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जीवन का रिपोर्ट-कार्ड तो मित्रों से बनता है

: सबसे पहले तो उसके पुराने दोस्‍तों को चेक कीजिए : मित्रता का मूल्‍यांकन भौतिक अपेक्षाओं से करेंगे, तो वह सौदेबाजी ही होगी : अपने कुमारसौवीरपना के प्रवाह में संतुलित-सुरक्षित और स्‍वस्‍थ चलते-बहते ही रहें कुमार सौवीर, यह सामाजिक जरूरत है : साशा की शादी के किस्‍से -एक :

कुमार सौवीर

लखनऊ : किसी भी शख्‍स की जिन्‍दगी के रिपोर्ट-कार्ड का मूल्‍यांकन करना हो तो सबसे पहले उसके दोस्‍तों को चेक करना चाहिए। लेकिन दोस्‍तों में सबसे पहले तो उसके पुराने दोस्‍तों को चेक किया जाना चाहिए। वजह यह कि ताजे-नवेले मित्र को उसकी वर्तमान परिस्थितियों के आधार पर जुड़ते-घटते ही रहते हैं। आज हैं, तो कोई गारंटी नहीं कि कल वे होंगे ही जरूर। मगर असल दोस्‍त तो जिन्‍दगी हर सांस की तरह आपको हर क्षण मजबूत करता ही रहता है। जिन्‍दगी में उसकी भूमिका में लाभ-नुकसान की भावनाएं कोंसों-योजनों दूर होती है। मकसद सिर्फ यह कि अपने मित्र को उर्जा देता ही रहे, हर कीमत पर।

तो लब्‍बोलुआब यह कि अगर किसी की जिन्‍दगी में बचपन के सारे दोस्‍त बिना किसी लाग-लपेट के मौजूद दिख रहे हों, तो फिर तो मौजां ही मौजां। अजी, ऐसे में तो आप सिर्फ मौज कीजिए। बेशक मान लीजिए कि आप डिस्टिंक्‍शन नम्‍बरों से जीत गये। अव्‍वल नम्‍बर से। सच कहूं, तो ऐसी बेमिसाल जीत बहुत कम लोगों को ही नसीब होती है।

बीती 20 फरवरी-2018 को हुई मेरी बिटिया साशा सौवीर की शादी में तो यही सब हुआ था।

सन-11 में तय कर लिया था कि अब नौकरी नहीं करूंगा। "फिर अब तुम क्‍या करोगे?" यह सवाल कई लोगों ने मुझ पर उछाला था, और उनके सवालों की झड़ी आज भी मुझे कीचड़-वर्षा सी महसूस होती है। लेकिन ऐसे सवाल मुझे इसलिए कष्‍ट नहीं देते कि उनके सवाल का मकसद मुझे प्रताडि़त करने लगने जैसा लगता है, बल्कि इसलिए कि शायद उन्‍हें मेरी क्षमताओं का आंकलन नहीं किया होता है। वे मेरे प्रति स्‍नेह-प्रेम के अतिरेक में मुझको लेकर भयभीत हो जाते हैं।

अरे नौकरी करने-छोड़ने के मामले में खासा हिस्‍ट्री-शीटर हूं। सन-84 में जब सुब्रत राय के भाई जयब्रत राय को उसके आफिस में घुस कर अपने जूतों से रौंदा था, तब भी नौकरी गंवा गया था। उसके बाद सन-92 में दैनिक जागरण के सम्‍पादक विनोद शुक्‍ला ने अपनी कमीनगी का प्रदर्शन किया, तो मैं ने भी उसका विरोध किया। नतीजा यह हुआ कि मेरा तबादला बरेली कर दिया गया। मगर मैंने नौकरी करने के बजाय, जागरण को ही अलविदा कर दिया और जागरण की नौकरी को लात मार कर बेरोजगारी से आलिंगनबद्ध हो गया था मैंने।

