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... फिर तुम किस खेत की मूली हो कुमार सौवीर ?

: आदर्श हमेशा स्‍थाई भाव में जीत जाते हैं, जबकि व्‍यावहारिकता हर मोड़ पर हारती है : अपनी बेढब पराजय को जीवन की शानदार जीत में शामिल करने का हौसला रखिये मेरे दोस्‍त : आपका नजरिया ही सत्‍य-असत्‍य की दिशा बदलती है, किसी भी हार से जीत की नयी दिशा-कोंपलें फूटती हैं : जीत गया कुमार सौवीर -एक :

कुमार सौवीर

लखनऊ : आज कोई प्रवचन नहीं। बस चंद घटनाएं आपके सामने रखना चाहता हूं। पहली घटना है देश के महानतम शिक्षाविद् आचार्य नरेंद्र देव से जुड़ी है। आजादी की जंग में अपनी जबर्दस्‍त भूमिका निभाने वाले आचार्य जी का मतभेद नेहरू जी से हुआ था, नतीजा उन्‍होंने कांग्रेस छोड़ दी थी। अगले चुनाव में प्रजा सोशलिस्‍ट पार्टी ने आचार्य को फैजाबाद से चुनाव लड़ाया, तो नेहरू जी कांग्रेसियों से साफ कह दिया कि उनके खिलाफ कांग्रेस का कोई भी प्रत्‍याशी नहीं लड़ेगा। मगर कानूनची गोविंद वल्‍लभ पंत जी चूंकि अपनी पकड़ पार्टी में मजबूत करना चाहते थे, इसलिए उन्‍होंने एक कट्टर हिन्‍दूवादी कांग्रेसी राघव दास को आचार्य जी के खिलाफ खड़ा कर दिया। नेहरू जी पार्टी में कलह नहीं चाहते थे, मगर उन्‍होंने फैसला जरूर ले लिया कि वे आचार्य जी के खिलाफ प्रचार करने फैजाबाद नहीं जाएंगे। आचार्य जी हार गये। अगली बार फिर आचार्य जी चुनाव लड़े, तब पंत जी ने वैद्य मदन गोपाल को खड़ा किया, तो नेहरू जी फिर फैजाबाद नहीं आये। दुर्भाग्‍य कि आचार्य जी फिर हार गये। बुरी तरह।

अब असली कहानी भी सुन लीजिए। आचार्य जी की हर पराजय पर नेहरू जी दहलते रहे। आखिरकार उन्‍होंने अपने भाषण में कह ही दिया कि जब आचार्य जी जैसे महान लोग चुनाव हार गये हैं, तो फिर इस सवाल का जवाब हमें खोजना ही होगा कि आखिर हम और हमारा लोकतंत्र किस दिशा में जा रहा है, हमारे मूल्‍य क्‍या हैं और हमारा भविष्‍य किस राह पर है। और फिर आचार्य जी ही क्‍यों, मोरारजी देसाई भी चुनाव मैदान में चित्‍त हो चुके हैं। 1952 में मोरारजी देसाई के आम चुनाव में बम्‍बई विधानसभा का चुनाव हारे थे। लेकिन इसके बावजूद  उनके योगदान को देखते हुए हार के बावजूद विधायकों ने देसाई को नेता चुना और वे मुख्यमंत्री बने। बाद में मोरारजी उप चुनाव में जीत कर विधायक बने थे।

कांग्रेस अध्यक्ष के तोर पर दिग्‍गज नेता रहे कामराज को 1967 में एक अदने से छात्र नेता ने हरा दिया था। यूपी में भी कमाल हो चुका है। सन-71 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए भी त्रिभुवन नारायण सिंह मनीराम क्षेत्र में विधानसभा उप चुनाव हार गए थे। 1971 में जब इंदिरा गांधी के पक्ष में चुनावी लहर हरहरा कर बहने लगी थी, उस वक्‍त प्रतिपक्ष के कई बड़े-बड़े नेता धूल चाट गये। इतना ही नहीं, पूरी दुनिया में अपनी ताकत का डंका बजा देने वाली इंदिरा गांधी को भी सन-77 में रायबरेली से करारी हार का सामना करना पड़ा था।

