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'सूरदास' तब बिहँसि यसोदा, लै उर-कंठ लगायौ

: प्राइवेट प्रैक्टिस का ख्‍वाहिशमंद डॉक्‍टर अपनी सेलरी का आधा 60 फीसदी तक सीएमओ की जेब में डालता है : प्राथमिक शिक्षा का जनाजा निकालने पर आमादा हैं सरकारी स्‍कूल के शिक्षक : शिक्षामित्र तो बाकायदा कलंक साबित हुए हैं शिक्षा-जगत में :

कुमार सौवीर

लखनऊ : ( पिछले अंक से आगे ) पचास हजार रूपया महीना की शुरूआत से नौकरी करने वाले शिक्षक को न लिखने की तमीज है, न पढ़ने की। बोलना तो दूर की बात है। हां, बात-बात पर आंदोलन जरूर करेंगे। कानपुर में ईएसआई अस्‍पताल के सेवानिवृत्‍त निदेशक ओमप्रकाश गुप्‍ता को सरकार और बड़े नौकरशाहों पर गालियां बकने का शौक इतना चढ़ा कि वे अपनी स्‍कूलिंग तक भूल गये। एक जगह उन्‍होंने जो लिखा है, उसमें सिर्फ गलतियां ही गलतियां हैं, वह भी भारी अपराध श्रेणी वाली। उनका लिखा तो शायद वे खुद नहीं समझ पायेंगे, लेकिन दूसरों को कुत्‍ते की पूंछ जरूर करार करते घूमते दिख जाते हैं। जरा उनका लिखे एक मामले में स्‍क्रीन-शॉट देखिये तो आपको उनकी काबिलियत का अंदाज लग जाएगा।

जौनपुर के एक विद्यालय में वहां के मौजूदा जिलाधिकारी सर्वज्ञराम मिश्र ने अपनी जो निरीक्षण आख्‍या लिखी है, उसे पढ़ कर आप अपना सिर ही धुन सकते हैं। खुद को बेहद काबिल साबित करने वाले एक शिक्षक बता रहे थे कि "सूरदास तब बिहँसि यसोदा, लै उर-कंठ लगायौ" का अर्थ है कि किसी बात पर खुश होकर सूरदास जी ने यशोदा जी को अपने गले लगा लिया।

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गुरूजी ! चरण-स्‍पर्श

सरकारी धन्‍वन्‍तरियों यानी डॉक्‍टरों का क्षेत्र तो कमाल का है। जिले का मुख्य चिकित्सा अधिकारी और जिला अस्पताल या मंडली चिकित्सालय अथवा प्रधान चिकित्साधीक्षक भी डॉक्टरों को चूसता है, आपको प्राइवेट प्रैक्टिस करनी है तो। और इसके लिए जाहिर है कि आपको अस्‍पताल से मुक्ति चाहिए, तो आधी तनख्वाह सीएमओ को थमा दीजिए और मस्त हो जाएं। एक वरिष्‍ठ सरकारी चिकित्‍सक बताते हैं कि सरकारी अस्‍पताल के बजट का 60 फीसदी हिस्‍सा केवल कमीशन में ही जाता है। लखनऊ के बलरामपुर अस्‍पताल में हाल तक निदेशक की कुर्सी पर जमे एक डॉक्‍टर के बारे में कुख्‍याति थी कि वे बिना पैसा लिये हुए मरीज पर हाथ तक नहीं लगाते थे।

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धन्‍वन्‍तरि डॉक्‍टर !

आखिर आपने ऐसा क्यों करते हैं। वह इसलिए क्‍योंकि आप को नाजायज काम करने और कराने का चस्का लगा है, क्योंकि उसमें आपको भारी रकम मिलती है जो हराम की है। आप चाहते कि सरकारी नौकरी में रहते हुए भी आप प्राइवेट प्रैक्टिस करें, आप चाहते हैं कि आप स्कूल नहीं जाएं, आप चाहते कि किसी ऐसे पद की दरकार है, जहां ऊपरी आमदनी की गुंजाइश ज्यादा हो।

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लर्नेड वकील साहब

यानी आप खुद चाहते हैं और इसके लिए घूस देने का तैयार रहते हैं बड़े अफसरों को। तो अपराधी कौन है। आपको अपने गिरेबान में झांकना चाहिए। यह पाखंड बंद कीजिए। अगर आप इतने ईमानदार हैं, तो अपने अफसर से यह साफ-साफ कहने का हौसला दिखाइये न। साफ-साफ कह दीजिए ऐसे अफसरों से कि यह मामला है भ्रष्टाचार का, और हम भ्रष्‍टाचार का समर्थन नहीं कर करेंगे। कुछ भी हो जाए, हम पैसा नहीं देंगे। चाहे कुछ भी हो जाए।

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बड़ा बाबू

लेकिन आप यह कह नहीं सकते। सच बात तो यह है कि आप सुविधा चाहते हैं, और जब सुविधा चाहते हैं तो फिर सुविधा शुल्क अदा करना ही पड़ेगा। और अगर ऐसा आप ऐसा नहीं कर सकते हैं तो फिर आपको भ्रष्‍टाचार पर एक शब्द भी बोलने का अधिकार नहीं है।

मैं नैतिकता, ईमानदारी और अधिकार की बात कर रहा हूं। जबकि आप कल्‍पना में अद्भुत भारत देखना चाहते हैं, मगर यथार्थ में देश को रसातल में ले जाने की साजिश का हिस्‍सा हैं आप।

बेईमानी और भ्रष्‍टाचार हमारे देश या समाज में नहीं, बल्कि हमारे-आपके जैसे हर देशवासी के दिल-दिमाग में धंसा-घुसा है। जहां धोखा और झगड़ों की नित-नयी कोंपलें निकलती रहती हैं, नैतिकता के नये रास्‍ते खुलते रहते हैं।

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क्‍योंकि हम-आप बेईमान हैं


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