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अपने ही नहीं, बेहालों के लिए भी खूब भिखमंगई करते हैं कुमार सौवीर

: भोपाल से लौटती नेपाली महिला को ट्रेन में लूट लिया था लुटेरों ने : कैंसर पीडि़त अपने बच्‍चे की दवा लेकर मुम्‍बई से लौट रही थी पोखरा स्थित गांव में : जनार्दन यादव को ललकारा और देखते ही खासी रकम जुट लिया कुमार सौवीर ने :

कुमार सौवीर

भोपाल से लखनऊ की ओर: बड़ा दिलचस्‍प किस्‍सा है यह। आइये, पहल तो कीजिये।

सुन लीजिये यह रसीला किस्सा शुरू से सुन लीजिये, जिसकी शुरुआत तो दुःखदायी हादसे से था लेकिन सभी यात्रियों ने उसे सुखान्त बना दिया।

जरूरत पड़ी सिर्फ एक पहल-कदमी की, जो मैने कर डाला।

भोपाल से मेरी ट्रेन कुशीनगर 3 बजे छूटी। मैंने बहुत कहा, लेकिन मल्‍हार मीडिया वाली ममता यादव ने किसी भी कीमत पर मुझे भोजन तक दूर, नाश्‍ता तक मुहैया नहीं कराया। रिजर्वेशन तो था नहीं, लेकिन मैं और बलियाटिक डेल्ली वाले जनार्दन यादव ने सामान्य टिकट लिया और हम सब स्लीपर डिब्बे में घुस गए।

भले ही सीमा सुरक्षा बल के अधिकारी रह चुके हैं जनार्दन यादव, लेकिन हैं तो चिक्कन-चुप्पण। लेकिन मेरी सफ़ेद उगती दाढ़ी का सम्मान देते हुए सहयात्रियों ने सरकते हुए हमें बैठने की जगह दे दी। बीना स्टेशन पर एक महिला का विलाप पूरे डिब्बे को कंपा गया।

पता चला कि नेपाल की यह महिला अपने 7 साल के बच्चे का इलाज कराने बम्बई आई थी। बच्चे को कोई गंभीर बीमारी है। पति बम्बई में ही है। इलाज के बाद वह तत्काल टिकट लेकर अपने बच्चे समेत डिब्बे पर सीट पर आई। अचानक भोपाल के बाद विदिशा या बीना में कोई उचक्का वह बैग लेकर भाग गया जिसमे उसका सारा रूपया-पैसा और बच्चे की दवाई आदि रखा था।

कुछ देर तक तो डब्बे में भगादौड़ी शुरू हुई। लेकिन कोई नतीजा नहीं निकाला। महिला के आंसू अभी भी हिचकियों से लिपटे थे। आखिर वह क्या करती। उसके पास अब चाय पीने तक का पैसा नहीं था, और सफ़र कम से कम 14 घंटे का था। उसके बाद गोरखपुर से सुनौली और फिर नेपाल उसका गाँव।

मैंने फैसला किया। पूरा भरा डिब्बा बेबस था, इसी बीच मैंने अपनी जेब से कुछ नोट निकाले जनार्दन को तेज़ आवाज़ में कहा:- चलो भइया यादव जी, कुछ पुन्न कमा लो। निकालो कुछ रूपया। इस बहन की मदद करनी है। उसकी मदद करो और अपना जन्म सफल करो।

जनार्दन शायद इसी क्षण की प्रतीक्षा कर रहे थे। अपने बालसुलभ ठहाके के साथ जनार्दन ने अपने कोट में की जेब में हाथ डाल कर कुछ रकम निकाली। और उसके बाद मैने आसपास बैठे यात्रियों से पैसा मांगना शुरू कर दिया। ज्यादातर ने मेरे हाथ पर कुछ न कुछ रखा जरूर। किसी ने अचकचा कर तो किसी ने मुक्तहस्त।

अरे कुछ ही देर में अच्छी-खासी रकम जुट गयी।

मैने सारी रकम महिला की ओर बढ़ाई तो वो फिर फूटफूट कर रोने लगी। मैने उसे समझाया कि," तुम इस डिब्बे की बहन हो और यह हम सब यात्रियों का फ़र्ज़ है। इसलिए उसे क़ुबूल करो।"

दोस्तों! इसीलिए मैं हमेशा से यह कहता रहा हूँ कि जिंदगी में पहलकदमी बहुत जरूरी होती हैं।

( मेरी सार्वजनिक भिखमंगई का यह नजारा जनार्दन ने चुपके से कैद कर लिया। इस फोटो को देख कर आपको यकीन हो जायेगा कि भीख माँगते हुए भी कुमार सौवीर खासे स्मार्ट दीखते हैं।)

Comments (2)Add Comment
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written by राजेश , January 19, 2017
बढ़िया कुमार साहब
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written by Kumar Vaibhav, January 19, 2017
अदभुत .... ऐसे नेक काम की उम्मीद हम सौवीर साहब से ही कर सकते हैं .

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