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ब्राइटलैंड स्‍कूल-कांड: गरीब की बच्ची थी, तो जेल भेज दिया। डायरेक्‍टर छुट्टा-सांड़

: लखनऊ के स्कूल में हुए हादसे पर पुलिस का दोहरा चरित्र : आखिर किस धारा पर स्कूल के प्रबंधकों को बेलेबल धाराएं लगा दीं : क्यों नहीं ठीक वही धाराएं लगाई, जो उस बच्ची पर लगाईं गयीं : असल सवाल तो यह कि इस मामले पर धारा 307 और 326 आयद होनी चाहिए थी :

कुमार सौवीर

लखनऊ : त्रिवेणी नगर स्थित ब्राइट लैंड स्कूल का नाम आज किसी शातिर हत्यारी घटना से जुड़ चुका है। पूरी राजधानी ही नहीं, बल्कि आसपास के जिलों में भी इस हादसे की धमक है। वजह है इसका गुरूधाम के रेयान स्‍कूल के चरित्र से जुड़ता दिख रहा है। लेकिन उससे भी ज्‍यादा संगीन मामला तो इस मामले में पुलिस द्वारा की गयी कार्रवाई को लेकर दीखता जा रहा है। ठीक उसी तरह, जैसे गुरूधाम की पुलिस की करतूत थी। हकीकत यह है कि इस ब्राइटलैंड स्कूल के मामले में पुलिस ने अपनी करतूतों के चलते अपराध का मूल्यांकन जिम्मेदार लोगों की उनकी हाली माली हैसियत पर तयकर दिया है।

पुलिस ने इस हादसे में एक बच्ची को हमलावर के तौर पर चिन्हित किया है। वह चिन्हीकरण किस आधार पर हुआ, उस पर बातचीत बाद में की जाएगी। लेकिन पहले यह समझ लिया जाना जरूरी है कि इस बच्ची का परिवार एक न्यूनआय वर्ग से है। बच्ची का पिता हाईकोर्ट में चपरासी के पद पर कार्यरत है। जबकि इस मामले में स्‍कूल प्रबंधन के दो निदेशकों का नाम जुड़ा है, जो अति उच्‍च आयवर्ग से सम्‍बद्ध हैं।

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पुलिस ने अपनी तहकीकात में पाया कि उसे स्कूल मैं पढ़ने वाले कक्षा एक के बच्चे पर उस बच्ची ने जानलेवा हमला किया। हमलावर के तौर पर पहचानी गई बच्ची को संभवत: कक्षा 6 की छात्रा के तौर पर माना गया है। पुलिस ने इस घटना में भारतीय अपराध दंड संहिता 324 और 325 के तहत मामला दर्ज कर, उसे बाल-गृह में बंद कर दिया है। जबकि इस मामले के 1 दिन बाद पुलिस ने स्कूल के 2 निदेशकों को धारा 202 और धारा 201 के तहत मुकदमा दर्ज कर उन्‍हें रात भर थाने में पुलिस कस्टडी में रखकर अगले दिन उन्हें अदालत भेज दिया। जहां कोर्ट ने उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया।

पुलिस का खेल यहां से शुरू हुआ। दरअसल 324 और 325 धाराएं जमानती धाराएं हैं जिसे थाने से ही निपटा दिया जाना चाहिए।

लेकिन क्योंकि यह बच्ची एक गरीब परिवार से है, इसलिए उसे जमानत देकर उसके परिवार के हवाले करने के बजाए, पुलिस ने उसे बाल गृह में भेज दिया गया। जबकि इन दोनों निदेशकों को पुलिस ने रात भर थाने पर रखा और फिर उन्हें अदालत भेज दिया। जहां मैजिस्‍ट्रेट ने जमानतीय धाराओं के चलते उन्‍हें जमानत दे दी। अब हालत यह है कि अपने परिवार से दूर यह बच्‍ची तब से ही कड़ाके की सर्दी के बीच सरकारी बच्‍चा जेल में बंद है, जबकि ब्राइटलैंड के दो निदेशक अपने-अपने वातानुकूलित घर में जीवन का आनंद ले रहे हैं।

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सच बात तो यह है कि किसी भी अपराध पर शामिल एकाधिक अभियुक्तों पर समान धाराएं ही लगनी चाहिए। लेकिन पुलिस ने इस मामले में बच्‍ची के साथ अलग सुलूक किया, जबकि दोनों निदेशकों के साथ बेहद नरमदिल होने का सुबूत देते हुए रियायत कर दी। हाईकोर्ट के अधिवक्ता अक्षय कटियार इस मामले पर हस्तक्षेप कर रहे हैं। वह इस पूरे प्रकरण को जनहित याचिका के तौर पर दायर करने जा रहे हैं।

अक्षय कटियार का तर्क है कि जिस तरह का मामला इस स्कूल में हुआ, वहां पुलिस ने साफ तौर पर मामला दबाने के तौर पर पेश बंदी की है। असल बात तो यह थी किस मुकदमे को धारा 307 के तहत दर्ज किया जाना चाहिए। और अगर ऐसा नहीं भी हो पाया हो, तो भी कम से कम धारा 326 का मामला तो इस मामले में सीधे तौर पर बनता था। फिर सवाल यह है कि आखिर पुलिस ने धारा 324 और धारा 325 पर यह मामला क्यों दायर किया। और यह भी सवाल है कि आखिर एक ही मामले में उस बच्ची और उनके दो निदेशकों को क्यों छूट दे दी गई।

अक्षय कटियार का तर्क है कि अगर इस बच्ची को 324 और 325 के तहत पाबंद किया गया तो फिर सीधे तौर पर उन निदेशकों को पर भी वही धाराएं भी लगानी चाहिए थी। लेकिन साक्ष्य मिटाने की धाराएं केवल निदेशकों पर आयद करके उस मामला पुलिस ने डायल्‍यूट कर दिया।

लखनऊ के ब्राइटलैंड स्‍कूल में पिछले तीन दिनों से जो हंगामा बरपा है, वह हमारी लुटेरी शिक्षा प्रणाली, अशक्‍त अभिभावक, गैरजिम्‍मेदार पुलिस, नाकारा प्रशासन, नपुंसक राजनीति और बकवास प्रेस-पत्रकारिता के बीच पिसते निरीह बच्‍चों के टूटते सपनों के बदतरीन माहौल का बेहद घिनौना चेहरा ही है। प्रमुख न्‍यूज पोर्टल मेरी बिटिया डॉट कॉम ने इस मसले को गम्‍भीर विचार-विमर्श के बाद उसे कई कडि़यों में पिरो कर किसी फैसलाकुन नतीजे तक पहुंचाने की कोशिश की है। क्‍योंकि घर से भागा बच्‍चा अपराधी नहीं, जुझारू बनता है इसकी बाकी कडि़यों को बांचने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

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