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यह देश के बड़े पत्रकार हैं। देखिये तो कि कैसे सफेद झूठ बोल पड़े

: चंचल-भूजी की जेलयात्रा पर भी खबरें लिखी गयीं, वह पत्रकारिता के नाम पर कलंक : झूठ का घूंघट काढ़े सारे बड़े पत्रकार एकजुट होकर हुक्‍का-हुआं करने लगे : किसी ने भी सच खोल कर देखने-समझने की जरूरत तक नहीं समझी : कुल 34 बरस पुराना मामला है, बना दिया 40 वर्ष पूर्व का :

कुमार सौवीर

जौनपुर : पत्रकारिता में झूठ का प्रयोग इक्‍का-दुक्‍का तो हर सम्‍पादक अक्‍सर कर ही लेता है। लेकिन बड़े-बड़े सम्‍पादकों-पत्रकारों का एकजुट झूठ वाला सामवेदी विधवा-रूदन पहली बार दिखा, जब प्रख्‍यात पेंटर, कार्टूनिस्‍ट, लेखक की अपनी छवि पर कांग्रेसी-छौंक लगाये चंचल को जेल जाना पड़ा। चंचल जी अपनी शेखी और लापरवाही के साथ ही साथ अपनी राजनीतिक आकांक्षाओं की गोटियां बिछाने में मशगूल थे, और इसी बिसात पर अचानक मामला उनके खिलाफ जब जेल जाने का फरमान अदालत ने जारी किया, तो चंचल ने उसे पॉलिटिकल-ट्विस्‍ट कर छक्‍का मार कर उसे बाउंड्री से बाहर उछालने की कोशिश की। इसमें उनके बड़े पत्रकार मित्रों ने अपनी सीमाओं तक का त्‍याग कर दिया, नतीजा यह हुआ कि ऐसे हर सम्‍पादक ने अपनी नाक छिनक कर फेसबुक पर पोंछ डाली, अपने घडि़याली आंसुओं से असलियत को गंदा किया, पत्रकारिता को कलंकित किया, और सच लिखने का हौसला दिखाने वालों के खिलाफ बाकायदा बन-कूकुर जैसी घेराबंदी कर ली। चाहे वे ओम थानवी हों, उर्मिलेश हों, शम्‍भूनाथ शुक्‍ल हों, शेषनारायण सिंह हों अथवा अम्‍बरीश हों या आलोक जोशी। चंचल के इस मामले में सब के सब के चरित्र एक-समान ही रहे, सिर्फ दागी।

जनसत्‍ता के सम्‍पादक रह चुके ओम थानवी ने झूठी पत्रकारिता की टांग ही तोड़ दी। चंचल का मामला सन-82 का है, जिसमें चंचल सीधे-सीधे मारपीट और सरकारी कामकाज में बाधित करने के मामले में नामजद हैं। लेकिन थानवी जी चाहते हैं कि उनके दोस्‍तों पर कोई आंच न आये, कानून-व्‍यवस्‍था और संविधान गया भाड़ में। जरा देखिये तो थानवी ने क्‍या ज्ञान बघारा है चंचल के पक्ष में:- देश में कई क़ानून ऐसे हैं, जिन्हें हम ढो भर रहे हैं। चंचलजी इसी का शिकार हुए हैं। वायर पर मुक़दमा भी उस क़ानून की उपज है जो अंगरेजों द्वारा डराने के लिए तजबीज किया गया था। कांग्रेस ने बात की, पर उन क़ानूनों को सुधारा नहीं। इस सरकार से तो उम्मीद ही क्या। प्रक्रियागत ख़ामियों को जज लोग अपने स्तर पर नहीं सुधार सकते। उन्हें चाहे-अनचाहे ख़ुद उनसे खेल जाना पड़ता है। Chanchal Bhu किसी अपराध के लिए गिरफ़्तार नहीं हुए हैं। एक जनसरोकारी विचारवान नेता और कलाकार की छात्र-जीवन में शासन से भिड़ंत का यह घिनौना हासिल है। इससे चंचलजी के प्रति लोगों का सम्मान घटेगा नहीं, बल्कि बढ़ेगा ही। यह बात अपने आप में शासन और क़ानून दोनों को ठेंगे पर रखती है।

