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पर्यूषण पर्व के ही दिन पत्रकार-शिरोमणि ने कटवायी थी अपनी नाक

: छत्‍तीसगढ़ में रायपुर की जैन धर्मशाला में कड़े प्रतिबंधों के बावजूद बिखेरी गयी थीं मुर्गे की अस्थियां : जमकर हुई थी शराबखोरी, और उछाली गयी थीं नंगी गालियां : फिर क्‍या, फिर जुर्माना लगा 50 हजार का, और रेवड़ी की तरह कूटे गये थे हुजूर परवरदिगार :

कुमार सौवीर

लखनऊ : महानतम धर्मों की मूल-आत्‍मा होती है उसके उपदेश। उपदेश ही किसी भी धर्म के प्राण होते हैं। मसलन, त्‍याग की पराकाष्‍ठा तक पहुंच चुका जैन-धर्म। जैन धर्म का एक पर्व है पर्यूषण, और उसका खास निर्देश होता है:- इस धर्म का मनसा, वाचा, कर्मणा किसी भी तरह से किसी को आहत मत करो ।

लेकिन अब उनको क्‍या कहा जाए, जो ऐसी आत्‍मा, प्राण और उसके उपदेशों की खिल्‍ली उड़ाते हैं, धर्म के अनुयाइयों को अपमानित करते हैं, भले ही वे अपने ऐसे प्रयासों में असफल होकर अपनी बुरी मुंह की खाते हैं। और अन्‍तत: अपनी ही करतूतों के चलते सरेआम पिट जाते हैं। एक साल पहले ही एक महान पत्रकार महोदय ने छत्‍तीसगढ़ में रायपुर की जैन धर्मशाला में कड़े प्रतिबंधों के बावजूद मुर्गे की अस्थियां बिखेरी थीं। पत्रकारों की एक यूनियन के वार्षिकोत्‍सव का माहौल था, जिसमें जमकर हुई थी शराबखोरी, और उछाली गयी थीं नंगी गालियां। इस पर नाराज जैन समुदाय के इस धर्मशाला के प्रबंधन ने इस यूनियन पर 50 हजार रूपयों का जुर्माना लगा दिया था और सख्‍त आदेश दिया था कि आज से कभी भी इस यूनियन का कोई भी कार्यक्रम इस धर्मशाला में नहीं किया जाएगा। इतना ही नहीं, जब इस पर नशे में धुत्‍त पत्रकार ने उस पर ऐतराज किया तो फिर रेवड़ी की तरह कूटे गये थे यह पत्रकार-हुजूर।

लेकिन पत्रकारिता के क्षेत्र में इन मनसा, वाचा, कर्मणा में किसी को आहत करने की कोशिश न करना जैसे शब्‍द अब लुप्‍तप्राय हो चुके हैं। और अगर कहीं बचे भी हैं, तो केवल जुबान तक ही सीमित। वह भी तब, जब उनका स्‍वार्थगत प्रयोग करने की जरूरत पड़ रही हो। वरना, अकेले लखनऊ में ही ऐसे पत्रकारों की कमी नहीं है, जो इन शब्‍दों और भावों को जूतों से कुचलते हैं, और खुद भी जहां-तहां सरेआम कुचले जाते हैं।

वैसे पत्रकारिता और हिंसा, अनाचार और झूठ का रिश्‍ता वाकई बहुत पुराना और बेहद घिनौना भी है। चाहे वह नेपाल की तराई पर सीमान्‍त बहराइच हो, दिल्‍ली हो, जयपुर, लखनऊ, नोएडा-गाजियाबाद हो अथवा इलाहाबाद जैसा कोई पुनीत स्‍थल। पिटने, पिटाने की सम्‍भावनाएं खुद ही खोज लेते हैं यह पत्रकार, और उसके बाद उन का अभिनन्‍दन की प्रक्रिया प्रारम्‍भ हो जाती है।

अब समझ में नहीं आता है कि आज पर्यूषण पर्व पर मैं इन ऐसे महानुभावों को क्‍या और कैसा शब्‍दाभूषण से अलंकृत करूं।

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