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सवाल समाधानों का नहीं, समाधानों के लिए जमीन बनाने का है

: इटावा की पुलिस ने जो किया, वह भविष्‍य में पुलिस के प्रति विश्‍वास जमाने में एक बड़ी पहल साबित होगी : ऐसा हर्गिज नहीं कि ऐसी कवायदें हमारे समाज के सवालों का हर समाधान खोज डालेंगी : ऐसी घटनाएं बहुत कम है और इसीलिए जब भी ऐसी कोई घटना होती है तो वह समाज को हिलोर देती है : लखनऊ विश्‍वविद्यालय की डीन प्रो निधिबाला का विश्वास है कि इससे समाज में परिवार-भाव उमड़ेगा :

कुमार सौवीर

लखनऊ : इटावा से शुरू हुई निकली हुई गंगोत्री के खासे दूरगामी परिणाम निकलेंगे। लखनऊ विश्वविद्यालय की डीन प्रोफेसर निधि बाला का विश्वास है कि इस घटना से सभी पक्षकार लाभान्वित होंगे। सभी में यह से एक भाव जरूर उमड़ेगा कि सब एक ही परिवार के अंग है जिसमें पुलिस और परिवार भी अनिवार्य पक्षों में शामिल है। प्रो निधिबाला कहती हैं कि जरा उस दौर को फिर से गहरी निगाह से निहारने की कोशिश कीजिए, जब परिवार में एक भी असंतुष्‍ट इकाई को तत्‍काल किसी दूसरी इकाई लपक कर थाम लेती थी। परिवार के किसी भी सदस्‍य को अगर कोई शिकायत होती थी, तो दूसरा कोई सदस्‍य उसकी ग्रिवांस को फौरन सुनता और उसका समाधान कर देता था। और फिर उसी प्रक्रिया से ही उस असंतोष का एक नया निदान खोजना शुरू हो जाता था। यही हालत तब के आसपड़ोस, गांव, समुदाय और समाज में भी लागू हो जाता था। कोई भी तनाव हो, किसी भी कोने उसे उमड़े, समाधान मिलते ही क्षणिक साबित हो जाते थे।

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बड़ा दारोगा

हम यह नहीं कहना चाहते हैं कि इटावा की पुलिस की पहलकदमी के बाद से भविष्य में कोई ऐसा बच्चा अपने किसी अभिभावक के प्रति गुस्सा नहीं करेगा। हम ऐसा भी नहीं कहते कि कोई बच्चा थाने तक जाने की हैसियत नहीं जुटा पाएगा। यह भी नहीं कहना चाहता हूं मैं, कि उसकी अर्जी अगर थाने पर जाएगी तो हर पुलिसवाले का दिल मोम की तरह पिघल पड़ेगा। हमारे कहने का यह मकसद कत्‍तई यह नहीं है कि इस समाधान के बाद ऐसी घटनाओं के प्रति हमारे परिवार और समाज में करुणा का संचार हो ही जाएगा। और अगर हो भी जाएगा तो उसे पूरी गंभीरता के साथ पुलिसवाला भी करेगा भी या नहीं, यह भी मौलिक प्रश्‍नों में शामिल है। और आखिर में यह प्रश्न  जरूर उठेगा कि एक जिले का बड़ा दरोगा क्या इतना वक्त निकाल पायेगा कि अपने सरकारी दायित्व के कर्कश भाव से अलग हट जाए और एक मासूम की आशाओं के आंसुओं को पोंछने और उसके चेहरे पर रुदन की बजाय उल्लास और मुस्कान की फसल लहरा सके।

मगर इतना जरूर है कि इन सारे सपनों के बीज बोने की कोशिश के तहत हम जमीन को उर्वर बनाने की ईमानदार कोशिश तो कर ही सकते हैं।

सामाजिक सामंजस्य की मजबूती के लिए ऐसी कौन सी कोशिश उनमें से ज्‍यादा आपकी नजर में बेहतर तरीके के हो सकती है, अगर आपको पता चले तो बताइएगा जरूर।

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यह घटना केवल इसलिए महत्‍वपूर्ण नहीं है कि इसमें पुलिसवालों ने सिर्फ उस बच्‍चे को संतुष्‍ट किया। बल्कि यह घटना इस लिए महान बन गयी है, क्‍योंकि पुलिसवालों ने इस बच्‍चे की निजी समस्‍या को सामाजिक समस्‍या की तरह देखा, और उसका सामूहिक तौर पर समाधान खोजने की कोशिश की है। इस मामले में हम इटावा के बड़ा दारोगा को सैल्‍यूट करते हैं। इसके साथ ही साथ इस पूरे मसले को बाल एवं मनो-सामाजिक मसले के तौर पर उसका विश्‍लेषण करने की कोशिश करने जा रहे हैं।

यह श्रंखलाबद्ध आलेख तैयार किया है हमने। इसकी बाकी कडियों को देखने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

वर्दी में धड़कता दिल

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