बाद में होगी, सबसे पहले तो उन झंडाबरदारों की जमात से कुछ सवाल पूछना लाजमी और बेहद जरूरी है जो खुद को समाज का सबसे जिम्‍मेदार कहते-कहलाने में दर्प-घमंड पाले घूमा करते हैं। यह न इधर के होते हैं, और न ही उधर के। मगर खुद को दोनों ही ओर के लोगों में शुमार होने के दावे करते हैं। यह लोग खुद को पीडि़त-उत्‍पीड़त सर्वहारा श्रमिक समाज का नुमाइंदा और उनकी आवाज उठाने वाला होने का दावा करते हैं। जबकि दूसरी ओर आसन लगाये और पूंजी पर काबिज लोगों की जी-हुजूरी करते हैं। मकसद यह कि कैसे भी हो, उनका पेट भरता रहे। यह सरकारी रकम हड़पने की जुगत भिड़ाते रहते हैं। मगर कभी भी श्रमिक वर्ग के बारे में कोई भी आवाज नहीं उठाते।

जी हां, सही सोचा आपने। मेरा यह सवाल उपत्रकार-बिरादरी से जुड़े अधिकांश लोगों से ही है। ऐसा नहीं कि सारे पत्रकार घटिया हैं और पत्रकारिता को कलंकित कर रहे हैं। यह कहना गलत होगा। लेकिन यह भी सच है कि इस बिरादरी के अधिकांश लोगों के बारे में आम आदमी की राय बेहद गम्‍भीर है। कोई तुम्‍हें दलाल कहता है, तो कोई तुम्‍हें खबरंडी पुकारता है। कोई भांड़ कहता है, तो कोई घुटिया बिचौलिया। जो चुल्‍लू भर दारू में अपनी आत्‍मा बेचने पर आमादा होता है। लखनऊ हाईकोर्ट के अधिवक्‍ता जीएल यादव ने आज लिखा है कि, "भारतीय मीडिया गूँगी , अन्धी और बहरी हो गयी है। इनकी आत्मा तक बिक गयी है। देश की दुर्दशा पर ऐसी चुप्पी!"

तो ऐसा है पत्रकार जी, तुम बताओ तो कि, तुम श्रमिक दिवस मनाने वाली नौटंकी काहे करते हो? खुद को इजारेदारों के खिलाफ आवाज उठाते हो, मगर कभी भी तुमने अपने समाचार-संस्‍थान के मालिकों की करतूतों पर कोई आवाज ? तुम बताओ न कि ओवर-टाइम और बोनस जैसे शब्‍द अब तुम्‍हारी आवाजों से गायब कैसे हो गये? किसी भी संस्‍थान में चल रहे उत्‍पीड़न पर तुम अपनी आवाज उठाने के बजाय सीधे सम्‍पादक के तलवे चाटने पर ही क्‍यों आमादा रहे हो? मजीठिया आयोग ने तो तुम्‍हारे लिए सारे रास्‍ते खोल दिये थे, लेकिन तुम ही लपक कर मालिकों के पक्ष में चिट्ठी-पत्री लिखना शुरू कर देते हो, आखिर काहे? तुम्‍हारे सारे नेता क्‍यों कलंकित चेहरा काहे रखे घूमा करते हैं? झूठे नारे, झूठे दावे। किसकी रकम से तुम देश-विदेश घूमा करते हो? कौन होता है तुम्‍हारा फाइनेंसर? और उसका मकसद क्‍या होता है ऐसे आर्थिक सहयोग देने का? अपनी मर्दानगी दिखाने के लिए खुद को श्रमिक कहलाते हो? जबकि हो पक्‍के नपुंसक। कापुरूष। खैर, जल्‍दी ही तुम लोगों पर तो अब एक श्रंखलाबद्ध आलेख रिपोर्ट तैयार कर ही रहा हूं। प्रतीक्षा करना।

