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बच्‍चे थे कुल 24, सार्टिफिकेट जारी किया 200 का

: लड़कियां बीएड हैं, मगर घर की शोभा बढ़ा रहीं, लड़के सेना में जाना चाहते हैं मगर बैठे हैं घर में : दावा कि हर घर में है शौचालय, मगर सुबह-शाम खेत-परेड होती है : झूठे नारियल से शम्‍भूनाथ ने पूरी स्‍टोरी का सिर फोड़ डाला : एक सम्‍पादक को आखिर झूठ का सहारा क्‍यों लेना पड़ता : जमीनी या ढपोरशंखी -तीन:

शंभूनाथ शुक्ल

गाजियाबाद : रमेसुर कटियार ने पूछा है कि “सुकुल जब तुम्हें गावैं जाँय का रहय तौ यो ससुर कानपुर का इत्ता बड़ा गाँव नाहीं दिखाई पड़ो! का कमी है हमरे गाँव माँ, एक बीघा गन्ने की फसल है, इत्ते मा ही मटर है. शकरकंदी, गाजर, आलू, मूली सब कुछ तो है. तब तुम काले कोसन जौनपुर काहे गयो?” सवाल वाजिब है. मैं उस जौनपुर क्यों गया जहाँ बस एक श्रमजीवी और दूसरी फरक्का एक्सप्रेस ट्रेन जाती है. इनमें से दोनों के पहुँचने का समय इतना ‘आड’ कि रात भर जौनपुर सिटी के प्लेटफ़ॉर्म पर ही समय काटना पड़े. छोटा-सा शहर और उस पर भी श्रमजीवी के पहुँचने का वक़्त रात साढ़े बारह का. लेकिन मैं गया जौनपुर! वहां गया चंचल बीएचयू से मिलने, उसका मिजाज़ समझने. एक ऐसा आदमी जो किसी को कुछ नहीं समझता. बेबाक और बेलौस! जिसने पूरी इमरजेंसी जेल में काटी लेकिन इंदिरा गाँधी के खिलाफ कभी एक शब्द नहीं बोला. और आज वही आदमी मौजूदा हुक्मरानों की चड्ढी ही उतारे दे रहा है. जिसकी चित्रकारी अमर है और कलम बेजोड़. जो व्यक्ति गाँधीवाद से इतना प्रभावित है कि जौनपुर शहर से 40 किमी दूर बदलापुर के पास वर्धा और साबरमती आश्रम की तर्ज़ पर समताघर खोला हुआ है.

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पत्रकार

इस फक्कड़ और बाहर से “रफ एंड टफ” दिखते चंचल के समताघर में कैसे पहुँचूँगा, यह एक सवाल मुँह बाये खड़ा था. रात कहाँ जाएंगे, कुछ पता नहीं क्योंकि जौनपुर कभी आया ही नहीं. साथ के लिए अनिल माहेश्वरी को और ले लिया था, जो एक तो अंग्रेजी पत्रकार ऊपर से गाँव में कभी रहे नहीं. न उन्होंने कुछ पूछा न मैंने बताया और 13 जनवरी की दोपहर दो बजे हमने श्रमजीवी एक्सप्रेस गाज़ियाबाद से पकड़ी. हम चल तो दिए लेकिन अपने गंतव्य से अनजान. जब रात दस बजे ट्रेन लखनऊ पहुंची तब अनिल जी ने पूछा- जौनपुर किस वक़्त आएगा? मैंने कहा- शायद एक के आसपास. अनिल जी बोले कि आप नींद मार लो, तब तक मैं कुछ पढ़ता रहूँगा. नींद आँखों में कहाँ थी. धुकर-पुकर मची थी कि क्या होगा, कहाँ जाएँगे. हालाँकि चलने के कुछ पहले चंचल जी ने बता दिया था कि आप रात रिक्शा पकड़ कर चंद्रा होटल चले जाइयेगा. उसके मालिक राजेश सिंह को कह दिया है. करीब एक बजे गाड़ी मुसाफिरखाना ही पहुंची. एसी-टू के उस कोच में न कोई अटेंडेंट न टीटी. न आरपीएफ का सिपाही गश्त करते दिखा न जीआरपी का. पूछें तो किससे!

