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चियां जैसा मुंह लिये डीएम साहब ने अपना नया रास्‍ता ही बना लिया

: आक्रोश-नैराश्‍य के आने को कोई रोक नहीं सकता, लेकिन जाने के लिए चहारसू है जौनपुर में : मुकदमा निपटे कैसे, जब डीएम तक खुद दीवानी से भिड़े रहते हों : रिटायरमेंट पर जज साहब सरकारी फर्नीचर तक लाद ले गये : मूली और मक्‍का मिल कर यहां की मक्‍कारी को भगाते रहते हैं :

कुमार सौवीर

जौनपुर : ( गतांक से आगे ) मेरी समझ में आज तक नहीं आया कि आखिर कितने संयम के साथ यहां के लोग इस नीरस माहौल में जिन्‍दा रह पाते हैं। पचास बरस पुराने अंदाज वाले हैंडपंप के पानी के बल पर चलते झोंपड़ी-नुमा रेस्‍टोरेंट में गुलाब-जामुन, पकौड़ी, समोसा और बाटी-चोखा के साथ चाय। बस। इसी बमुश्किल दस एकड़ में बसी दिनभर तक सिमट जाने वाली नगरी चंद घंटों में इतनी व्‍यस्‍त हो जाती है, यकीन ही नहीं आता। पूरे जिले का झगड़ा यहीं तक सिमट जाता है। जय प्रकाश बताते हैं कि यह अनोखा जिला है। बार एसोसियेशन अपनी निजी इमारत में चैम्‍बर बनाया है। लेकिन आज भी झोंपडि़यों में ही घुटने का मजबूर हैं यहां के करीब तीन हजार वकील। जजों और वकीलों के बीच कभी भी कोई झगड़ा नहीं हो पाया जौनपुर की दीवानी कचेहरी में।

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जस्टिस और न्‍यायपालिका

हां, एक अपर जिला जज ने एक वकील के घर के सामने अतिक्रमण कर लिया, तो बवाल हुआ था। जज अभद्रता पर उतारू थे, नतीजा यह हुआ कि वकीलों ने उस जज का बहिष्‍कार कर दिया। यह विवाद करीब साढ़े तीन महीनों तक चला, जब वह रिटायर न हो गये। हैरत की बात है कि यही जज साहब जिला छोड़ते वक्‍त सरकारी फर्नीचर तक साथ ले गये। वह तो अदालत ने हस्‍तक्षेप कर दिया, और जज साहब के यहां से फर्नीचर वापस लौटा लिया गया। इसके अलावा कभी भी बार-बेंच में कोई भी मारक तनाव नहीं पनपा। अदालत परिसर में कभी भी कोई बड़ा झंझट नहीं हुआ। जबकि मडि़याहूं और शाहगंज की अदालतों में अक्‍सर और नियमित कार्य-बहिष्‍कार करते रहते हैं वकील।

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लर्नेड वकील साहब

मुझे भी यही लगता है। शर्की-सल्‍तनत में चाहारसू यानी चौराहे का नामकरण यूं ही नहीं हुआ होगा। ईरानियों ने कुछ सोच कर ही भविष्‍य बुना होगा कि संतोष और आनंद की ही तरह आक्रोश और नैराश्‍य भाव इस रास्‍ते आयेगा, और उस रास्‍ते निकल जाएगा। इसीलिए आज भी मूली, मक्‍का और मक्‍कारी में मूली और मक्‍का मिल कर यहां की मक्‍कारी को अक्‍सर लतियाते-भगाते रहते हैं। झगड़े कहां नहीं होते हैं, लेकिन जौनपुर में झगड़ों की उपज हिंसा नहीं होती। भीड़ मुकदमों में तब्‍दील हो जाती है। प्रशासन यहां की जमीनी हकीकत को कभी भी नहीं समझ पाता। अफसर आते हैं, मौज-मस्‍ती करते हैं। बहुत ही कम अफसर ऐसे आये हैं, जो आम आदमी की जरूरत को समझ कर आम आदमी की तरह काम कर कर पाये। बाकी तो स्‍थानीय मंत्रियों के चाटुकार बन कर रहे, और लखनऊ-दरबार की जी-हुजूरी ही करते रहे। केवल इस लिए, कि उनकी पोस्टिंग यहीं पर बनी रहे।

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हर सू जौनपुर

और तो और, खुद जिलाधिकारी दीवानी कचेहरी से जमीन का झगड़ा कर बैठे, नालिश कर दी हाईकोर्ट में। आखिरकार हाईकोर्ट ने फैसला किया कि यह जमीन डीएम की नहीं, दीवानी कचेहरी की है। नतीजा यह हुआ कि इसके बाद अपना चियां जैसा मुंह लेकर डीएम साहब ने अपना नया रास्‍ता ही बना डाला। लेकिन सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि ऐसी हालत में आम आदमी की हालत क्‍या होती होगी।

अब यह तो सरकार को निपटाना होगा कि उसका समाधान किस तरह करे। लेकिन कब, इसका जवाब किसी के पास नहीं। ( क्रमश: )

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जुल्‍फी प्रशासन

बहुत सहज जिला है जौनपुर, और वहां के लोग भी। जो कुछ भी है, सामने है। बिलकुल स्‍पष्‍ट, साफ-साफ। कुछ भी पोशीदा या छिपा नहीं है। आप चुटकियों में उसे आंक सकते हैं, मसलन बटलोई पर पकते भात का एक चावल मात्र से आप उसके चुरने का अंदाजा लगा लेते हैं। सरल शख्‍स और कमीनों के बीच अनुपात खासा गहरा है। एक लाख पर बस दस-बारह लोग। जो खिलाड़ी प्रवृत्ति के लोग हैं, उन्‍हें दो-एक मुलाकात में ही पहचान सकते हैं। अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता। जो ज्‍यादा बोल रहा है, समझ लीजिए कि आपको उससे दूरी बना लेनी चाहिए। रसीले होंठ वाले लोग बहुत ऊंचे दर्जे के होते हैं यहां। बस सतर्क रहिये, और उन्‍हें गाहे-ब-गाहे उंगरियाते रहिये, बस।

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राग-जौनपुरी

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