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रिपोर्टर की कुटम्‍मस, मालकिन सम्‍मान बटोरने में जुटी

: लिंगवर्द्धक यंत्र विज्ञापनपत्र के तौर पर शोहरत कमा चुका है हिन्‍दुस्‍तान अखबार की रिपोर्टर दिल्‍ली में पीटी गयी : इस समाचारपत्र समूह ने इस खबर को पहले पन्‍ने पर नहीं छापा, बल्कि मालकिन को मिले सम्‍मान की खबर प्रमुखता से छाप दी गयी : अब तक पुलिस ने इस हादसे की रिपोर्ट दर्ज नहीं की :

संजय कुमार सिंह

नई दिल्‍ली : हिन्दुस्तान टाइम्स की महिला फोटोग्राफर की पिटाई - खबर हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने पर तो नहीं है। पत्रकारिता की भाषा में यह भी सम्मान है। पुलिस करती रहती है। छोटे शहरों में ज्यादा होता है। दिल्ली में मौका कम मिलता है। पर बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ के जमाने में यह खबर महिला मालकिन के हिन्दुस्तान टाइम्स में नहीं है। पर कोलकाता के अखबार दि टेलीग्राफ ने पहले पन्ने पर छापी है। यहां तक तो कोई खास बात नहीं है। पर दूसरी फोटो हिन्दुस्तान टाइम्स की मालकिन या चेयरपर्सन शोभना भरतीया के सम्मान की है। अब यह कितना महत्वपूर्ण या बड़ा है, आप तय कीजिए। केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने उन्हें यह सम्मान दिया और उनके अपने अखबार में खबर छपी है। यही है आज की पत्रकारिता। इसे सीखने-सीखाने के लिए लोग पैसे लेते हैं और लोग सीखने में जीवन लगा देते हैं। संयोग से आज ही जनसत्ता के साथी, मशहूर पत्रकार आलोक तोमर की याद में एक सेमिनार है। विषय रखा गया है - "सत्यातीत पत्रकारिता : भारतीय संदर्भ"। पत्रकारिता कोई पढ़ाए-सीखाए ये भारतीय संदर्भ वाकई दिलचस्प है।

दिल्ली में एक महिला फोटो पत्रकार की पुलिसिया पिटाई की रिपोर्टिंग दिल्ली में किसी आम घटना की तरह ही हो रही है। कल तो उसी पत्रकार के अखबार में खबर नहीं छपी थी। आज जो फोटो छपी है उसपर एक पोस्ट अलग कर चुका हूं। अब देखिए कोलकाता के टेलीग्राफ की खबर।

अभी तक (खबर छपने तक) संबंधित पुलिस अधिकारी के खिलाफ एफआईआर भी नहीं हुई है। एक खबर यह भी है कि केंद्र सरकार की ओर से इस मामले में अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा है। यहां तक कि सूचना औऱ प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी या उनके सहायक राज्यवर्धन सिंह राठैर ने महिला पत्रकार पर हमले की निन्दा नहीं की है। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ।

कुमार सौवीर : बेहद गैरजिम्मेदार बनता जा रहा है यह अखबार।

न खबर की तमीज, न अपनों के सम्मान की फिक्र

Sanjaya Kumar Singh : जनसत्ता में नियम था - अपने लोगों की खबर नहीं छपेगी। पर जब 1987 में जनसत्ता के कुछ साथियों की पिटाई हुई तो प्रभाष जी ने खुद छपवाया था। लिखा भी था। अपनी खबर पहुंचने से पहले कह देते थे खबर नहीं छापनी है। संपादक का यही काम होता है। पर अब संपादक होते कहां हैं?

Jaishankar Gupta : शर्मनाक और निंदनीय।

Girish Mishra : अखबार मालिक कही इक बड़े हस्ती से डायरी पा जाए तो फ्रंट पेज और इनका पत्रकार पिट जाए तो सन्नाटा

Shrikant Asthana : बड़ी पूंजी से चल रहे ज्यादातर भारतीय अखबार आज केवल पैम्फलेट हैं। इससे भी बुरा हाल टेलीविजन चैनलों का है जो भांड़ बनने में शौर्य समझते हैं। ऊपर से तर्क ये कि दर्शक की पसंद की हफ्तावार लड़ाई में जीत कर ही वे जिंदा रह सकते हैं और लोगों को यही सब पसंद है।

Rakesh Kumar Maurya : Besrami ki had kar di midia

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