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जज साहब, आपने रिटायरमेंट के समय यह फैसला क्‍यों किया !!!

: अदालतों को समझना हो तो परसू और स्‍टेनो-कांड को देखिये : कुख्‍यात अपराधी परसू यादव का वारंट जारी कर दिया, लेकिन जब बवाल हुआ तो मुझ से भिड़ गये सीजेएम : सवाल यह है कि आखिर डीएम के स्‍टेनो को क्‍यों बरी किया जिला जज ने :

कुमार सौवीर

जौनपुर : पूर्वांचल का एक कुख्‍यात अपराधी था परशुराम यादव उर्फ परसू यादव। कई मामलों में वांछित था, और जाहिर था कि फरार था। एक दिन सीजेएम ने उसके नाम पर वारंट जारी कर दिया। वारंट में साफ लिखा था कि परसू यादव का हालपता प्रदेश के राज्‍यमंत्री ललई यादव का सरकारी आवास है। उसी वारंट के आधार पर मैंने खबर लिख दी। लो, हो गया हंगामा। ऑफिस में सीजेएम साहब बहुत भड़के। बोले कि पत्रकारों को अदालतों पर टिप्‍पणी करने का कोई अधिकार ही नहीं होता है। सरकारी फाइल पर सीजेएम साहब ने लिख मारा कि परसू यादव के बारे में जो बारे सूचनाएं मिलीं, उसी के आधार पर अदालत ने वारंट जारी किया, लेकिन प्रेस को अपनी सीमा में रहना चाहिए।

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जुल्‍फी प्रशासन

मैंने फिर ऐतराज किया। अगले दिन के अखबार में लिख दिया कि अपने ही आदेश की समीक्षा करने का आधार सीजेएम को नहीं होता है, ऐसी हालत में सीजेएम ने किस आधार पर यह समीक्षा कर डाली। इस पर सीजेएम ने कुछ वकीलों से बातचीत की, और पाया कि इस मामले पर तूल देना उचित नहीं होगा। मुझे भी किसी सम्‍मानित संस्‍था से इस या ऐसे किसी छोटे-मोटे मसले पर भिड़ने का कोई औचित्‍य नहीं दिखा। नतीजा यह कि उसके बाद से मैंने भी अपनी ओर से खामोशी अख्तियार कर लिया।

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हर सू जौनपुर

दूसरा किस्‍सा था डीएम के स्‍टेनो शिवशंकर लाल श्रीवास्‍तव का। नीरा यादव के जमाने से वह डीएम का स्‍टेनो रहा था, मुंहलगा। करीब 15 बरस पहले इस स्‍टेनो ने अपनी पत्‍नी और बेटी को मार डाला, और उसकी बोटी-बोटी काट डाली। इस कांड का चश्‍मदीद गवाह थी उसकी एक बेटी और उसका बेटा। मामले पर अदालत में गवाही और जिरह भी पूरी हो गयी। सुनवाई की जिला जज ने। लेकिन इस स्‍टेनो शिवशंकर लाल श्रीवास्‍तव को अदालत ने बरी कर दिया। मैंने एक अधिकारी से पूछा कि आखिर यह कैसे हो पाया। उस अधिकारी ने बताया कि चूंकि वह स्‍टेनो के छोटे-छोटे बच्‍चे थे, और उसको सजा मिलने से पूरा परिवार तबाह हो जाता, ऐसी हालत में जज साहब ने तय किया कि स्‍टेनो को बरी कर दिया जाए। इसकी एवज में उस स्‍टेनो ने अपने बच्‍चों के नाम पर सम्‍पत्ति कर दी थी।

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लर्नेड वकील साहब

सवाल यह है कि आखिर जज साहब का काम-दायित्‍व तो मामले का गुण-दोष के आधार पर मुकदमे का निस्‍तारण करना था। ऐसी हालत में आपने स्‍टेनो को किस आधार पर बरी कर दिया। यह इंसाफ तो नहीं ही हुआ, बल्कि सच शब्‍दों में कहा जाए तो जज साहब का यह फैसला किसी डीलर जैसा रहा, जिसमें तथ्‍य के बजाय इस पर ध्‍यान दिया गया कि कैसे मामला निपटाया जाए।

जज साहब को लेकर बस आखिरी बात यह कि जिस दिन जज साहब ने उस स्‍टेनो पर यह फैसला किया कि उसी एकाध दिन में ही जज साहब का रिटायरमेंट था।

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जस्टिस और न्‍यायपालिका

लेकिन दूसरी बात वकीलों को लेकर। हैरत की बात रही कि स्‍टेनो के इस जघन्‍य हत्‍याकांड पर यह फैसला हुआ कि स्‍टेनो शिवशंकर लाल श्रीवास्‍तव बरी कर दिया गया, उसको चुनौती देने के लिए वह वकील भी आगे नहीं आया, जिसे अपराध से जुड़े मामलों को सरकार ने जिला शासकीय अधिवक्‍ता के तौर पर नियुक्‍त किया था। और तो और, पूरे जिला को दहला डालने वाले इस कांड पर अदालती फैसले को चुनौती देने के लिए कोई भी ही संस्‍था, वकील अथवा जिम्‍मेदार नागरिक सामने नहीं आया।

यानी मामला हमेशा-हमेशा के लिए दफ्न हो गया। वह भी तब, जबकि इसी जौनपुर में सतीश चंद्र मिश्र, आदित्‍य नारायण मिश्र जैसे महान वकील जौनपुर के विधि-क्षितिज के दैदीप्‍यमान सूर्य मौजूद थे, और पीसी विश्‍वकर्मा जैसे विधि-विशेषज्ञ। मगर कोई भी नहीं बोला, कोई नहीं चिहुंका।

लेकिन आपसे सवाल है जज साहब,  कि आपने रिटायरमेंट के समय यह फैसला क्‍यों किया  ( क्रमश: )

बहुत सहज जिला है जौनपुर, और वहां के लोग भी। जो कुछ भी है, सामने है। बिलकुल स्‍पष्‍ट, साफ-साफ। कुछ भी पोशीदा या छिपा नहीं है। आप चुटकियों में उसे आंक सकते हैं, मसलन बटलोई पर पकते भात का एक चावल मात्र से आप उसके चुरने का अंदाजा लगा लेते हैं। सरल शख्‍स और कमीनों के बीच अनुपात खासा गहरा है। एक लाख पर बस दस-बारह लोग। जो खिलाड़ी प्रवृत्ति के लोग हैं, उन्‍हें दो-एक मुलाकात में ही पहचान सकते हैं। अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता। जो ज्‍यादा बोल रहा है, समझ लीजिए कि आपको उससे दूरी बना लेनी चाहिए। रसीले होंठ वाले लोग बहुत ऊंचे दर्जे के होते हैं यहां। बस सतर्क रहिये, और उन्‍हें गाहे-ब-गाहे उंगरियाते रहिये, बस।

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राग-जौनपुरी

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