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चित्‍त-निर्मल कर गयी सहवाग की क्षमा-याचना

: केरल में सांप्रदायिक बढ़ा देने वाली एक टिप्‍पणी को न केवल हटाया, बल्कि सार्वजनिक रूप से माफी भी मांगी : क्रिकेट-प्रशंसकों के भगवान हैं सहवाग, ट्विटर पर हैं 1.6 करोड़ फॉलोअर : क्रिकेट या फिल्मी लोगों भी दूसरे क्षेत्रों पर राय रखने का पूरा हक है, लेकिन सतर्कता जरूरी :

रामचंद्र गुहा

नई दिल्‍ली : मैं अमूमन इतिहास और राजनीति पर टिप्पणियां करता रहता हूं, पर मैं एक क्रिकेट लेखक भी हूं। ज्यादातर मौकों पर मेरा पेशा और मेरा जुनून दो ध्रुवों पर होते हैं, मगर कभी-कभार वे आपस में टकराते भी हैं।

ऐसा ही एक मौका 24 फरवरी को आया, जब मैंने ट्विटर पर देखा कि वीरेंदर सहवाग ने केरल में हुए एक नफरत-प्रेरित अपराध के बारे में आधा सच बताया। वहां मधु नामक एक लड़के को हिंदू और मुस्लिमों की एक मिली-जुली जमात ने बुरी तरह पीटा था। अपराधियों के नाम पहले से ही कई अखबारों और ट्विटर पर उजागर हो गए थे। फिर भी, सहवाग ने दो मुस्लिम नाम चुने, उन्हें पीड़ित हिंदू के नाम से जोड़ा और घटना को ‘सभ्य समाज के लिए शर्मनाक’ घोषित कर दिया।मैं सहवाग की बैटिंग का महान प्रशंसक रहा हूं। जब उन्हें भारतीय टीम से बाहर किया गया था, तब मैंने उनकी प्रशंसा में अपनी शैली से इतर एक काव्यात्मक ‘कॉलम’ भी लिखा था।

मगर उनके उस ट्वीट ने मुङो काफी निराश किया। ऐसा महज इसलिए नहीं कि उन्होंने ‘सेलेक्टिव’ रुख अपनाया था, बल्कि इसलिए कि हरियाणा के नफरत-प्रेरित अपराधों पर उनकी चुप्पी बरकरार थी, जबकि वहां पर वह अपना स्कूल भी चलाते हैं। लिहाजा मैंने उनकी भूल को लेकर ट्वीट किए और लिखा, ‘अगर सहवाग में थोड़ी सी भी इंसानियत है, तो उन्हें अपना ट्वीट हटा लेना चाहिए’। ट्विटर पर सहवाग के करीब 1.6 करोड़ फॉलोअर हैं। जाहिर है, इनमें से कई के लिए उनके शब्द अक्षरश: सत्य होंगे। मैं परेशान था कि क्रिकेट की उनकी यह प्रसिद्धि सांप्रदायिक तनाव को हवा दे सकती है। इसलिए खुद ट्वीट करने के अलावा मैंने वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई को सहवाग की इस गंभीर गलती के बारे में बताया।

राजदीप के ट्वीट करने के बाद सहवाग ने एक माफीनामा लिखा कि उन्हें गलत जानकारी मिली थी। मगर वह मूल ट्वीट उसी तेवर में तब भी मौजूद था। बाद में, राजदीप की गुजारिश के बाद सहवाग ने उसे डिलीट किया।20वीं सदी की शुरुआत में मैनचेस्टर गाजिर्यन के महान संपादक सीपी स्कॉट ने कहा था, ‘टिप्पणी स्वतंत्र होती है, पर तथ्य अक्षय होते हैं’। मगर 21वीं सदी में इस सिद्धांत को हर क्षण सोशल मीडिया पर तार-तार किया जाता है। ट्रॉल करने वाले और खास विचारधारा के लोग तो जान-बूझकर हर वक्त झूठ परोसते रहते हैं, पर नाम व उपलब्धि कमा चुके लोगों को उच्च मानक का पालन जरूर करना चाहिए। बेशक एक नागरिक होने के नाते क्रिकेटरों या फिल्मी कलाकारों को भी अपने क्षेत्र से इतर बातें रखने का पूरा हक है, लेकिन भ्रष्टाचार, सांप्रदायिक तनाव जैसे मसलों पर अपनी राय जाहिर करने से पहले उन्हें यह जरूर सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके तथ्य सही हों और बिना किसी भेदभाव के लोगों के सामने परोसे गए हों। (क्रमश:)

( क्षमा-याचना से चित्‍त निर्मल कर देने वाले इस आलेख का पहला हिस्‍सा आप गतांक में पहले ही पढ़ चुके हैं। अब इस आलेख का दूसरा और अंतिम हिस्‍सा अगले अंक में पढि़येगा। क्रमश:- जाफरी-बेटियों को निर्वस्त्र कर फूंका गया, झूठ लिखा था अरूंधति ने )

बहु-आयामी प्रतिभा के स्‍वामी रामचंद्र गुहा का नाम देश में चोटी के इतिहास-लेखकों में गिना जाता है।

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