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जुल्‍फी प्रशासन

अब दोनों लोग जगने लगे और बार-बार मोबाईल पर रनिंग ट्रेन स्टेटस देखने लगे. पर एक तो नेट आए-जाए, दूसरे वह आधा घंटा पहले का स्टेटस बताए. रात दो बजे आया सुल्तानपुर. वहां से एक घंटे की दूरी पर नेट जौनपुर शो कर रहा था. हम बैठ गए. जहाँ भी ट्रेन खड़ी होती हम दरवाज़ा खोलकर देखते पर कोहरे में कुछ समझ न आता. तभी सुबह चार बजे चंचल जी का फेसबुक स्टेटस पढ़ा कि हम आज मना रहे हैं कि “ट्रेन लेट आए ताकि पंडिज्जी को रात में तकलीफ न हो”. अब यह तय हो गया कि है जौनपुर इंटीरियर में ही. ठीक 5.45 पर ट्रेन एक प्लेटफॉर्म पर लगी. कोहरे में कुछ दिखा तो नहीं लेकिन दूसरे कोच से कुछ लोग उतर रहे थे. हमें लगा यह कोई आउटर का स्टेशन होगा. तभी पास आए एक आदमी से मैंने पूछा तो बोला जौनपुर. मैं भड़भड़ा कर कोच में घुसा और अनिल जी से कहा जल्दी उतरिये. हम लोग अपने सामान घसीटते हुए उतरे. प्लेटफ़ॉर्म भी ऐसा कि जिस पर ट्राली वाले हमारे बैग बार-बार अटक जाएँ. हम बाहर आए. कुछ टेम्पो, कुछ ऑटो रिक्शा खड़े थे. हमारे चंद्रा होटल बताते ही वे बोलते डेढ़ सौ. हमें लगा कि यहाँ भी दिल्ली की तरह ही ऑटो वाले ठग हैं.

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सुरमा वाले बरेली का झुमका

एक साइकिल रिक्शा वाले ने कहा- जो आपकी इच्छा हो दे दीजियेगा. हम उसी पर बैठे. पूरा शहर सो रहा था. होटल पहुंचे तो रिक्शे वाले को सौ का नोट दिया, उसने 50 वापस कर दिए. होटल में रिशेप्शन पर बैठे युवक ने बताया कि हम आपके कारण आधी रात से जगे बैठे हैं. रूम में गए और फ्रेश होकर नीचे आया तो पाया कि राजेश सिंह जी स्वयं हमारा इंतज़ार कर रहे हैं. बोले- चंचल जी का आदेश था. सामने स्थित बेनीराम प्यारेलाल की दूकान से शुद्ध घी की पूरियां और आलू-टमाटर की रसीली सब्जी आई. साथ में इमरती भी. कुछ ही देर में चंचल जी की भेजी गाड़ी आ गई. हम वहां से चले और डेढ़ घंटे में समता घर पहुँच गए. गेहूं और सरसों के खेतों से घिरा समताघर. फिरन पहने चंचल जी खड़े थे. तेज़ चाल से करीब आए और गले मिले. यह समताघर जिसमें कुछ कमरे पक्के थे और कुछ कच्चे. मैं जब चला था तब अपने साथ अपने जॉगिंग शू के साथ बिना फीतों वाले शू भी रखे थे. मुझे डर था कि समताघर गाँव में है क्या पता वहां टॉयलेट हो या न हो. शायद दूर खेतों में जाना पड़े. तब चप्पलें ठीक नहीं रहेंगी. लेकिन यहाँ तो हर कमरे से अटैच्ड बाथरूम था और टॉयलेट शीट भी वेस्टर्न स्टाइल की. एक पक्के रूम में हमारा सामान लगाया गया. बीस बाई बीस के उस कमरे में चार-चार फीट चौड़े दो तख़्त लगे थे. जिसमे रुई के गद्दे और सेमल की रुई की रजाइयां थीं.

