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पत्रकारिता में धंसी जहरीली कीलें, चलो दलालों को ललकारा जाए

: वह वक्‍त गया, जब पत्रकार को सम्‍मान मिला करता था : अब जुबान तेज, और धंधेबाजी के पैंतरे मंजे होते हैं : लेखनी के सिपाहियों वाली बिरादरी में जहरबुझे नश्‍तरों की तादात बेहिसाब बढ़ चुकी : आइये उन्‍हें पहचानिये, और उन्‍हें समूल उखाड़ने का अभियान छेड़ें :

कुमार सौवीर

लखनऊ : बनारस के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं योगेश गुप्‍ता। खास तौर पर खेल पत्रकारिता में अपने बड़े-बड़े झण्‍डे गाड़ चुके हैं योगेश। काशी पत्रकार संघ के अध्‍यक्ष भी रह चुके हैं। हाल ही उन्‍होंने हैदराबाद से नये-नवेले न्‍यूज पोर्टल नमस्‍ते डॉट इन को ज्‍वाइन किया है।

योगेश से आज फोन पर बातचीत हुई। सिलसिला आगे बढ़ा तो पत्रकारिता और पत्रकारों पर चर्चा शुरू हो गयी। योगेश बोले:- पत्रकारिता अब है कहां। मालिक तो अब कांचू-बनिया हो गया जो हर ओर से अपने पत्रकारों को चूस डालना चाहता है। हर कीमत में। उसे केवल पैसा ही चाहिए। पैसा के अलावा कुछ भी नहीं। उधर सम्‍पादक की कुर्सी अब ठेकेदार-नुमा पत्रकारों के हाथों के कब्‍जे में आ गयी है। अब वे समाज, देश, पत्रकार या पत्रकारिता के हितों को लेकर नहीं, बल्कि अपने मालिक के हितों तक ही सिमट चुके हैं। खबरें तो कागज भरने का माध्‍यम और दिखाने भर का हो चुका है। वह भी मजबूरी में ही, क्‍योंकि दलाली के लिए भी कुछ न कुछ होना ही चाहिए न, इसलिए। पत्रकार तो इन मालिक-सम्‍पादक के दो पाटों में पिस चुका है।

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पत्रकार पत्रकारिता

और फिर योगेश ही क्‍यों, अपने पूरे पत्रकारीय जीवन का अधिकांश हिस्‍सा इस पेशे में खपा चुके लोगों की भी ठीक वही राय है, जो योगेश की है। लेकिन जो पत्रकार ऐसा नहीं पिस पाये, वही आज सफल हैं। क्‍योंकि उन्‍होंने इन दोनों पाटों के बीच में बने-छूटे खांचों में अपने लिए गुंजाइशें निकाल लीं। केवल चापलूसी, दीगर धंधा, उगाही, भयादोहन, ब्‍लैकमेलिंग वगैरह-वगैरह।

पहले पत्रकार की कलम तेज हुआ करती थी, भाषा मंजी हुआ करती थी।

लेकिन अब जुबान तेज हुआ करती है, और धंधेबाजी के पैंतरे मंजे होते हैं।

सच बात तो यही है कि पत्रकार का अर्थ ही अब दफ्न हो चुका है, और उस कब्रिस्‍तान से एक ऐसी नस्‍ल पैदा होती जा रही है, जिसे आज का पत्रकार कहा जाता है। यह हालत सबसे ज्‍यादा बुरी कर दी है इलेक्‍टॉनिक चैनलों ने। अभी 8-10 साल पहले तक चैनलों और समाचार-संस्‍थानों में यह हालत नहीं थी। लेकिन अचानक किसी भयावह बाढ़ की तरह यह सड़ांध मारती कींचड़ जैसी गंदगी जहां-तहां पसर चुकी है। इलेक्‍ट्रानिक चैनलों के नाम पर तो जो भयावह बाढ़ आयी है, वह तो पूरा समाज ही दहल गया। इधर-उधर दो-कौड़ी के कैमरे, सच्‍चे-झूठे आईडी का अम्‍बार बिछने लगा है। कैमरा न सही, मोबाइली पत्रकार भी पैदा हो गये हैं। जिले का स्ट्रिंगर को अपना ओहदा बढ़ाने का शौक इतना हुआ कि वह अपने आप को ब्‍यूरो-चीफ लिखने-कहलाता घूमता है। ऐसे ब्‍यूरो चीफों ने हर बाजार, गांव में अपना स्ट्रिंगर्स की फौज खड़ी कर दी है, जो अब किसी शिकारी बाज की तरह कबूतरों का शिकार करने निकल पड़ते हैं। वहां का हिस्‍सा जिला के स्ट्रिंगर को मिलता है, और वहां से कमाई का हिस्‍सा लखनऊ से दिल्‍ली-नोएडा तक पहुंच जाता है।

कई चैनलों ने तो सीधी गंगा बहा दी है। मालिकों-सम्‍पादकों ने स्‍टेट ब्‍यूरो चीफ, मंडल प्रभारी और जिला स्ट्रिंगर्स से उगाही के लिए एक मासिक किश्‍त बांध दी है। साफ बात यह कि तुम हमें हर महीने इतनी रकम हमें नियमित रूप से दो, और उसके बाद तुम कितना कमाओगे, हमसे कोई दिक्‍कत नहीं। यही लोग कोटे की दूकान, सरकारी दफ्तर, बिजली और सप्‍लाई, बिजली आदि किसी भी संस्‍थान में जबराना वसूलते हैं। प्रधान और स्‍कूलों तक में उनके पंजे दर्ज हो चुके हैं।

यही लोग तो कलंक हैं।

अब जरूरत इस बात की है कि हम पत्रकारिता में धंस चुके दलाल, घटिया, ब्‍लैकमेलर और ठेकेदारों को सरेआम नंगा करें। सिर्फ देखिये ही नहीं, कि वे कितने नंगे, छिछोरे, लुटेरे हैं। बल्कि उन्‍हें बेपर्दा करने का अभियान भी छेड़ने में मदद कीजिए। पिछले कुछ महीनों में हमने ऐसे कई पत्रकारों को सरेआम नंगा किया है, आप भी अपनी सहभागिता निभाइये। पत्रकारिता के ऐसे काले कलंकों को बेपर्दा कीजिए। हमें लिख भेजिए ऐसे कुल-कलंकित पत्रकारों की असलियत। खोजिए, पता कीजिए कि वे क्‍या-क्‍या करते हैं, कैसे करते हैं और असलियत में उनकी हैसियत क्‍या है। सच तो यही है कि पहले तो हम इस तरह की खबरें छिटपुट ही छाप पाते थे, लेकिन अब उसे एक नियमित स्‍तम्‍भ की तरह पेश करना चाहते हैं। उम्‍मीद है कि आप जैसे सजग पाठक इस बारे में हमारी मदद करेंगे।

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पत्रकारिता का गंदा-पन्‍ना


Comments (1)Add Comment
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written by uttam kumar shukla , June 25, 2017
कटु सत्य

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