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शेष नारायण सिंह ने तो झूठ की लड़ी ही बिखेर दी। हालांकि चंचल का दावा है कि वे 28 बार जेल चुके हैं। लेकिन उन्‍होंने केवल दावा ही किया है, कब-कब जेल गये, इसका कोई भी खुलासा नहीं किया है चंचल जी। लेकिन शेषनारायण सिंह इस मामले में बड़की-बुआ बन गये और 28 के बदले लिख मारा कि चंचल सैकड़ों बार जेल जा चुके हैं। सरासर झूठ। अब कोई पूछे शेषनारायण सिंह से, तो वे हनहना कर हिचकियां मारना शुरू कर देंगे, हर अंग-प्रत्‍यंग से। शर्म की बात है कि जब वे चंचल जैसी शख्सियत के बारे में ऐसा सफेद झूठ पाठकों के सामने परोस कर देते हैं, तो अपने अखबार और टीवी चैनलों में कितना झूठ का रायता फैला देते होंगे। उन्‍होंने लिखा है:- Chanchal की रिहाई पर जश्न का कोई मतलब नहीं है. सैकड़ों बार वे जेल गए हैं , हक की लड़ाई के लिए. बुनियादी सवाल यह है कि पता किया जाए कि यह कारस्तानी मुकामी पुलिस की है या ऊपर से हुकुम था. एक और बड़ा सवाल है कि अगर दुनिया को सन्देश देने की कोशिश की गयी है तो बात सौ फीसदी उल्टी पड़ी है. मैं उनको जानता हूँ, सत्ता से सवाल पूछने के अधिकार को वे हमेशा से ही मौलिक अधिकार बनाने की बात करते रहे हैं . उनको जेल भेजने के बाद जितने सवाल पूरी दुनिया में पूछे गए ,वे उनके मिशन को ताक़त देते हैं .ज़बान पर ताला लगाने वालों को माकूल जवाब भी मिल गया होगा.

उर्मिलेश भी झूट्ठों के सिरताजों में से एक निकले। राज्‍यसभा टीवी जैसे चैनल में सम्‍पादक रह चुके उर्मिलेश की पहचान उनके तेवर और उनके ज्ञान से है। लेकिन चंचल के मामले में उर्मिलेश ने बेहद शर्मनाक व्‍यवहार किया आपने पाठकों से। 35 साल पुराने मामले को सीधे-सीधे 40 पुराना साबित कर दिया। साजिश साफ है कि वे चंचल की इस हरकत को सड़कछाप छिपा कर उसे बीएचयू के युवा आंदोलन से जोड़ने की साशिज कर रहे थे। उन्‍होंने लिखा है कि:- 'लोकतंत्र' का यह चेहरा भी देखना था! भाई चंचल को सन्1978 के एक पुराने मामले को बहाना बनाकर आज गिरफ्तार कर लिया गया। यह मामला BHU के एक छात्र आंदोलन से सम्बंधित था। अपने दौर में समाजवादी धारा के विख्यात छात्र नेता रहे भाई चंचल के बिंदास और बेबाक जीवन को आप सभी जानते हैं। बीते कुछ समय से वह सामाजिक कार्य करते हुए सोशल मीडिया पर भी खासे सक्रिय रहे हैं। निस्संदेह, उनकी इस सक्रियता से भी कुछ ताकतवर लोग कुपित रहे होंगे! पता नहीं और क्या कारक हैं इस गिरफ्तारी के? पर जो कुछ हो रहा है, वह लोकतंत्र के खत्म किये जाने की तैयारी का ठोस संकेत है!

यही साजिश की है अमर उजाला के सम्‍पादक रह चुके शम्‍भूनाथ शुक्‍ला ने। उन्‍होंने लिखा है कि :- चंचल जी (Chanchal Bhu) को चालीस साल पुराने एक मामले में पकड़ा गया है। मामला इतना छोटा है कि अब तक तो पुलिस को उस पर फ़ाइनल रिपोर्ट दाख़िल कर देनी थी। लेकिन केस खोले रखा गया ताकि कभी उनको धरा जा सके। आख़िर वो हैं तो समाजवादी ही। और सरकार चाहे किसी की हो समाजवादी को कोई छूट नहीं मिलती। समाजवादी आख़िर होता तो समाजवादी ही है। वह कांग्रेसी, भाजपाई, सपाई अथवा बसपाई नहीं होता इसीलिए केस बंद नहीं किया गया। आज चूँकि चंचल जी व्यवस्था के विरोध में मुखर हैं इसलिए उन्हें पकड़ लिया गया। इस पुलिसिया हरकत का सख़्त विरोध होना चाहिए।

चंचल-भूजी जी एक, लेकिन उनकी कथा अनन्‍ता। अगली कड़ी में उनकी जेल-भित्‍तरगिरी का खुलासा होगा। अगली कडियों को बांचने के लिए निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

चंचल भूजी जी

बहुत सहज जिला है जौनपुर, और वहां के लोग भी। जो कुछ भी है, सामने है। बिलकुल स्‍पष्‍ट, साफ-साफ। कुछ भी पोशीदा या छिपा नहीं है। आप चुटकियों में उसे आंक सकते हैं, मसलन बटलोई पर पकते भात का एक चावल मात्र से आप उसके चुरने का अंदाजा लगा लेते हैं। सरल शख्‍स और कमीनों के बीच अनुपात खासा गहरा है। एक लाख पर बस दस-बारह लोग। जो खिलाड़ी प्रवृत्ति के लोग हैं, उन्‍हें दो-एक मुलाकात में ही पहचान सकते हैं। अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता। जो ज्‍यादा बोल रहा है, समझ लीजिए कि आपको उससे दूरी बना लेनी चाहिए। रसीले होंठ वाले लोग बहुत ऊंचे दर्जे के होते हैं यहां। बस सतर्क रहिये, और उन्‍हें गाहे-ब-गाहे उंगरियाते रहिये, बस।

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राग-जौनपुरी

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