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जिद बच्‍चे की, सामर्थ्‍य अभिभावक की: बड़ा लोचा है यार

: अभिभावक के सामने सामर्थ्‍य का संकट होता है, जबकि बच्‍चे की ख्‍वाहिशें सर्वोच्‍च : दोनों ही पक्ष जमीन पर सितारे तोड़ लाना चाहते हैं, जबकि अभिभाव अपने बच्‍चे के लिए, जबकि बच्‍चा सिर्फ अपने लिए : निम्‍न मध्‍य वर्ग व निचले के आय वर्ग से ताल्‍लुक वाले परिवारों में यह द्वंद्व अनर्थकारी होता जा रहा :

कुमार सौवीर

लखनऊ : इटावा के इस बच्चे की ख्वाहिशें ठीक उसी तरीके से भड़की हैं जैसे कोई भी बच्चा, जो अपनी ख्वाहिश पूरी ना होने पर अपना पूरा आक्रोश अपने अभिभावकों पर निकाल देता है। वह चाहता है उसका मसला सबसे पहले निपटा लें। सबसे पहले उसकी ख्वाहिश पूरी की जाए। सबसे पहले उसकी बात सुनी जाए और उसकी इच्छाओं को प्राथमिकता पर सुना जाए और पूरा जाए।

लेकिन ऐसा नहीं कि कि हर मांग जायज ही हो। किसी भी अपेक्षा और उसकी पूर्ति के बीच एक गहरी खाई भी हो सकती है। खास कर बच्‍चों की ख्‍वाहिशें, जो आसमान के हर तारे-सितारे को तोड़ कर अपने कदम में डाल देना चाहते हैं। ऐसी हर ख्वाहिश को पूरा कर पाना हर अभिभावक के बस की बात नहीं होती। विशेष तौर पर उन परिवारों में तो यह संकट सबसे ज्‍यादा होता है, जो निम्‍न मध्‍य वर्ग अथवा उसके नीचे के आय वर्ग से ताल्‍लुक रखते हैं।

सच बात तो यही है कि किसी भी अभिभावक की अपनी सीमाएं होती हैं। और उसकी हर सीमा उसके व्यवसाय से जुड़ी हो सकती है। उसकी नौकरी की दिक्कतों से जुड़ी हो सकती है। उसके मानसिक तनाव से जुड़ी होती है। उसकी आर्थिक बदहाली या अशक्तता को लेकर हो सकती है। उसके समय क्या उसकी मनोभाव को लेकर हो सकती। पारिवारिक हालातों को लेकर हो सकती है। ऐसी कोई भी सीमाएं उसकी अपनी उस समय की मनोस्थिति पर पर भी निर्भर करता है कि वह अपने पर परिवार पर और खास तौर पर अपने बच्चे के साथ क्या व्यवहार कर रहा है। अथवा उस बच्‍चे अथवा परिवार के किसी सदस्‍य, उसके खानदान का रवैया और उसके आसपास यानी पड़ोस के लोगों के साथ उसके रिश्‍ते क्‍या हैं। इन्‍हीं सारी चीजों में से किसी एक अथवा अनेकानेक दिक्‍कतों से ही किसी भी अभिभावक के फैसले संचालित हो सकते हैं। चाहे यह फैसले अनायास हों, अथवा सायास।

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किसी भी अभिभावक की सीमाओं में उसकी शारीरिक क्षमता भी बहुत महत्वपूर्ण होती है। इसके साथ ही साथ, आर्थिक मसला भी बहुत जरूरी होता है। हो सकता है कि बच्चा जिस समय जिस चीज की मांग कर रहा हो या अपेक्षा कर रहा हो उस समय उसकी सुनवाई या प्रतिपूर्ति कर पाना उसके अभिभावक की बस की बात न है। सामान्य तौर पर ऐसी घटनाएं हमारे आस पास होती हैं। जहां अभिभावक अपनी सीमाओं को तोड़ नहीं पाते हैं। जबकि दूसरी ओर बच्चे की अपेक्षाएं हर सीमा को तोड़ देना चाहती है। यह उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव का सम्मेलन करा देने जैसी हालत होती है, जिसे निपटाना अक्सर नामुमकिन होता है। नतीजा, विद्रोह शुरू हो जाता है जिसकी परिणति क्रोध से होती है। और विध्वंस से उसका अनुष्ठान संपूर्ण हो जाता है।

उधर दूसरी तरफ देखें। एक व्यक्ति अपनी किसी अपेक्षा को लेकर पुलिस यह थाने के पास पहुंचता है तो सामान्य लोगों की भावना यही होती है कि उसे समाधान के बजाय दुत्कार ही मिलेगी। धन उगाही और ऊपर से अपमान बेहिसाब होगा। और फिर वह एक ऐसी मनोस्थिति तक पहुंच जाएगा, जहां लंबे भविष्य काल तक उसकी सारी रगें दुखती ही रहेंगी। थाना पुलिस और आम आदमी के बीच जो रिश्ता समझदारी का होना चाहिए या सोचा गया था वह आज बुरी तरह बिखर जाता दिख रहा है, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा ( क्रमश:)

यह घटना केवल इसलिए महत्‍वपूर्ण नहीं है कि इसमें पुलिसवालों ने सिर्फ उस बच्‍चे को संतुष्‍ट किया। बल्कि यह घटना इस लिए महान बन गयी है, क्‍योंकि पुलिसवालों ने इस बच्‍चे की निजी समस्‍या को सामाजिक समस्‍या की तरह देखा, और उसका सामूहिक तौर पर समाधान खोजने की कोशिश की है। इस मामले में हम इटावा के बड़ा दारोगा को सैल्‍यूट करते हैं। इसके साथ ही साथ इस पूरे मसले को बाल एवं मनो-सामाजिक मसले के तौर पर उसका विश्‍लेषण करने की कोशिश करने जा रहे हैं। यह श्रंखलाबद्ध आलेख तैयार किया है हमने। इसकी बाकी कडियों को देखने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

वर्दी में धड़कता दिल

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