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मैं वॉच-बुलडॉग हूं। अब कम ही बचे हैं ऐसे लुप्‍तप्राय पत्रकार

: जहां असत्‍य दिखेगा, भौंक पड़ुंगा। मैं आपका पालित-श्‍वान नहीं बनना चाहता, कि आपकी हर बात पर ताली पीटूं : अब तो कड़क क्रीज, और आईना जूतों के साथ कण्‍ठ-लंगोट में ही खुद को कसे रहते हैं पत्रकार : बकरदाढ़ी वाले भी पत्रकारों की भी संख्‍या बढ़ती जा रही :

कुमार सौवीर

लखनऊ : अब सवाल सीधे चंचल-भूजी जी से है। चंचल-भू तो छात्र नेता थे तब, फिर सीमेंट का परमिट हासिल करने के लिए एसडीएम के ब्‍लाक निरीक्षण के दौरान क्‍यों गये। भूजी-जी, सवाल यह भी है कि सन-84 में आपने जमानत-बांड क्‍यों भरा और जमानत पर क्‍यों रिहा हुए। जब बेल-बॉण्‍ड में रिहा हुए थे, तो पेशी पर क्‍यों नहीं गये। इसके बाद आप पर बार-बार गैरजमानती वारंट जारी हुआ, लेकिन आप पेशी पर क्‍यों नहीं गये। अचानक आप क्‍यों जेल जाने की तैयारी करने लगे। आप पर तो अराजकता, मारपीट और अनुशासनहीनता तथा व्‍यवस्‍था-विरोधी गतिविधियों में पकड़ा गया था न, फिर आपने उसे आज उस गिरफ्तारी को राजनीतिक चाल के तौर पर क्‍यों बदल दिया। और अगर आपको लग रहा है कि आपके फेसबुक-लेखन से राजनीतिक विद्वेष वाली साजिश चल रही है, और उन हालातों में आपको अगर जेल ही जाना था, फिर दोबारा बांड क्‍यों भरा, और फिर रिहा हो गये। और फिर आखिरी सवाल यह है कि इस बात की क्‍या गारंटी होगी कि आप भविष्‍य में ऐसी अराजकता का प्रदर्शन नहीं करेंगे।

मेरा यकीन है कि चंचल-भूजी जी के समर्थक ऐसे सवालों पर मंथन करेंगे।

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जस्टिस और न्‍यायपालिका

अब चलते-चलते एक स्‍पष्‍टीकरण दे दूं मैं, कि मैं उन्‍हें चंचल-भूजी जी क्‍यों कहता हूं। दरअसल यह एक दिव्‍य क्षेपक है, सुनिये तो आप लोग सहमत हो जाएंगे। सच बात तो यह है कि उनसे मेरी मोहब्‍बत अपनी जगह है, और वैचारिक झगड़ा अपनी जगह। दरअसल भूजी-जी से मेरा बंधुवत रिश्‍ता है। वे बड़े समान भाई भी हैं, घनिष्‍ठ मित्र भी। और जैसे उनकी आदत चिकोटी काट लेनी की है, मेरी भी है। उन्‍होंने मुझसे बाद फेसबुक वाली ट्रेन दबोची, और नाम लिख दिया चंचल बीएचयू। चिकोटी लेते हुए मैंने उन्‍हें चंचल-भू कह दिया। साथ में सम्‍मान के साथ जी लगा दिया तो हो गया पूरा नाम चंचल-भूजी। अब दिक्‍कत यह आयी कि जब पूरा नाम हो गया कि चंचल-भूजी तो फिर सुपर-सम्‍मान के साथ एक और जी तोड़ दिया। यानी सम्‍पूर्ण हो गया नाम चंचल-भूजी जी। इस तरह उनके नाम में भूजत्‍व पूरे सम्‍मान के साथ डबल-डबल हो गया। यह हास्‍य का बिन्‍दु हो गया है।

