Meri Bitiya

Thursday, Nov 14th

Last update02:57:01 PM GMT

मेरी बिटिया डॉट कॉम अगर आपको पसंद हो, आप इस पोर्टल के लिए सुझाव, समाचार, निर्देश, शिकायत वगैरह भेजने के इच्‍छुक हों तो meribitiyakhabar@gmail.com पर हम आपकी प्रतीक्षा कर रहे है.

Advertisement

हाईकोर्ट: आलीशान इमारत, जज हैं नहीं, कमरे खाली

: 1500 करोड़ में बनी लखनऊ उच्च न्यायालय की बिल्डिंग में 57 कोर्टरूम, 30 कोर्टरूम पर लटक रहे ताले : जब जज ही तैनात नहीं करने थे, तो क्‍यूं बनायी भारी  वाली हवेली : जब लखनऊ बेंच में काम ही नही था तो फिर हज़ारों करोड़ रुपये फूंकने का औचित्‍य क्‍या :

कुमार सौवीर

लखनऊ : जिस किसी ने भी गोमती नगर लखनऊ स्थित उच्च न्यायालय की नई बिल्डिंग को देखा वो इसकी तारीफ करता नही थकता। क्या नायाब महलनुमा परिसर है। 1500 करोड़ में बनाये गये इस परिसर को पूरे साउथ एशिया का सबसे बड़ा उच्च न्यायालय कहा जाता है। लेकिन आज इस विशालकाय न्‍याय-मंदिर किसी ढपोरशंख की तरह न्‍याय-व्‍यवस्‍था को चिढ़ाता दीख रहा है।

दो वर्ष पूर्व इस भवन का उद्घाटन किया गया था। तब उस समय के भारत के मुख्य न्यायाधीश रहे टीएस ठाकुर ने कहा था कि इतनी बड़ी और सुविधाजनक बिल्डिंग तो सुप्रीम कोर्ट की भी नही है। उसी वक्त ये भी मांग उठी थी की अब लखनऊ उच्च न्यायालय का कार्यक्षेत्र बढ़ाया जाये। कार्यक्षेत्र से मतलब कि लखनऊ हाईकोर्ट के अधीन आने वाले जिलों की संख्या बढ़ाई जाये।

फिलहाल लखनऊ के अधीन प्रदेश के मात्र 15 जिले आते हैं जिनमें लखनऊ, फैज़ाबाद, हरदोई, गोंडा, श्रावस्‍ती, बलरामपुर, बहराइच आदि शामिल हैं। मतलब यह कि इन जिलों की जिला कचहरी के मुकदमे लखनऊ हाईकोर्ट में आयेंगें। वहीं बचे हुए 60 जिले इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अधीन आते हैं। कानपुर जैसा जिला जो लखनऊ से मात्र 70 किमी की दूरी पर है वो भी इलाहाबाद के अधीन आता है जब कि इलाहाबाद से कानपुर की दूरी 200 किमी है। मतलब कानपुर के रहने वाले वादकारी को अपने मुकदमे की पैरवी के लिये दोगुना सफर कर के इलाहाबाद जाना पड़ता है, न कि लखनऊ।

ऐसा नही है कि लखनऊ हाईकोर्ट का कार्यक्षेत्र बढ़ाने की कभी मांग नही की गई। कई बार मांग उठी, पर कभी सफलता हाथ नही लगी। पहले कारण बताया जाता था कि क़ैसरबाग स्थित हाईकोर्ट की पुरानी बिल्डिंग में कोर्टरूम कम हैं एवं परिसर भी काफी छोटा है। कई सालों तक ये मामला ऐसे ही टलता रहा। पर जब गोमती नगर में हाईकोर्ट की नई बिल्डिंग का उद्घाटन हो गया तब ये मांग फिर से उठी पर अफसोस की लखनऊ हाईकोर्ट के वकीलों ने इस मामले को पुरज़ोर तरीके से नही उठाया। यही वजह है की अब ये मामला ठंडे बस्ते में चला गया है और हजारों करोड़ की लागत से बनी हाईकोर्ट लखनऊ की नई बिल्डिंग के अधिकांश कोर्टरूम धूल खा रहे हैं।

ऐसे में सवाल है कि अगर लखनऊ बेंच में काम ही नही था तो फिर हज़ारों करोड़ रुपये खर्च करने का फायदा ही क्या हुआ?

Comments (0)Add Comment

Write comment

busy