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मैरी वर्जिन का सम्मान, जबकि कुन्ती कैसे उपहास का पात्र बन गयी ?

बहुत फर्क है, हमारी और दीगर मांओं की सामाजिक हालत में

क्रिसमस के बाद: ताकि कबीर और कर्ण भी ईसा मसीह बन सके

कुमार सौवीर

क्रिसमस तो खत्म हो गया, लेकिन क्या आपको नहीं लगता है कि महिला-संदर्भ में एक नये विचार-विमर्श और अभियान की सख्त जरूरत है। मैं समझता हूं कि अब हम देखें कि हम किस जमीन पर खड़े हैं, महिलाओं के बारे में। देखें और जांचें कि कितना फर्क है, हमारी और दीगर मांओं की सामाजिक परिस्थितियों के बीच। हमारी मांओं में कुन्ती को किसी सूरज नामक व्यक्ति से नाजायज रिश्ते के फलस्वरूप जन्मे अपने शिशु को नदी में बहाना पड़ता है, और उसकी बरामदी तथा अपने कौमार्य को अखण्ड करार देने के लिए उस शिशु को कुन्ती के कान से पैदा होने का क्षेपक सुनाया जाता है। बावजूद यह शिशु आगे बढ़कर इस पौराणिक कथा में महान सेनानी और दानवीर बन जाता है। हां, ठीक है कि उसका विरोध पाण्डवों से है, लेकिन उसकी जायज वजहें भी तो हैं। वह अपना प्राण तो देता है, लेकिन अपनी जुबान नहीं।

आप अगर किसी बेबस महिला की दारूण कथा को महसूस करना चाहें तो सीधे काशी यानी वाराणसी पहुंच जाइये ना। यहां के महान संत रामानंद से ज्ञान-चक्षु खोलने वाले उस बच्चे। से पूछिये जो ज्ञान हासिल करने के लिए लहरतारा के विशाल तालाब की सीढि़यों पर भोर-तड़के पर पहुंच जाता है और आखिरकार कबीर बन कर पूरी मानवता को आडम्बर और धोखेबाजी के धंधे से निजात दिलाने के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर देता है। लेकिन यह संत कबीर लाख चाहे तो उस पीड़ा को नहीं व्यक्त कर सकता जो उसकी मां ने महसूस किया होगा। वह अभागी तो उस बच्चे को जन्म देने के बाद उसे अंधेरे में छोड़ देने पर मजबूर हो गयी थी। लोक-लाज की कितनी दारूण पीड़ा इस महिला ने झेली होगी, कि कोई विश्वास तक नहीं कर पायेगा।

और अब मेरी वर्जिन मेरी को देखिये। वह भी कुमारी थी, वर्जिन थी, यानी उसका कौमार्य अक्षत था। लेकिन इसके बावजूद उसने ईशु को जन्म दिया जो आगे बढ़कर ईसा मसीह बन गया जिसका नाम लेते ही पीड़ा से तप्त मानवता को चंगाई मिल जाती है। हां हां, आज भी। अब यह दीगर बात है कि धंधाबाजों की नजर तो इस क्षेपक को बेचने में भी आमादा है।

लेकिन इस तथ्य को हम कैसे विस्मृत कर सकते हैं कि मेरी वर्जिन ने अपने बच्चे जीसस को कभी भी खुद से अलग नहीं रखा, बल्कि उसका पालन-पोषण ही किया। जीसस महान बन गया तो मेरी भी मदर मैरी वर्जिन हो गयी। मैं समझता हूं कि यूरोप की मैरी वर्जिन ने हठ किया और इतिहास में महान हो गयी, जबकि कुन्ती और कबीर की अनाम मां में इतना साहस नहीं रहा कि वह अपने शिशु को सार्वजनिक रूप से अपना सकतीं।

लेकिन इसके लिए केवल मैरी वर्जिन मदर का ही गुणगान किया जाना चाहिए। वास्‍तव में गुणगान तो मदर मैरी की तत्कालीन सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों को देते हुए पूरा क्रेडिट दिया जाना चाहिए जिसने मैरी को साहस दिलाया। जबकि दुख की बात है कि आर्यावर्त में कबीर की मां कुन्ती जैसी महिलाओं में तत्कालीन सामाजिक और आर्थिक विकास के लोप के चलते इतना साहस नहीं उत्प‍न्न हो सका कि वे अपने बच्चे के साथ खुद को भी ऐसी महिलाओं और मानवता की मशाल जला सकतीं। खैर, हम तो यह आशा करते हैं कि हमारे समाज में यह हालात ऐसे बन जाएं ताकि किसी महिला को कोई अवैध शिशु जन्म देने का कलंक न लगे। लेकिन साथ ही यह भी वकालत करना चाहते हैं कि यदि कोई युवती किसी अमान्य रिश्ते के चलते गर्भवती हो जाती है, तो उसे अपने जन्म होने वाले शिशु को हरामी का नाम नहीं दिया जाने के लिए साहस मिले। और हमारा समाज भी इसमें आगे बढ़-चढ़ कर सामने आये ताकि हमारे देश में भी ईसू जैसी महानतम शख्सियतें मानवता को समृद्ध करती रहें।

आमीन

Comments (2)Add Comment
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written by Suneel Yadav, December 26, 2013
सौवीर जी , आर्यावर्त की महिलाओं के सामाजिक उपबन्धो, प्रतिबंधो का बखूबी चित्रण आपने किया । निश्चित रूप से समाज में व्यभिचार को कभी उचित नहीं ठहराया जा सकता । परन्तु असामान्य एवं असहज परिस्थितियों की मार सह रही महिला को तिरस्कार की नज़र से देखने की सामाजिक परंपरा पर विचार करना और इसे दूर करना मानवहित में होगा । एक प्रश्न और ----- क्या सूरज को भी हमारे समाज ने दोषी माना? क्या समाज सुधारक कबीर की माता को अपने प्रिय नवजात शिशु को सीदियो पर फेकने को मजबूर करने वाले समाज को सही कहा जा सकता है ??? यूं तो नारी जन्म से लेकर मृत्यु तक हमेशा समाज के दोयम दर्जे में जीने को मजबूर है , शारीरिक संरचना भी कष्टदायक है --- ऐसे में नारी को ही हर अमान्य रिश्तो की परिणिति के लिए दोषी ठहराया जाना शायद अनुचित है ।
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written by suneel yadav, December 26, 2013
सौवीर जी , आर्यावर्त की महिलाओं के सामाजिक उपबन्धो, प्रतिबंधो का बखूबी चित्रण आपने किया । निश्चित रूप से समाज में व्यभिचार को कभी उचित नहीं ठहराया जा सकता । परन्तु असामान्य एवं असहज परिस्थितियों की मार सह रही महिला को तिरस्कार की नज़र से देखने की सामाजिक परंपरा पर विचार करना और इसे दूर करना मानवहित में होगा । एक प्रश्न और ----- क्या सूरज को भी हमारे समाज ने दोषी माना? क्या समाज सुधारक कबीर की माता को अपने प्रिय नवजात शिशु को सीदियो पर फेकने को मजबूर करने वाले समाज को सही कहा जा सकता है ??? यूं तो नारी जन्म से लेकर मृत्यु तक हमेशा समाज के दोयम दर्जे में जीने को मजबूर है , शारीरिक संरचना भी कष्टदायक है --- ऐसे में नारी को ही हर अमान्य रिश्तो की परिणिति के लिए दोषी ठहराया जाना शायद अनुचित है ।

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