डॉ राम मनोहर लोहिया ने तो 1962 में हारने के लिए ही चुनाव लड़ा था। डॉ. लोहिया ने अपने दल के प्रचार के लिए फूलपुर में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के खिलाफ चुनाव लड़ा था।

डॉ लोहिया उससे पहले 1957 का चुनाव भी चंदौली में कांग्रेस के त्रिभुवन नारायण सिंह से हार चुके थे। डॉ भीमराव आंबेडकर जी 1952 में उत्तरी बंबई से लोकसभा चुनाव हार गये थे। इतना ही नहीं, अगली बार यानी 1954 में वह भंडारा से लोकसभा उप चुनाव भी गंवा गये। दीन दयाल उपाध्याय भले ही देश में एक महानतम नेता और विचारक के तौर पर पहचाने जाते हों, लेकिन सच बात यह भी है कि उन्‍होंने भी अपनी करारी हार का स्‍वाद चखा था। उपाध्याय जी 1963 में जौनपुर से लोकसभा का उप चुनाव लड़ रहे थे।

1984 की कांग्रेसी आंधी में तो अटल बिहारी वाजपेयी, मधु लिमये, हेमवती नंदन बहुगुणा और कर्पूरी ठाकुर भी लोकसभा का चुनाव हारे थे। कर्पूरी की वह पहली चुनावी हार थी। एस.के.पाटिल को 1967 में हरा कर जाइंट किलर बने जार्ज फर्नांडिस 1984 में बंगलोर में लोकसभा चुनाव बुरी तरह हारे थे। 1988 के इलाहाबाद के लोकसभा उप चुनाव में बोफोर्स की हवा में कांसीराम, वीपी सिंह से हार गए थे। (क्रमश:)

यह तो है उन महान लोगों की कहानी, जो भले ही चुनावी दंगल में हार गये, लेकिन उनके आदर्श आज भी लोगों के दिल-दिमाग में ताजा हैं, नजीर बने हुए हैं। ऐसी हालत में कुमार सौवीर की हैसियत क्‍या है, आखिर किस खेत की मूली हैं कुमार सौवीर, यह सवाल सहज ही अपना सिर उठा लेता है। उत्‍तर प्रदेश राज्‍य मुख्‍यालय मान्‍यताप्राप्‍त संवाददाता समिति के चुनाव में मैं हार गया। मगर मैं इस पराजय को अपनी एक बड़ी जीत के तौर पर देखता और मानता हूं। मेरी इस मान्‍यता और अडिग आस्‍था-विश्‍वास को लेकर मेरे खुद तर्क हैं, और इतिहास में बेहिसाब नजीरें भरी पड़ी हैं। अगले कुछ अंकों में मैं अपनी इस हार नुमा बेमिसाल विजयश्री का सेहरा आप सब को दिखाऊंगा, और उसकी व्‍याख्‍या भी करूंगा। मेरी उस श्रंखलाबद्ध लेख को पढ़ने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

नैतिक रीढ़ का नाम है कुमार सौवीर

Comments (2)Add Comment
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written by Prem Lal Tamta, April 18, 2018
सौवीर} जी जो पोस्ट आपने लिखा है काबिले तारीफ है।
देश में जिन महाविभूतियों को आदर्श ,सम्मान के भाव से देखा जाता है वो कई बार चुनाव हारे हैं किन्तु लोगों के आदर्श रहे हैं:किन्तु प्रश्न उठता है कि जनता ने अपने आईकान को क्यों नहीं चुना? इस लिए नहीं चुना वो गलत नहीं कर सकते ।दूसरा जातीय समीकरण,क्षेत्रवाद जातिवाद।किन्तु चुनाव जीतने के लिए आचार्य नरेन्द्र देव,लोहिया,दीनदयाल उपाघ्याय, अटल बिहारी बाजपेयी के नाम का सहारा लेते है। और चुनाव में विजयी हो जाते हैं।
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written by Dr Chandi P Painuli, April 18, 2018
Souvir ji agar aap imandar hain to aapke liye chunav jitana kaphi kathin hoga. Aapke adashon ke karan kyonku aap galat akm nanhi karenge is liye koi aapko jitne nahi dega.

Koi bat nahi ladte rahiye.......

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