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अब घूंघट नहीं, विकास की साक्षी हैं देवास की बालाएं

बदल गया घूंघट वाला देवास

चीन की देखादेखी हमने भी हटा दिये बाथरूम से आइने

पुरूषों के साथ बराबरी से कदमताल कर रही है लडकियां

पहले जवानी की दहलीज से पहले ही घूंघट में छिप जाती थीं बहारें महिलाओं के सम्बहन्धह में अगर आप देवास में पहले जैसा माहौल देखना चाहते हों तो शायद आपको निराश ही होना पडेगा। वहां अब लम्बेी घूंघट वाली महिलाएं नहीं दिखायी पडती हैं। हां, पहले जरूर होता था कि किसी भी लडकी के जवानी की दहलीज पर पैर रखने के पहले ही घूघट की चाहरदीवारी में कैद कर दिया जाता था। लेकिन अब देवास पहले जैसा नहीं रहा। यहां पर अपने में ही सिमटी’सिकुडी लडकियां नहीं, बल्कि समय के साथ कदमताल करती लडकियां पुरूषों से बराबर का कदमताल करती दिख जाती हैं। तो आइये, हम आपको ले चलते हैं इस नये और आकर्षक देवास में। देवास में लड़कियां जन्म से लाड़ली लक्ष्मी नहीं थीं। जिंदगी के कठिन सफर में इन्हें राह दिखाने वाला कोई नहीं था। चेहरे पर लंबा घूंघट,पिछड़ापन और चहारदीवारी में कैद होकर रह जाना ही शायद इनका नसीब था, लेकिन इन्होंने साहस दिखाया। तमाम दुश्वारियों को नकारते हुए अपने नसीब को चुनौती दी। आज हालात बदले हुए हैं। ये जमाने के साथ कदमताल कर बराबर का सम्मान पा रही हैं।

आत्मविश्वास से लबरेज इन बिंदास बालाओं को देखकर शायद ही किसी को अंदाजा हो सके कि ये किस गर्त से निकलकर आई हैं। देवास की टाटा इंटरनेशनल लिमिटेड के लेदर एक्सपोर्ट फुटवेयर मेकिंग डिविजन में काम करने वाली ये 47 लड़कियां कुछ समय पहले ही चीन से तीन महीने का प्रशिक्षण लेकर लौटी हैं। इनमें से ज्यादातर समाज के कमजोर तबके अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ा वर्ग से आती हैं, लेकिन अब पिछड़ापन तो कहीं पीछे छूट-सा गया है। चेहरे पर आत्मविश्वास और शरारत लिए जब पूनम पटेल चीनी भाषा में पूछती हैं ‘नी हाऊ’ यानी आप कैसे हैं? तो सामने वाला चौंक जाता है। इनमें से कुछ विवाहित लड़कियां जब यहां आईं थीं तो आधे फुट का घूंघट उनके चेहरे पर था। लेकिन अब कंपनी के ड्रेस कोड जींस-टी शर्ट के साथ चेहरे पर उन्मुक्त मुस्कान ने उनकी पहचान बदल दी है।

हौसले को मिली राह- वरिष्ठ आईएएस अधिकारी और आयुक्त आदिवासी विकास अरुण कोचर कहते हैं कि इन लड़कियों के पास हौसला तो था, लेकिन राह नहीं मिल पा रही थी। मप्र रोजगार एवं प्रशिक्षण परिषद मैपसेट भोपाल से प्रशिक्षण लेकर इन्होंने इतिहास बना दिया।

रोज एक लड़की बेहोश हो जाती थी- टाटा इंटरनेशनल के कार्यकारी निदेशक ओके कौल बताते हैं कि जब प्रशिक्षण शुरू हुआ,तो रोज इक्का-दुक्का लड़कियां बेहोश होकर गिर पड़ती थीं। इसकी वजह घर में उन्हें पर्याप्त पौष्टिक भोजन न मिलना था, लेकिन अब कहानी बदल चुकी है। हर महीने पांच से दस हजार रुपए तक कमाने वाली इन लड़कियों को घर में न सिर्फ अर्निग मेम्बर का दर्जा हासिल है, बल्कि उसका बेहतर असर उनकी सेहत पर भी दिखाई देता है। योजना पूरे प्रदेश के लिए है। प्रसन्नता की बात यह है कि इसके नतीजे बेहद उत्साहजनक हैं। केंद्र सरकार के संस्थान आईडीईएमआई और एमएसएमई के जरिए हम प्रदेश के इस वर्ग के लड़के लड़कियों को प्रशिक्षण दे रहे हैं। इंदौर में इसकी शुरुआत 25 नवंबर से होने जा रही है।

मध्‍यप्रदेश के आदिम जाति एवं अनुसूचित जाति कल्याण विभाग के मंत्री विजय शाह बताते हैं कि बदल गए जिंदगी के मायने लड़कियों की जिंदगी अब उत्साह से लबालब है। टाटा कंपनी में 396 दलित और आदिवासी समुदाय की 41 लड़कियां प्रशिक्षण लेकर नौकरी कर रही हैं। मेपकास्ट के महानिदेशक प्रदीप खंडेलवाल कहते हैं कि कंपनी में और भी रोजगार की गुंजाइश है। प्रदेश के किसी भी हिस्से से इच्छुक दलित और आदिवासी वर्ग की पांचवीं तक शिक्षित लड़की प्रशिक्षण लेकर कंपनी में रोजगार पा सकती है।

आदिवासी सीमा परते बड़े उत्साह से कहती हैं कि ‘सर चीन में हमने देखा कि वहां टॉयलेट में शीशा नहीं लगा था। जब हमने वजह पूछी तो चाइनीज लड़कियों ने कहा कि शीशा लगा हो तो मेकअप वगैरह की तरफ ध्यान जाता है और वक्त बरबाद होता है। वहां से लौटने पर हमने यहां भी टॉयलेट से शीशे हटवा दिए।’ इन लड़कियों ने दुनिया भर में शू निर्माण की दिग्गज कंपनी जॉर्ज शू डागवान से प्रशिक्षण लिया।

Comments (1)Add Comment
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written by Sumit Saraswat, January 11, 2011
ghunghat ko bhartiya sanskriti ka prayay mana jata hai, mgar ab jamana badal rha hai. mahilao ko samaj aur des k vikas mei bhagidar banne ke liye ghunghat se bahar niklna hoga. devas ki betiyo ne bhi yadi vikas ke liye ghunghat ka tyag kiya hai to ye jaruri hai.

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