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यह पत्रकारिता नहीं, वैचारिक-बलात्‍कार है। यानी ट्रोल

: यह एक सम्‍पादक की पीड़ा है, जो जूझ रहा है सच को संरक्षित करने की मुहिम में : आज की पत्रकारिता प्रतिपक्ष में कमियां खोजने, और सत्‍ता का गुणगान करने में तब्‍दील हो चुकी : इन हालातों को विनाशकारी बता कर ट्रोल-पत्रकारिता से बचने की सलाह दे रहे हैं अंशुमान त्रिपाठी :

अंशुमान त्रिपाठी

नई दिल्‍ली : दरसल पत्रकारिता लोकतंत्र की रक्षा के लिए होती है। लोकतंत्र समतामूलक समाज की स्थापना के लिए विचारो के आदान प्रदान और संवाद का दूसरा नाम है। सत्ता पक्ष साधन संपन्न होता है और अपने उद्येश्य और उपलब्धियो के प्रचार प्रसार के लिए धन का प्रयोग करता है और स्वार्थपूर्ति को भी मुलम्मा चढा कर पेश करता है। तब जन अभिव्यक्ति का माध्यम पत्रकारिता होती है। इसीलिए पत्रकारिता को व्यवस्था विरोधी कहा जाता है।

दरअसल, पत्रकारिता ही वह तत्‍व है, जो अव्यवस्था और सत्ता के छल को बेनकाब करती है। चूंकि संसाधनों पर नियंत्रण सरकार और सत्ता पक्ष का होता है। इसीलिए उसकी त्रुटियों, विरोधाभासों के साथ नैतिक और आर्थिक भ्रष्टाचार उजागर करना पत्रकारिता का दायित्व है।

लेकिन आज विडंबना यह है कि हम सब किसी न किसी राजनीतिक दल के चश्मे से खबरो को देखते हैं। यह दिशाहीनता के चलते नहीं, बल्कि हमारी स्‍वार्थी-प्रवृत्ति और हर-एक के हाथों बिक जाने, झुक जाने, समझौता कर लेने की इच्‍छा के चलते ही होता है। इसीलिए अब हालत यह हो चुकी है कि विपक्ष में खामियां खोजना, और सत्‍ता-सरकार में खूबियां तलाशना पत्रकारिता हो गया है।

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पत्रकार पत्रकारिता

इसका दुष्‍परिणाम यह सामने आ रहा है कि अगर कोई आपके विचारो से अलग मत रखता है तो हम ट्रोल यानि वैचारिक बलात्कार के शिकार बना दिए जाते हैं। अगर असहमति गले नही उतरती तो विपक्ष के कुकर्मो का हवाला दे कर सत्तापक्ष को सही ठहराने लगते हैं। ये प्रवत्ति अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करती है। विनाश तक की सीमा तक विद्धंसकारी।

समझ लीजिए समाज ने आपको बहुत दुरूह जिम्मेदारी दी है वो है सत्तापक्ष की कमियों, गलतियों और अपराधों के प्रति कठोर रवैय्या अपनाना। क्योंकि आप सड़क पर नही उतर सकते, ऐसे मे कलम आपका हथियार है। आप जनमत तैयार करते हैं। पत्रकार यथार्थ का क्रूर निर्मम पक्ष को देखने की ताकत रखता है। इसीलिए उसे दुनिया रंगीन नजर नही आती। सत्ता पर दबाव बना कर उसे दुनिया को सतरंगी बनाना है।

ये सिर्फ ऊमा भारती की पोस्ट का मसला नही है। उनके भावात्मक आवेग को हम लोग बरसो से देखते आए हैं लेकिन उनका एक मूल्यांकन सारगर्भी है। मित्र हमे अपनी बात रखने का पूरा अधिकार है। अतः आपसे सादर निवेदन है कि पत्रकारिता और प्रचार के बीच की लक्ष्भण रेखा की पवित्रता को समझेंगे साथ ही हमारी भावनाओं को भविष्य मे भी अपने हृदय मे स्थान देंगे। सादर। आपका अंशुमान

यह पत्र वरिष्‍ठ प‍त्रकार अंशुमान त्रिपाठी ने लिखा है, अपने मित्र नवीन को। आज की पत्रकारिता का ऐसा पोस्‍टमार्टम आपने शायद ही देखा, सुना या पढ़ा होगा। आज के दलाल-प्रवृत्ति कामी पत्रकारों के लिए किसी जोरदार करारा थप्‍पड़ सरीखा ही है अंशुमान त्रिपाठी का यह पत्र। भोपाल निवासी अंशुमान अब दिल्‍ली में बस चुके हैं। कई अखबारों और न्‍यूज चैनलों में वरिष्‍ठ पदों पर रह चुके अंशुान त्रिपाठी महुआ न्‍यूज चैनल के सम्‍पादक भी रह चुके हैं।

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