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रेप पर अध्‍यादेश, यानी जनाक्रोश का नकदीकरण

: ऐसे हादसों की लहर जब देश को अशांत कर दे, तब राष्‍ट्रव्‍यापी बहस की जरूरत होती है, त्‍वरित फैसलों की नहीं : मुझे बलात्‍कार-हत्‍या जैसे जघन्‍य अपराधों से घृणा है, लेकिन फांसी जैसे दंड से भी नफरत : हाईकोर्ट ने अध्‍यादेश पर जायज सवाल उठाये : सरकार ने जनाक्रोश थामा है, या उसे अपने पक्ष में कैश किया :

कुमार सौवीर

लखनऊ : पिछले दो महीनों से बलात्‍कार की घटनाएं हमारे देश में दमघोंटू कोहरे की तरह पसरती रही हैं, जिसमें देशवासियों की आत्‍मा बुरी तरह छटपटा रही हैं। मोड़ ऐसे खतरनाक मोड़ पर है जहां रेप जैसे जघन्य अपराध शब्द सुनते ही पूरा समाज क्रोध से भड़क जाता है। ऐसी हालात में राजसत्‍ता का दायित्‍व होता है कि वह ऐसे प्रकरणों पर सको लेकर भड़के गुस्‍सों को थामने की कोशिश करे, देश-व्‍यापी बहस छेड़ने का माहौल तैयार करे, ऐसे हादसों के कारणों को खोजने की कोशिश करे, और गुण-दोषों के आधार पर ऐसा कोई रास्‍ता खोजे, जो सर्वमान्‍य बन सके। लेकिन हैरत की बात है कि इस मामले में केंद्र सरकार ने जो रास्‍ता अख्तियार किया, उसमें समाधान का सद्-प्रयास तो न्‍यूनतम था, जबकि उस माहौल को अपने राजनीतिक पक्ष में मोड़ने की कवायद शामिल थी।

आज मैं भी रेप से जुड़े कुछ तथ्य आपके सामने पेश करना चाहता हूं। मैं बलात्कार से सख्त नफरत करता हूं और ऐसे दुष्कर्म करने वालों की निंदा करता हूं। लेकिन जिस तरीके से इधर कुछ समय से बलात्कार और खासतौर पर नन्ही बच्चियों के साथ दुराचारों उसके बाद उनकी हत्या के हादसे सामने आए हैं उसको लेकर सरकार ने मुजरिमों के लिए मौत की सजा मुकर्रर की है, मैं इसकी सख्त मुखालिफत करता हूं। हाईकोर्ट ने भी आज इससे संबंधित याचिका पर टिप्पणी की है और सरकार से पूछा है कि इस अध्यादेश में प्रताड़ित बच्चियों की उम्र 12 बरस तक रखने का क्या औचित्य है और उसके प्रति सरकार का नजरिया और आधार क्या है।  हाईकोर्ट के सवाल-जवाब से कम से कम इतना तो सही हो गया है कि केंद्र सरकार द्वारा इस मसले पर आनन-फानन लिया गया फैसला पूरी तरह निर्दोष नहीं है। जाहिर है इस से आने वाले वक्‍त में खासी दिक्कतें सामने आ सकती हैं।

इन हालातों में हमें देश के नेतृत्व से इससे जुड़े कुछ सवाल तो पूछना ही चाहिए। जनता को जानना चाहिए कि अचानक बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों का तूफान कैसे खड़ा हो गया, वह क्या हालात थे जब सरकार को फांसी का फैसला लेना पड़ा। और सबसे बड़ा सवाल तो यह कि इतना बड़ा फैसला लेने के पहले सरकार ने केवल गुस्साए और तमतमाए हुए जनाक्रोश के सामने अपने घुटने टेक दिए या फिर उस जनाक्रोश का अपने पक्ष में नगदीकरण की प्रक्रिया पूरी कर ली।

सरकार को जवाब देना चाहिए कि उसने इस पूरे मामले में देश के लोगों के गुस्से के सामने चटपट फैसला क्‍यों लिया। जबकि उसे इस पूरे मामले को सबसे पहले शांत करने की कवायद करनी चाहिए थी, और उसके बाद बेहद शांत चित्त हो चुके देश की भावनाओं पर राष्ट्रव्यापी बहस करनी चाहिए थी। जहां वह इस पूरे बलात्कार के माहौल के कारणों, उनके उफान और उसके  सामाजिक-राजनीतिक  फलकों पर  व्यापक बहस छेड़  कर आम जनता को जागरुक करती और फिर एक समवेत स्वर में एक फैसला लेती। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि सरकार ने इस मामले पर बेहद हल्के तरीके से ही फैसला लिया और फैसला लेने का उसका तरीका पूरी तरह से मनमर्जी भरा था।

इस मसले पर सरकार ने फैसला तो किया, लेकिन वह स्‍वस्‍थ समाज का फैसला नहीं था, यह वह फैसला नहीं था जो एक शांतचित्‍त देश का होना चाहिए था। बल्कि सच बात तो यही है कि इसमें सरकार ने जनआक्रोश को अपने राजनीतिक लाभ के लिए नगदीकरण जैसा षडयंत्र चक्र रच लिया।

हैरत की बात है कि बस चंद घटनाएं हुईं, मीडिया ने उसे उछाला और राजनीतिक दलों ने उसे भड़काया। फिर सरकार ने एक के बाद एक अपने तुरुप के पत्ते खोलने शुरू किए और आखिरकार केंद्र सरकार ने एक अध्यादेश तैयार कर राष्ट्रपति को भेज दिया कि रेप करने वाले मामलों पर अभियुक्तों को फांसी की सजा दे दी जाएगी। राष्‍ट्रपति ने आनन-फानन इस पर फैसला कर लिया कि फांसी दी जाएगी।  (क्रमश:)

इधर नन्‍हीं बच्चियों के साथ हुईं बलात्‍कार के बाद हत्‍याओं की आंधियों ने साबित करने की यह मजबूत पैरवी शुरू कर दी है कि हमारा देश एक अराजक समाज की शक्‍ल अख्तियार करता रहा है। लेकिन इसके पहले कि इस मामले पर कोई सार्थक राष्‍ट्रीय बहस हो पाती, सरकार ने उन हादसों से भड़कीं जन-भावनाओं पर जो फैसला किया, वह किसी भी सभ्‍य देश को सवालों के कठघरे में खड़ा कर देता है। बहरहाल, इस पर हम एक श्रंखलाबद्ध लेख प्रकाशित करने जा रहे हैं। आपसे अनुरोध है कि हमारे इस अभियान पर आप भी जुड़ें और खुद भी अपनी राय व्‍यक्‍ त करें। आपकी भावनाओं को हम पूरे सम्‍मान के साथ अपने प्रख्‍यात न्‍यूज पोर्टल www.meribitiya.com पर प्रकाशित करेंगे। अपनी राय आप हमारे ईमेल This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it पर भेज सकते हैं।

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रेप पर रेप्‍चर्ड फैसला

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