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आप शिक्षक हैं। आपको पता ही नहीं कि आपके छात्र ने जहर खा लिया?

: अवसाद को पहचानना भी तो है शिक्षक का दयित्व : विद्यालय में शिक्षक ही होते हैं बच्चे के माता-पिता : शिक्षण को भार नहीं, जरूरत है शिक्षकत्व को जीना : अभिभावक और शिक्षकों का समवेत जिम्मा है बच्चा : कमाल है केन्द्रीय विद्यालय- एक :

कुमार सौवीर

लखनऊ : तब मैं वाराणसी के दैनिक हिन्दुस्तान एडीशन में था। छुटकी बेटी साशा ने एक दिन अल्टीमेटम दे रखा था कि पापा, इस बार पैरेंट्स-टीचर्स मीटिंग में आपको ही जाना पड़ेगा। मैंने फौरन छुट्टी की अर्जी लगायी और एक दिन पहले ही लखनऊ पहुंच गया। सुबह मोटरसायकिल पर साशा को बिठाया और फिर धक-धक केन्द्रीय विद्यालय की आईएएम शाखा की ओर। रात को हुई बाकी-बची बातें रास्ते में निपटाना शुरू कर दिया। क्या चल रहा है, कोई नया, कोई दिक्कत, टीचर्स कैसी हैं, सभी का व्यवहार कैसा है, पढ़ने में कोई समस्या, गहरी दोस्ती किन-किन से है, वे क्या करते हैं, पढ़ाई में कैसे हैं वगैरह-वगैरह। बातचीत में साशा ने बताया कि उसकी एक दोस्त है, जो कई दिनों से स्कूल नहीं जा रही है। वजह, उसने एक दिन जहर खा लिया था। टीचर्स को पता है इस हादसे का? साशा ने जवाब दिया कि नहीं।

मैं सन्न रह गया।

मीटिंग में मैं भी बोला। मैंने कहा कि हमारे घर में मैं ही हमारे बच्चों के माता-पिता होते हैं, जबकि विद्यालय में उन्हीं बच्चों के माता-पिता का दायित्व आप शिक्षकों का होता है। है कि नहीं? सभी शिक्षकों और अभिभावकों ने प्रसन्नता से हां कह दिया। इसके तत्काल बाद मैंने सीधे-सीधे पूछ लिया:- "क्या आपको पता है कि आपकी एक छात्रा ने कई दिनों पहले जहर खा लिया था और कई दिनों से वह विद्यालय नहीं जा रही है? "

पूरा मीटिंग हॉल खामोश रह गया। सन्नाटा फैल गया। सब एक दूसरे का मुंह देखने लगे। प्रिंसिपल भी असमंजस में। मैंने बोलना जारी रखा:- "हम अपने बच्चों को विद्यालय में इसलिए भेजते हैं क्योंकि वहां औपचारिक और व्यावहारिक शिक्षा-प्रशिक्षण की विधिवत व्यवस्था  होती हे। एक अनुशासन होता है वहां, जहां हमारा बच्चा वह सब कुछ सीखता और सीखना चाहता है जो भविष्य में उसके लिए कारगर हो सके। वहां आप अच्छे और बुरे के बीच फर्क समझाने को कोशिश करते हैं, जो घर में शायद समयाभाव में मुमकिन नहीं हो पाता। दरअसल, एक विद्यालय केवल बच्चों का शिक्षण केंद्र ही नहीं होता है, बल्कि विभिन्न परिवारों की संस्कृतियों का संगम होता है। बाकायदा एक विशाल महाकुम्भ होता है। उसे  व्य्वस्थित और प्रबंधन करने में आपको महारत है, कौशल है जो स्तुत्य है। हम सभी आभारी हैं आपके ऐसे महान दायित्वों के प्रति। लेकिन इसी बीच ऐसे में शायद किन्हीं कारणों से व्यवस्थाएं छिन्न-भिन्न  होने लगती हैं। वह है संतुलन और परस्पर संवाद की कमी। उसी का प्रमाण है उस बच्ची का जहर खाने की खबर आप तक नहीं हो पाना।

माना कि आप बहुत व्यस्त रहती हैं। लेकिन आपकी व्यस्तता किस काम की, जो आपको आपके बच्चों से काट दे। आपको यह तक पता नहीं चल सके कि आपकी एक छात्रा ने जहर खा लिया और वह हादसा हुए एक पखवाड़ा से ज्यादा बीत गया। किसी भी व्यवस्था में सूचनाओं का संग्रहण और उनका विश्लेषण सर्वाधिक महत्वपूर्ण होता है। हम मानते हैं कि किसी भी छात्र के घर के मसलों पर आपका कोई लेना-देना नहीं होता है, और यह भी आपका दायित्व केवल छात्र तक ही सीमित है। लेकिन इस पर भी आपकी यह जिम्‍मेदारी बनती है कि आप यह समझें कि आपका छात्र किन तनावों में है। बच्चा केवल एक प्रोडक्ट ही नहीं होता है, वह एक जीता-जागता इंसान होता है, जिसे आप तराशते हैं। जैसा भी चाहते हैं आप, वैसा बनाते हैं। आपसे अपेक्षा होती है कि आप अपने ऐसे दायित्व में किसी कुशल कुम्हार की तरह खुद को प्रमाणित करें।

मैं यह भी मानता हूं कि सारे छात्रों तक आप सीधे नहीं सूचना हासिल कर सकते हैं। लेकिन इसीलिए तो आपको अपनी क्लास  में मॉनीटर और कैप्टन जैसे गम्भीर छात्रों की जरूरत पड़ती है। यही तो माध्यम होता है, जिनसे छन-छन कर सूचनाएं आप तक पहुंचती रहती हैं। फिर यह कैसे हो गया कि आपकी क्लास की एक बच्ची महीनों से तनाव में रही और आखिरकार उसने जहर खा लिया। वह तो गनीमत रही कि वह बच्ची जिन्दा है, लेकिन मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि यह हादसा आपकी पराजय का जीवन्त प्रमाण है।

इसके बाद कुछ देर तक सन्नाटा ही पसरा रहा। आखिरकार प्रिंसिपल उठीं। थोड़ा खंखारा। फिर बोलीं:- तर्क-वितर्क और बहस-मुबाहिसे फिर होते रहेंगे, लेकिन आज सिर्फ इतना ही कहूंगी कि यह हादसा हमारी असफलताओं का एक हिस्सा है। कोशिश करूंगी कि भविष्य में ऐसा न हो सके। यह एकजुट प्रयास होगा, जिसमें मुझे, शिक्षकों और आप सभी अभिभावकों की अधिक संवेदनशीलता और सक्रियता की जरूरत पड़ेगी।

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