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मेडिकल स्‍टोर के शौचालय में ऑपरेशन से मरा मरीज, 3 लाख की पेनॉल्‍टी

: तड़पते मरीज तो सरकारी डॉक्‍टरों की दुधारू गाय हैं। जितना चाहो, दुह लो : एक मेहनती डॉक्‍टर गुप्‍ता था, इस्‍तीफा देकर चला गया : कई डॉक्‍टरों की तो डीएम-एसपी के नाम से ही सुस्‍सू निकल जाती है :

कुमार सौवीर

लखनऊ : सरकार लाख चिल्‍ल-पों कर ले, लेकिन हकीकत यही है कि यहां के सरकारी डॉक्‍टर सरकारी ड्यूटी नहीं, बल्कि प्राइवेट-प्रैक्टिस में ज्‍यादा मशगूल हैं। ऐसे डॉक्‍टरों के लिए जौनपुर की जमीन बेहद उर्वर साबित होती है, जैसे मोहम्‍मद गोरी या तैमूर लंग को हिन्‍दुस्‍तान बार-बार याद आती थी। जो डॉक्‍टर यहां पोस्टिंग पा गया, वह दोबारा आना ही नहीं चाहता। अगर ट्रांसफर पर भेजा गया, तो छुट्टी लेकर यही आ जाता है। एक सर्जन हैं अनिल शर्मा, उन्‍होंने एक मेडिकल स्‍टोर के पीछे बने शौचालय में लाले यादव नामक मरीज का ऑपरेशन कर दिया। नतीजा यह हुआ कि उसकी मौत हो गयी। मामला उपभोक्‍ता फोरम पर पहुंचा, तो तीन लाख रूपयों की पैनाल्‍टी अनिल शर्मा पर पड़ गयी। लेकिन विभाग ने अनिल शर्मा पर कोई भी कार्रवाई नहीं की, बल्कि उसे दोबारा जौनपुर भेज दिया। आज वह फिर प्राइवेट प्रैक्टिस कर रहा है।

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जुल्‍फी प्रशासन

शायद ही कोई इस बात पर यकीन करेगा कि लखनऊ तक के सरकारी डॉक्‍टर भी बाकायदा छुट्टी लेकर दो-तीन दिन जौनपुर में गुजारते हैं, प्रैक्टिस करते हैं। इसके लिए उन सब ने अपने-अपने चैम्‍बर बना लिये हैं। कई तो ऐसे डॉक्‍टर हैं, जो तबादले में जाने को तैयार तक नहीं होते। अगर चले भी जाएं, तो चंद दिनों में ही वापस परवाना लेकर लौट आते हैं। आपसी बातचीत में सरकारी डॉक्‍टर लोग खुलेआम चर्चा करते हैं कि जौनपुर में बहुत माल है। हाथ लगाने की देर है, नोटों की झड़ी लगा देते हैं जौनपुर के लोग। मरीजों को इलाज कराने के लिए सरकारी परचा बनवाना से पहले जरूरी होता है किसी दलाल से सम्‍पर्क करना। यह दलाल स्‍थानीय आवारा घुमन्‍तू भी हो सकते हैं, किसी निजी मेडिकल या डायग्‍नोस्टिग सेंटर के हो सकते हैं।

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भगवान धन्‍वन्तरि

वैसे एक खास बात है। यहां एक डॉक्‍टर यहां खूब शोहरत थी। कुछ सनकी टाइम ईमानदार डॉक्‍टर था। शायद सर्जन गुप्‍ता, जिनका नाम मेरी स्‍मृति से निकल गया। मगर इतना जरूर है कि यह नाक-कान-गला के डॉक्‍टर हैं। बनारस से रोज आते थे, समय से कुर्सी पर जम जाते। और आखिरी मरीज देख और सारे ऑपरेशन निपटा कर ही अस्‍पताल छोड़ते। उसके बाद ही उनकी प्राइवेट-प्रैक्टिस हो जाती। ज्‍यादातर बनारस में ही। लेकिन अचानक यहां के डॉक्‍टरों की राजनीति-गोटबाजी से एक दिन डॉ गुप्‍ता इतना आजिज हो गये कि इस्‍तीफा देकर अपने घर बैठ गये। मैं तो कहता हूं कि ऐसे भी दो-चार डॉक्‍टर मिल जाएं, तो भी बहुत है। जौनपुर में तैनात रह चुके एक वरिष्‍ठ डॉक्‍टर ने बताया कि कई डॉक्‍टरों की तो डीएम-एसपी के नाम से ही सुस्‍सू निकल जाती है।

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ऐसे-वैसे भी डॉक्‍टर

बात ठीक ही लगती है। जरा याद कीजिए ढाई साल पहले का वह हादसा, जब करीब 17 बरस की बच्‍ची रात दस बजे भंडारी रेलवे स्‍टेशन के पास नाली के किनारे पायी गयी थी। रिक्‍शावालों ने उसे अस्‍पताल में भर्ती तो करा दिया, उसके बाद अस्‍पताल के डॉक्‍टरों ने उसकी खबर पुलिस को वारंट जारी कर भेज दिया। लेकिन उस रिपोर्ट आज तक नहीं लिखी गयी। हां, बाद में प्रमुख न्‍यूज पोर्टल मेरी बिटिया डॉट कॉम ने इस पर लगातार खबरें लिखनी शुरू कीं, तो घबराये डीएम ने उसे पहले तो बनारस के पागलखाना भेजने की साजिश की, फिर उसमें नाकाम होकर उसे नारी निकेतन भेज दिया। हैरत की बात है कि इस मामले की फाइल तक अस्‍पताल के सीएमएस ने महीनों तक अपनी अलमारी में दबाये रखा।

खैर, इस खबर की अगली कुछ कड़ी जौनपुर के डॉक्‍टरों पर भी चलती रहेगी। ( क्रमश: )

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जस्टिस और न्‍यायपालिका

बहुत सहज जिला है जौनपुर, और वहां के लोग भी। जो कुछ भी है, सामने है। बिलकुल स्‍पष्‍ट, साफ-साफ। कुछ भी पोशीदा या छिपा नहीं है। आप चुटकियों में उसे आंक सकते हैं, मसलन बटलोई पर पकते भात का एक चावल मात्र से आप उसके चुरने का अंदाजा लगा लेते हैं। सरल शख्‍स और कमीनों के बीच अनुपात खासा गहरा है। एक लाख पर बस दस-बारह लोग। जो खिलाड़ी प्रवृत्ति के लोग हैं, उन्‍हें दो-एक मुलाकात में ही पहचान सकते हैं। अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता। जो ज्‍यादा बोल रहा है, समझ लीजिए कि आपको उससे दूरी बना लेनी चाहिए। रसीले होंठ वाले लोग बहुत ऊंचे दर्जे के होते हैं यहां। बस सतर्क रहिये, और उन्‍हें गाहे-ब-गाहे उंगरियाते रहिये, बस।

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राग-जौनपुरी

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