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लाजवाब डॉयलॉग है अन्‍नू कपूर का, "यह पूरी दुनिया ही स्‍पर्म है"

: रज और वीर्य को बराबर के तराजू पर रखिये, कोई भी कमतर नहीं है : जब हम स्‍त्री और पुरूष को बराबर मानते हैं तो फिर रज व वीर्य पर क्‍यों नहीं : शलभ-श्री और दामिनी यादव ने भी मासिक-धर्म, और वीर्य की तुलना में गबड़चौथ के खिलाफ आवाज उठायी है : सिनेट्री-नेपकिन और मासिक-धर्म से जुड़ी खुली बहसों से ही हो सकता है बराबरी का दर्जा : कोशिश दो

कुमार सौवीर

नई दिल्‍ली : इसी बीच उसे मिलता है कि एक मस्‍त-मौला और कलंदर-खिलंदड़ युवक। नाम है विक्‍की। पंजाबी मुण्‍डा, जिसके साथ है उसकी ब्‍यूटी-पार्लर चलाती और आत्‍मनिर्भर मां और दादी। बस्‍स्‍स्‍स। विक्‍की अपनी मां के साथ उसके व्‍यवसाय में हल्‍का-फुल्‍का सहायता भी करता है। इसी बीच डॉ चड्ढा को मिलता है विक्‍की। इसके बाद फिर तो मालामाल। कहानी आगे बढ़ती है विक्‍की की शादी, जिससे चड्ढा का धंधा बिलकुल तबाह हो जाता है। कहानी फिर बढ़ती है दाम्‍पत्‍य सम्‍बन्‍ध के टूटन से भी आगे। यानी चड्ढा का तीन-तिहरापन अब चौथे दायित्‍व तक पहुंच जाता है। जिसे बेहद खूबसूरती से सम्‍भालता है डॉ चड्ढा। विक्‍की की अलग हुई बीवी वापस पहुंचा देता है चड्ढा। कहानी का अन्तिम डायलॉग है:- यह पूरी दुनिया ही स्‍पर्म है।

अब जरा देखिये, शलभ-श्री की कविता, जिसका शीर्षक है:- सिनेट्री नेपकिन। दिल्‍ली के जेएनयू में एमए की छात्रा शलभ-श्री ने अपनी इस कविता में वीर्य के मुकाबले रज को कमतर मानने की हमारी सामाजिक सोच के खिलाफ चिन्‍ता जतायी है। दिल्‍ली के रहने वाले मेरे मित्र  खबर है कि हालांकि हमारे अनुज जनार्दन यादव ने हस्‍तक्षेप करते बताया है कि यह कविता मूलत: दामिनी यादव की है, जो कवियत्री हैं। वे शायद दिल्‍ली की रहने वाली लेखिका हैं। हालांकि दामिनी यादव की कविता मासिक-धर्म की खुली बहस को आमन्त्रित करती है।

जो भी हो, है यह कविता बेहद संवेदनशील-हृदय की उपज है, जिसे कवि ने अब तक नीच ही नहीं, निकृ‍ष्‍ट तत्‍व माने गये मानवीय पदार्थ और भावनाओं को एक नयी दिशा दी है। उसे नये तरीके से सजाया, परिभाषित किया और उसमें नये महान सितारे टांक दिये हैं। इस कविता में मासिक-धर्म से सने किसी सिनेट्री-नेपकिन के प्रति आम आदमी की सोच, जिसमें उबकाई,  घृणा, त्‍याज्‍य भाव और अस्‍पृश्‍य का भाव भरा हुआ होता है। जाहिर है कि उस नेपकिन में खून से लिथड़ी घृणा के केंद्र में सारा आरोप, घृणा, निन्‍दा का भाव केवल रज पर ही उगला जाता है, और जिसके विपरीत वीर्य की महानता का वीर-गान और दुदुम्भि के स्‍वर होते हैं।

इसीलिए मैं स्‍त्री के रज को वाकई महान मानता हूं। लेकिन इतना जरूर कहूंगा कि विक्‍की-डोनर फिल्‍म का वीर्य-कथानक है लाजवाब। (क्रमश:)

यह लेख तीन अंकों में है। इसका अगला अंक पढ़ने के लिए कृपया निम्‍न लिंक पर क्लिक कीजिए:-

रज वाकई महान है, लेकिन विक्‍की-डोनर फिल्‍म का वीर्य-कथानक लाजवाब

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