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शम्‍भूनाथ शुक्‍ल

दोपहर को जब समताघर में पढ़ने वाले बच्चे आने शुरू हुए, तब हमने भी क्लास ली. गाँव की हर बहू पढ़ी-लिखी है. कुछ कामचलाऊ तो कुछ बीए और एमए भी. कईयों ने बीएड किया है तो कुछ टीईटी पास भी हैं. लेकिन जो सबसे खास बात यहाँ देखने को मिली, वह है यहाँ की लड़कियों का पढ़ाई के प्रति अत्यधिक रुझान. इस गैर परम्परागत स्कूल में भी पढ़ने के लिए करीब दो सौ बच्चे आते हैं, इसमें से लड़के कुल 50 और लड़कियाँ डेढ़ सौ. सारे बच्चे कक्षा छह से दसवीं क्लास तक के हैं. पर मज़े की बात यह कि जहाँ लड़कों ने अंग्रेजी और गणित से दूरी जताई वहीँ लड़कियों का रुझान गणित में सबसे अधिक फिर अंग्रेजी और साइंस में दिखा. हर लड़की ने अपनी इच्छा इंजीनियरिंग में जाने की जताई जबकि लड़कों में से ज्यादातर ने पुलिस और अर्धसैनिक बलों में जाने की इच्छा जताई और तीन लड़कों ने क्रिकेटर बनने में. किसी भी लड़के में उच्च शिक्षा के प्रति आकांक्षा नहीं दिखी.

लड़कियों में पढ़ाई के प्रति यह दिलचस्पी देखकर मुझे रमई काका की वह कविता याद आ गई, जिसमें वे लिखते हैं- लरकउनू बीए पास किहिन, बहुरेवा बैर ककहरा ते! यानी बेटे ने तो बीए पास किया हुआ है लेकिन बहू को अक्षरज्ञान तक नहीं है. मुझे लगा कि आज अगर रमई काका जिंदा होते तो लिखते- बहुरेवा एमए पास किहिस, लरकउनू बैर ककहरा ते! गाँव में दिन भर में करीब 18 घंटे बिजली आती है इसलिए इस गाँव में फ्रिज, एसी, कूलर, टीवी आदि की कमी नहीं है. और इस वज़ह से गाँव को इन उपकरणों की देखभाल के लिए इलेक्ट्रिशियन चाहिए और ये सब समताघर से मिल जाते हैं. अपने सहारे गाँव यानी स्वावलंबन की पक्की बानगी है यह गाँव! और पूरालाल ढेमा नामक इस गाँव की कायापलट की है उस शख्स ने जिसका नाम तो है चंचल लेकिन मिजाज़ और चिंतन है एकदम कड़क. जो नारियल की तरह रफ-टफ है लेकिन अंदर से कोमल और कांत!

जब 17 को हम वहां से विदा हुए तो अपने जॉगिंग शू जान-बूझ कर वहीँ छोड़ आया. हमारे बदलापुर पहुँचते ही चंचल जी का फोन आया कि पंडिज्जी गाड़ी वही रुकवा लीजिए, मैं किसी को बाइक से भेज रहा हूँ, आप अपने जूते यहीं भूल गए हैं. मैंने जवाब दिया- नहीं चंचल जी भूल नहीं आया बल्कि छोड़ आया हूँ ताकि जल्द ही फिर आऊँ. (क्रमश:)

आइये, अब हम आपको दिखाते हैं कि बड़े-बड़ों में जमीनी या हवाई बातों में कितना छोटा अथवा बड़ा फर्क होता है। इसकी बाकी कडि़यों को बांचने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

जमीनी-ढपोरशंखी

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