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बच्चियों पर यौन-हमले: अरे हम बाप हैं, दुष्‍कर्मी नहीं

: सच कहूं, तो ऐसे शैक्षिक वीडियों ने तो सारे मर्दों को रेपिस्‍ट साबित करने में कोई कसर तक नहीं छोड़ी : अरे यह तो बताओ कि उनसे लिपटा शख्‍स पुरूष-मात्र नहीं, बल्कि उनका अपना ही असली बाप है : आखिरकार आप और हम कैसे तरह का समाज निर्माण करने पर आमादा हैं :

कुमार सौवीर

लखनऊ : वाट्सऐप पर अभी एक वीडियो आया है, पूरी तरह शैक्षिक। बच्चियों के साथ हो रही अभद्र यौन-उत्‍पीड़न को लेकर बेहद प्रभावशाली तरीके से गम्‍भीर बातचीत की गयी है इस वीडियो में। बताया जा रहा है कि बच्चियों के साथ होने वाली अभद्र-अश्‍लील यानी यौन-अपराधों की हरकतों का केंद्र और उनके स्‍पर्श-इंद्रियों पर सतर्कता को लेकर बच्चियों को क्‍या प्रतिक्रिया करनी चाहिए, कि सीमा तक, और किससे करनी चाहिए।

मगर मेरे अनुभव और मेरी प्रवृत्तियां बिलकुल अलहदा हैं, जो उस वीडियो की शिक्षा से हल्‍का-सा भिन्‍न भी हैं। मसलन, मैं अपनी बेटियों की उम्र की बेटियों को मिलते समय अथवा उनसे विदा लेते वक्‍त उनका सिर चूम लेता हूं। ऐसे हर वक्‍त में मुझे साफ लगता है कि मैं अपनी प्राणों से प्‍यारी बेटियों को ही महसूस कर रहा हूं। मैंने हमेशा पाया है कि ऐसी बच्चियां मेरे सामने खुद ही अपना सिर झुका कर अपने सिर को चूमने देने की इजाजत मुझे देने पर गर्व की अनुभूति महसूस करती हैं। कम से कम तो इस बारे में किसी भी बच्‍ची ने इस बारे में कोई भी ऐतराज जाहिर नहीं किया है। न मुझसे, न मेरी बेटियों से और न ही किसी अन्‍य से। बल्कि वे सब हमेशा मुझसे स्‍नेह और आत्‍मीयता से पेश आती हैं। मेरे सामने आते ही वे अपना सिर खुद ही मेरे सामने झुका देती हैं। खिलखिलाती हैं, और उसके बाद हाथ मिलाती हैं मुझसे। कुछ तो लिपट तक जाती हैं मुझसे। पूरे स्‍नेह और आत्‍मीयता के साथ। जैसे उनके साथ लिपटा शख्‍स कोई पुरूष नहीं, बल्कि उनका अपना ही असली बाप हो।

सच कहूं ? इस वीडियो ने तो मुझे कठघरे में खड़ा कर दिया है। यह वीडियो बता रहा है कि सिर के बाल तक छूना भी अपराध है, और ऐसी हरकत करने वाले शख्‍स की कुत्सित का परिचायक है, बच्चियों को उससे बचना चाहिए। ऐसा करने वाले शख्‍स पर फौरन तेज आवाज में, और चिल्‍ला कर प्रतिवाद करना चाहिए।

अब आप बताइये न, कि मुझे क्‍या करना चाहिए।

खास तौर पर तब, जबकि मुझे हमेशा यही लगता रहा है कि किसी भी शिक्षक को अपने विषय को उठाने और उसकी व्‍याख्‍या करने का दायित्‍व निभाना ही चाहिए। किसी भी शिक्षक के हर तर्क हर कसौटी पर बिलकुल सटीक ही हों, ऐसी गारंटी देने की कोशिश करने से किसी भी शिक्षक को बचना चाहिए।

मेरे दोस्‍तों। हमें हर कीमत पर अपनी बच्चियों को बचाना है ताकि उन पर मंडराते खतरों से उन्‍हें सुरक्षित छाता मुहैया कराया जा सके। यह कोशिश दुनिया की हर कीमत चुका कर ही निपटानी होगी। लेकिन इसके साथ ही हमें यह भी देखना होगा कि बच्चियों के प्रति होने वाले ऐसे जघन्‍य अपराधों की आड़ में कहीं ऐसे निर्दोष रिश्‍तों के धागे-तन्‍तु तो नहीं टूटे-बिखेरे जा रहे हैं, जो मानवता की सर्वोच्‍च और प्राथमिक पाठशाला में कत्‍ल हो जाएंगे।

और अगर ऐसा हुआ, तो न हम अपनी बच्चियों के सामने अपना चेहरा दिखा पायेंगे, और न ही हम लोग उनकी आंखों में आंखें डाल कर बात कर सकेंगे।

तो फिर तय कीजिए मेरे दोस्‍त, कि आप और हम किस तरह का समाज तैयार करना चाहते हैं।

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