तुम ठेके पर काम करते हो, यानी ठेकेदार हो। है न?  विज्ञापन का काम करते हो, इसलिए विज्ञापन प्रतिनिधि हो। है न? इधर की बात उधर लगाते हो, इसलिए चुगलखोर हो। हो न? इधर की बात उधर लगाते हो, इसलिए चुगलखोर हो। हो न? गड़बड़ काम कराने का जिम्‍मा लेते हो, इसलिए दलाल हो। हो न? आम आदमी से पैसा उगाहते हो, तो ब्रजेश सिंह और मुन्‍ना बजरंगी हो। हो न? अफसरों-नेताओं का चरण-चुम्‍बन करते हो, तो भांड हो। हो न? चलो, मान लिया कि तुम सजग पत्रकार हो। तो फिर यह बताओ कि मुख्‍तार अंसारी को पिछले महीनों जब तबियत खराब होने के दावे पर लखनऊ भेजा गया था, तो उसकी असलियत क्‍या थी? उस पर तुमने कौन सी खबर लिखी? वह क्‍या वजह है कि एक-समान घटना पर अलग-अलग झूठों वाले तथ्‍यों वाली रिपोर्टिंग तुम कैसे लिख पाते हो। क्‍या वजह है कि तुम्‍हारे जैसों की अधिकांश खबरें आखिरकार झूठी या बकवास साबित हो जाती हैं।

जो काम तुम्‍हारा काम है वह तुम करते नहीं, और जो काम तुम्‍हारा नहीं है वही काम तुम लपक-लपक कर करते घूमा करते हो। आज से दो-ढाई दशक पहले तक श्रमिक जगत की खबरें अक्‍सर और खूब छपा करती थीं, लेकिन अब उन्‍हें जगह नहीं मिल पाती है। वजह तुम बताओ न कि आखिर ऐसा क्‍यों हो रहा है। खबरें लिखते वक्‍त कहां घुस जाती है तुम्‍हारी श्रमिक-संवेदनशीलता?

तुम्‍हारा काम खबर लिखना है, लेकिन तुम मालिकों को तेल लगाने से ही फुरसत नहीं पाते हो न? जहां मालिक कमजोर हुआ, तो वहां सम्‍पादकों के लिए धंधाबाजी करना शुरू कर देते हो न? फर्जी खबरें लिखने में तुम्‍हें महारत है। आम आदमी की खबर को डस्‍टबिन पर फेंकते हो, जबकि कोई बड़ा-बाबू टाइप अफसर अगर पाद भी मारे तो उस पर बाकायदा कालिदास की तरह पाद-शाकुंतलम जैसा महाग्रंथ तक लिख मारोगे। कुछ दिन पहले ही वरिष्‍ठ फोटो-पत्रकार आरबी थापा ने पत्रकारों से चुनौती दी थी कि पत्रकारिता में जुटे लोगों में अधिकांश लोगों को अगर राष्‍ट्र-गीत लिखने को कहा जाए तो वे बगलें झांकना शुरू कर देंगे।

तो गुजारिश है तुमसे मेरे दोस्‍त। अभी भी सम्‍भल जाओ। दल्‍लागिरी बंद करो। कलम उठाओ, और पैनी खबरें लिखने की कोशिश करो।

हालांकि मुझे पता है कि यह कर पाना तुम्‍हारे वश की बात नहीं रही है अब। (क्रमश:)

कार्ल मार्क्‍स ने नारा दिया था कि दुनिया भर के मजदूरों एक हो। लेकिन यह नारा अब चिंदी-चिंदी बिखर चुका है। किसी आदर्श का इतना अपमान शायद ही कभी हुआ हो, जितना इसका हुआ। बहरहाल, आज विश्‍व मजदूर दिवस है। इसी मौके पर यह श्रंखलाबद्ध आलेखनुमा रिपोर्ट तैयार की गयी है। इसकी अगली कड़ी को देखने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

श्रमिक-दिवस

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