पूरे करीब दस बरस तक बेहद कष्‍ट में रहा, मगर समझौता नहीं किया।

हां, केवल वे मित्र ही हैं, जो हमेशा यही चाहते और करते रहे कि कैसे भी हो, कुमार सौवीर अपने कुमारसौवीरपना के प्रवाह में संतुलित-सुरक्षित और स्‍वस्‍थ चलते-बहते ही रहें। किसी ने मुझे आर्थिक मदद की, तो किसी ने हौसला। आज तक यही हो रहा है, कोई मुझे सहयोग कर रहा है, तो कोई दान-दक्षिणा। जीवन का प्रवाह कलकल बहता ही जा रहा है। झरने पर उछल-कूद करते जल-बूंदों के छोटे-मोटै झुण्‍डों की तरह। कहीं फंस जाता हूं, तो कहीं कुछ अरमान सूखने लगते हैं। कभी इस पत्‍थर से अपना सिर फोड़ बैठता हूं, तो कभी अपनों का झुण्‍ड बना कर आनंदोत्‍सव मनाते हुए आगे बढ़ जाता हूं।

सात बरस से बेरोजगारी। किसी को भी विचलित कर सकती है। अच्‍छे-अच्‍छों को हिला सकती है, चकनाचूर कर सकती है। दुनिया के विशालतम सबाना जंगल के जेब्रा या भैंसों पर शेरों की टोली के अचानक हमलों की तरह छिन्‍न-भिन्‍न जानवरों की तरह कुछ मित्र आपके संकट के दिनों में धूल झाड़ते हुए रफू-चक्‍कर हो जाते हैं। सबसे आक्रमण होता है मित्रों को लेकर भावनात्‍मक धरातल पर। कुछ मित्र कर्कश हो जाते हैं, खास कर पुरूष-मित्र। वे चंद लोग मेरी जिन्‍दगी में सिर पर पांव रख कर भाग निकले थे, तो उनका क्‍या किया जा सकता है।

जबकि ज्‍यादातर महिला मित्र तो मुझ पर दयनीय भाव का प्रदर्शन करती हैं। च्‍च्‍च्‍च्‍च्‍ बेचारा, कैसे चलेगा तुम्‍हारा जीवन, समझ ही नहीं पाती हूं। लेकिन कभी मेरे लायक कोई जरूरत महसूस हो तो बताना जरूर। कुछ तो ऐसी हैं कि मोबाइल पर बातें तो घंटों तक बतियाएंगी, कि हर बार में सैकड़ों का बिल गिर जाए, लेकिन ब्‍लाउज से बटुआ नहीं निकालेंगी। वे चाहे इलाहाबाद वाली हों या फिर जौनपुर वाली, अथवा सोनभद्र, इलाहाबाद, वाराणसी, बाराबंकी, कानपुर, मुरादाबाद, आगरा, दिल्‍ली, छपरा अथवा अमृतसर या जोधपुर वाली। हां, हल्‍का-फुल्‍का खर्चा तो बायें हाथ की बात है।

बस्‍स्‍स। इससे ज्‍यादा नहीं।

मगर ओहदा, ऐश्‍वर्य, वैभव या धन-दौलत से मित्रता का मूल्‍यांकन क्‍या किया जा सकता है?

हर्गिज नहीं।

है न? (क्रमश:)

मित्रता के सर्वोच्‍च मूल्‍यों, आधारों और मजबूत पायदानों को छूने की कोशिश करने जा रही है यह कहानी। जहां कठिन आर्थिक जीवन शैली में घिरे होने के बावजू जीवट वाले व्‍यक्ति, और सफलताओं से सराबोर कद्दावर शख्सियत की मित्रता का गजब संगम होता है। यह जीती-जागती कहानी है, सच दास्‍तान। मेरी बेटी साशा सौवीर की शादी पूरे धूमधाम के साथ सम्‍पन्‍न हो जाने की गाथा। इसकी अगली कडि़यों को महसूस करने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

साशा सौवीर की शादी के किस्‍से


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