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सिंहासन खाली करो, कि सीबीआई आती है

: उप्र लोक सेवा आयोग की सीबीआई जांच के एलान के बाद से लोक सेवा आयोग मुख्‍यालय में अफरा-तफरी : सन-12 से 16 के बीच चयनित विभिन्न विभागों के अफसरों में मचा हड़कम्‍प : पिछ़ली सरकार द्वारा नियुक्त आयोग के अध्यक्ष व तमाम सदस्य नौतिक आधार पे इस्तीफा दें? :

मेरी बिटिया डॉट कॉम संवाददाता

लखनऊ : पिछ़ले पांच सालों से प्रतियोगी छात्रों द्वारा किये जा रहे संघर्ष को आखिर मुकाम मिल ही गया। कल शाम मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विधान सभा में एलान कर दिया की बीत पांच वर्षों में उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा की गई तमाम भर्तीयों की सीबीआई जांच होगी। इस घोषणा से लखनऊ से लेकर इलाहाबाद तक के प्रतियोगी छात्रों में खुशी की लहर डूब गई। वहीं दूसरी ओर 2012 से 2017 के बीत चयनित अफसरों के माथों पर शिकन पड़ गई है। उन्हे डर है की कहीं व्यापम की तरह उनकी भी नौकरी खतरे में ना पड़ जाये। इसी के साथ ये भी सवाल उठ रहे हैं की जब जांच का एलान हो ही गया है तो एसे में फिर जांच को प्रभावित होने से बचाने के लिये वर्तमान अध्यक्ष व समस्त सदस्यों से इस्तीफा क्यूं नही लिया जाना चाहिये? बीते पांच वर्षों में जो लोग आयोग के सदस्य बनाये गये वे सभी सैफई घराने के करीबी बताये जाते हैं।

छात्रों ने ये आरोप यूं ही नही लगाये हैं बल्कि इसके पीछे मज़बत तथ्य भी हैं। 2013 में सपा सरकार ने आयोग के अध्यक्ष के तौर पर अनिल कुमार यादव की नियुक्ति की जो की मैनपुरी के एक इंटर कौलेज के प्राचार्य थे। इतना ही नहीं, अनिल यादव पर 307 का मुकदमा भी लंबित था एवं वो आगरा जिलाधिकारी द्वारा तड़ीपार भी घोषित किये जा चुके थे। एसे में ये एक गंभीर विषय है की जिस आयोग के अध्यक्ष के रूप में बड़े-बड़े विद्वान कुलपति,प्रौफेसर,वरिष्ठ अफसर पूर्व में नियुक्त किये गये हों उस पद पर एक छोटे से इंटर कौलेज के मास्टर को नियुक्त करने का क्या औचित्य था? और वो भी जब उसके ऊपर संगीन आरोप हों और वो एक जिले के कलेक्टर द्वारा जिला बदर किया जा चुका हो। अनिल यादव ने अपनी नियुक्ति होने के तत्काल बाद से ही अपना खेल दिखाना शुरू कर दिया।

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यूपी लोकसेवा आयोग

पीसीएस 2012 परीक्षा में पहली बार आरोप लगा की लगभग 55 अफसर एक विशेश जाति के चयनित किये गये हैं। इतना ही नहीं, अनिल यादव के ऊपर आरक्षण के नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए सामान्य सीटों पर भी एक जाति विशेश के लोगों के चयन का आरोप लगा। कौपियों को बदलने के साथ-साथ पीसीएस मेंस परीक्षा की लिखित आंसरशीट जलाने के भी आरोप लगे। पूरे प्रदेश में छात्र सड़क पर उतर आये पर सरकार टस से मस नही हुई। उल्टा पुलिस ने तमाम प्रदर्शनकारी छात्रों पर रासूका जैसी गंभीर धाराओं में मुकदमे भी ठोंक दिये। कहा जाता है की अनिल यादव को सपा के बड़े नेताओं का आशीर्वाद प्राप्त था जिस कारण उनके खिलाफ कोई कार्यवाही नही की गई। आखिरकर बच्चों ने इस मामले में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और अक्टूबर 2015 में एक एतेहासिक फैसले में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीष डीवाई चंद्रचूड़ नें अनिल यादव की नियुक्ति को अवैध ठहरा दिया और उनको पद से बर्खास्त कर दिया। इसके बाद भी सरकार ने कोई भूल-सुधार नही की और फिर से एक दूसरे इंटर कौलेज के प्राचार्य अनिरुद्ध यादव को अध्यक्ष बना दिया। इन पर भी तमाम आरोप छात्रों नें लगायें हैं।

आयोग को बना दिया करीबियों को उपक्रित करने का ठिकाना:- जिस आयोग में कभी मेरिट के अनुसार नियु्क्तियां की जाती थी,उस आयोग को करीबी लोगों को पुरुस्क्रत करने का अड्डा त्तकालीन सरकार ने बना दिया। अनिल यादव की नियुक्ति जब की गई तब सरकार के पास लगभग 82 अन्य लोगों के भी आवेदन आये थे अध्यक्ष पद के लिये जिनमें कई रिटायर्ड कुलपति,प्रोफेसर,आइएएस अफसर,जज,मुख्य अभियंता आदि शामिल थे पर सरकार को केवल इंटर कौलेज के अपराधी प्राचार्य ही सबसे उपयुक्त लगे लोक सेवा आयोगा के अध्यक्ष पद हेतू। यही नहीं, तमाम सदस्य भी एसे नियुक्त किये गये जो सपा सरकार के करीबी माने जाते हैं। यहां तक की इतने विवाद के बाद भी सपा सरकार ने जाते-जाते अक्टूबर 2016 में अपने तीन करीबी अफसरों को भी रिटायरमेंट के पश्चात आयोग का सदस्य बना दिया जिसमें एक आइजी स्तर के आइपीएस अफसर,पीडब्लूडी के एक पूर्व मुख्य अभियंता भी शामिल हैं। एसे में सवाल है की क्या इन सभी सदस्यों को नैतिक आधार पर जांच जारी रहने तक अपने पद से इस्तीफा नही दे देना चाहिये?

अब ये सवाल हम आप पर छोड़ते हैं।

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