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मेहरबान ! आज होगी नौटंकी "आला अफसर"

: लखनऊ के रंगमंच पर 35 बरस के बाद होगा इस नौटंकी का मंचन : मुद्राराक्षस कृत इस नौटंकी का निर्देशक हैं प्रख्‍यात रंगकर्मी आतमजीत सिंह : गोमती नगर के पर्यटन भवन के सामने स्थित संत गाडके प्रेक्षागृह में सायंकाल सात बजे से होगा "आला अफसर" का मंचन : प्रवेश नि:शुल्‍क। प्रथम आगत, प्रथम स्‍वागत :

कुमार सौवीर

लखनऊ : एक वक्त हुआ करता था जब स्‍वांग-सफेड़ा और नौटंकी जैसे सांस्कृतिक माध्यम समाज में सशक्त माने जाते थे। केवल मनोरंजन ही नहीं, बल्कि जन जागरण के लिए भी इनका प्रयोग इन माध्यमों ने इस्तेमाल किया जाता था। चाहे वह आजादी आंदोलन का मामला रहा हो, या फिर सामाजिक जागरूकता का, इन माध्यमों ने अपनी उपयोगिता और उपादेयता लगातार साबित साबित की है। स्‍त्री-सश‍क्‍तीकरण, दहेज, विधवा विवाह, सती प्रथा, कन्‍या विवाह और छुआछूत व जातिपांति को लेकर भी इन सांस्‍कृतिक माध्‍यमों ने बेहद प्रभावशाली भूमिका निभायी है। एक जमाने में तो नौटंकी किसी भी छोटे-मोटे मेले-ठेले का भी अनिवार्य अंग हुआ करती थी। बहराइच और बाराबंकी के देवा समेत किसी भी मेले में नौटंकियों की एकाधिक प्रेक्षागृह तैयार किए जाते थे जो पूरी तरह स्थाई रूप से होते थे। नगाड़े की थाप और हारमानियम सुर-लहरियों से लैस नौटंकी का सबसे बड़ा स्तंभ अंतिम रूप में कानपुर का गुलाबो नौटंकी एंड कंपनी माना जाता है।

जबकि स्‍वांग-सफेड़ा की घुसपैठ छोटे-मोटे गांव और पुरवा में भी धमक मचा देती थी। वजह एक तरफ जहां नौटंकी का आयोजन एक बड़े संगठन हित रूप में ही हो पाता था, और उसमें तकरीबन एक दर्जन से ज्यादा कार्यकर्ता व कलाकार अपनी भूमिका निभाते थे, वहीं स्‍वांग-सफेड़ा दो से लेकर अधिकतम पांच लोगों से ही सम्‍पन्‍न हो जाता था। नौटंकी रात भर चलती थी जबकि स्वांग सफेड़ा का समय अधिकतम आधी रात तक ही चलता था। नगाड़ा और हारमोनियम के अलावा लाउडस्‍पीकर और पंचलैट इस के आयोजन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण यंत्र हुआ करते थे।

अभी करीब पहले 35 साल पहले तक लखनऊ में नौटंकी का आयोजन हुआ था। हालांकि आज भी लखनऊ के दूर-दराज कभी-कभार नौटंकी के नगाड़ों की आवाजें सुनायी जाती हैं, लेकिन वह लगातार सिमटती ही जा रही हैं। वजह यह कि नए-नए मनोरंजन माध्यमों ने नौटंकी की जमीन खोदकर उन्हें बहुत दूर तक खदेड़ दिया है। सच बात कही जाए तो नौटंकी जड़ें ही खुद चुकी हैं, और उससे जुड़े कलाकार अब दीगर कामों में भिड़ चुके हैं।

मगर आम आदमी के सरोकारों से जुड़े लोगों और कलाकारों ने नौटंकी को अपने माध्यम के तौर पर हमेशा अपनाया, और आम आदमी से जुड़े मसलों और समाज के विभिन्‍न पहलुओं को मनोरंजन के माध्‍यम के तौर पर वह चुटीले अंदाज में पेश किया। यह ऐसा अनोखा माध्यम लखनऊ से 35 साल पहले खत्म हो गया, लेकिन उसके पहले मुद्राराक्षस और आतमजीत सिंह जैसे दुर्दमनीय और निष्‍ठावान कलाकारों ने इसे अपने जीने और अपने दिल-दिमाग को खुराक का मकसद बना दिया। अपनी जिजीविषा के चलते मुद्राराक्षस में अपनी नौटंकी आला अफसर को तैयार किया था।

और अब आतमजीत सिंह उसी आला अफसर नौटंकी को लेकर लखनऊ में धमाके करने जा रहे हैं। नाम है आला अफसर। इस का निर्देशन आतमजीत सिंह कर रहे हैं। आपको बता दें कि आतमजीत सिंह केवल लखनऊ और प्रदेश ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर के संस्कृतिकर्मी हैं और उन्होंने दर्जनों नाटकों नौटंकियों को मंच तक उतारा है।

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