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जुल्‍फी प्रशासन

मैं मूलत: पत्रकार हूं, चंचल-भूजी जी का बेहद सम्‍मान करता हूं, लेकिन उनका वैचारिक विरोधी भी हूं। जाति ही ऐसी है मेरी, पत्रकारिता वाली। कुकुरोचित, वॉच-डॉग। और डॉग वाली जाति में भी मेरी प्रजाति बुल-डॉग की है। हालांकि अब बहुत कम पत्रकार ही ऐसे बचे हैं, जो खुद को वॉच-डॉग सुन और कह कर खुद को गर्वोन्वित हो जाते हैं। बाकी तो अब कड़क क्रीज, और आईना जूतों के साथ कण्‍ठ-लंगोट में ही खुद को कसे रहते हैं। हालांकि चंचल-भूजी जी वैसे तो पत्रकार की भी भूमिका में यदा-कदा आ जाते हैं, लेकिन उन्‍हें खुद को वॉच-डॉग कहलाने में गुप्‍त-परहेज है। अलबत्‍ता वे पत्रकारिता जगत में मंडवाली के घोषित लोगों के बगलगीर बने रहते हैं, और उनके पालित-श्‍वान यानी कुत्‍तों को पुचकारने का कोई भी मौका नहीं छोड़ते।

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लर्नेड वकील साहब

चंचल भू बहुत नाराज हैं कुमार सौवीर से। लेकिन सच चंचल की नाराजगी मुझसे सीधे नहीं है, बल्कि उनके तेली-तमोलियों ने मेरे खिलाफ उनका इतना तेल लगा दिया है, कि चंचल-भूजी जी बिलकुल फनफना पड़े हैं। सहज भाव और हास्‍य भाव नदारत है उनका। उसकी जगह चिढ़ और खीझ ने ले ली है। अब समस्‍या यह है कि मैं चंचल के अनेक आयामों का समर्थक और उन का अनुगामी जरूर हूं, मगर उनकी तरह वक्‍त-जरूरत अपने तेवर नहीं बदल सकता। मुझे सच ही पसंद है, और मैं वही करूंगा, जो सच की कसौटी पर खरा सच साबित होगा। मैं चंचल का पालित-श्‍वान नहीं हूं, जो उनकी हर बात का समर्थन करता रहे। मैं चंचल के इन पालतू-श्‍वान समर्थकों की तरह नहीं हूं, जिनमें न तो बात करने की हैसियत है, न सोचने की तमीज है, और न ही लिखने का शऊर ही। जो सिर्फ उतना ही समझ-कर सकते हैं, जितना उन्‍हें बताया गया होगा, जिनकी माइंड-सेटिंग है।

मेरा चिंतन, मेरा मार्ग स्‍वतंत्र है, भले ही वह सच चंचल-भूजी जी को नापसंद हो, या उनके समर्थकों की हाथ में मक्‍खन की टिकिया थमा दे। कुमार सौवीर के ठेंगे से।

चंचल-भूजी जी एक, लेकिन उनकी कथा अनन्‍ता। अगली कड़ी में उनकी जेल-भित्‍तरगिरी का खुलासा होगा। अगली कडियों को बांचने के लिए निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

चंचल भूजी जी

बहुत सहज जिला है जौनपुर, और वहां के लोग भी। जो कुछ भी है, सामने है। बिलकुल स्‍पष्‍ट, साफ-साफ। कुछ भी पोशीदा या छिपा नहीं है। आप चुटकियों में उसे आंक सकते हैं, मसलन बटलोई पर पकते भात का एक चावल मात्र से आप उसके चुरने का अंदाजा लगा लेते हैं। सरल शख्‍स और कमीनों के बीच अनुपात खासा गहरा है। एक लाख पर बस दस-बारह लोग। जो खिलाड़ी प्रवृत्ति के लोग हैं, उन्‍हें दो-एक मुलाकात में ही पहचान सकते हैं। अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता। जो ज्‍यादा बोल रहा है, समझ लीजिए कि आपको उससे दूरी बना लेनी चाहिए। रसीले होंठ वाले लोग बहुत ऊंचे दर्जे के होते हैं यहां। बस सतर्क रहिये, और उन्‍हें गाहे-ब-गाहे उंगरियाते रहिये, बस।

यह श्रंखलाबद्ध समाचार आलेख है। अगर आप इसकी बाकी कडि़यों को पढ़ने में इच्‍छुक हों, तो निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिएगा:-

राग-जौनपुरी

Comments (1)Add Comment
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written by suhel siddiqui, November 24, 2017
Very good sir

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