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आप जल्दबाज तो रहे हैं, पर अचानक ऐसी क्या जल्दी?

: बहुत मिले जिन्‍दगी में, लेकिन बहुत कम संपादक ऐसे जिन्दादिल मिले : शेखर ने रोना तो सीखा ही नहीं था, मस्ती उनका जिंदगी का हिस्सा रही : डीएम एसपी की जमकर बखिया उधेड़ी थी शेखर भइया ने : कितनी ही उनके गर्मजोशी भरे आत्‍मीय ब्‍यवहार की यादें हैं :

मेरी बिटिया संवाददाता

लखनऊ : शेखर त्रिपाठी की मौत उनके प्रशंसकों के लिए किसी भारी ब्रज-पात से कम नहीं है। उनके निधन से शोकाकुल लोगों ने भरे दिल से प्रतिक्रियाएं दी हैं।

प्रमुख न्‍यूज पोर्टल इंडिया संवाद के संस्‍थापक-सम्‍पादक दीपक शर्मा ने लम्‍बे समय तक शेखर त्रिपाठी के अधीनस्‍थ लखनऊ में दैनिक जागरण में काम किया। उनके निधन पर दीपक ने लिखा है कि

Zinda dil insan

An honest person

Sad to see him leaving us

वरिष्‍ठ पत्रकार अकु श्रीवास्‍तव लिखते हैं कि:- जिंदगी ऐसी है पहेली .. कभी तो रूलाए ..कभी तो हंसाए.. शेखर ने रोना तो सीखा ही नहीं था. मस्ती उनका जिंदगी का हिस्सा रही. जिम्मेदारी उन्होंने हंस हंस कर ली और जो दूसरोे की मदद कर सकते थे , की। 35 साल से ज्यादा जानता रहा , गायब भी रहे .. पर सुध लेते रहे. उनके प्रशंसकों की लंबी फेहरिस्त है..लार्जर देन लाइफ जीने 6 फुटे दोस्त को प्रणाम.

श्रीकांत अस्‍थाना ने लिखा है कि :-  प्यारे शेखर दा, आप थोड़े जल्दबाज तो रहे हैं, पर आपको अचानक ऐसी क्या जल्दी हो गई थी? कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि किन शब्दों में अपनी बात कहूं। श्रद्धांजलि कहते हुए मन थरथरा रहा है!

हिन्‍दी पत्रकारिता-जगत में एक अप्रतिम और विशालकाय ग्रह थे शशांक शेखर त्रिपाठी। उनसे जुड़ी खबरों को पढ़ने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिए:-

शशांक शेखर त्रिपाठी

वाराणसी के हिन्‍दुस्‍तान अखबार में सहयोगी रह चुके और फिलवक्‍त वरिष्‍ठ पत्रकार एके लारी ने लिखा है कि:-

एक जिन्दादिल इंसान का जाना..!!

जी हां. हम वरिष्ठ पत्रकार शशांक शेखर त्रिपाठी की ही बात कर रहे हैं। अभी कुछ देर पहले खबर मिली कि उन्होंने दुनिया से विदा ले लिया। उनका जाना हमारी व्यक्तिगत रूप से बड़ी क्षति है। हिन्दुस्तान वाराणसी के जब वह स्थानीय संपादक थे तो साथ काम करने का मौक़ा मिला। बहुत कम संपादक ऐसे जिन्दादिल मिले। अनेक यादें जुड़ी है। पर फिलहाल कुछ कह पाना मुश्किल । सप्ताह भर पहले गाजियाबाद के एक अस्पताल में भर्ती थे। पर ये कहां पता था कि इतनी जल्दी...।

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पत्रकार

दिल्‍ली के पत्रकार सत्‍येंद्र पीएस ने लिखा है कि:- शशांक शेखर त्रिपाठी नहीं रहे। हिंदी जगत के जाने माने पत्रकार, संपादक। डेढ़ दशक की यादें, साथ, मिलना जुलना। यह सब यादों में ही। आखिर तक उम्मीद लगाए रहा कि उठ बैठेंगे, वह फिर पहले जैसे बतियाएंगे।

लेकिन चले गए। विनम्र श्रद्धांजलि।

कल (सोमवार) दोपहर को अंतिम संस्कार दिल्ली के निगमबोध घाट पर होगा।

भदोही के पत्रकार, और शेखर त्रिपाठी के साथ काम कर चुके सुरेश गांधी ने लिखा है कि:-

जिंदादिल और जांबाज संपादक थे शशांक शेखर त्रिपाठी जी,

मेरा उनसे तो व्यक्तिगत जुड़ाव था, उन्होंने ही मुझे भदोही का न सिर्फ ब्यूरोचीफ बनाया बल्कि मेरी शिकायत किए जाने पर डीएम एसपी की जमकर बखिया उधेड़ी थी, यहां तक हिन्दुस्तान संपादक रही मृणाल पांडेय जी द्वारा जारी मेरी शिकायती पत्र के जवाब में कहा था मैं सुरेश गांधी को व्यक्तिगत जानता हूं, उसके जैसा तो कोई पूर्वांचल में नहीं हैं, वह जवाबी लेटर आज भी मैं संभाल कर रखा हूं ....ॐ शांति , नमन ! !

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कानपुर

शम्‍भू दयाल बाजपाई ने लिखा है कि ओह , मेरी लिए भी यह वज्रघाती खबर है। दो ढाई महीने से कई बार दिल्‍ली आने को कहा , मैं जा नहीं पाया । क्‍या पता था बिन मिले रह जाऊंगा । कितनी ही उनके गर्मजोशी भरे आत्‍मीय ब्‍यवहार की यादें हैं । सदैव मदद को आगे रहते । बडे ब्‍यक्तित्‍व ऐसे सहृदय आत्‍मीय का जाना जीवन में बडा खालीपन दे गया ।

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