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ज़िंदगी ओ ज़िंदगी

माफिया ब्रजेश ने अमर उजाला को दी मानहानि की नोटिस

: दुर्दांत माफिया को चिंता है मानहानि की, बनारस अमर उजाला संपादक और एक समाजसेवी को नोटिस : "हम लोग का बैकग्राउंड है राजनीति, ऐसी खबरों से हमारी प्रतिष्ठा धूमिल हुई" : अमर उजाला ने मामले में चुप्‍पी साधी, मामला अपनी लीगल सेल के हवाले किया :

मेरी बिटिया संवाददाता

वाराणसी : समाज तो सबरंग है। कोई समाजसेवा, कोई रासरंग, कोई आनंद, कोई शोध, कोई निर्माण तो कोई धर्म-सत्‍संग आदि कृत्‍यों से लगातार समाज की उन्‍नति में जुटा रहता है। लेकिन कुछ ऐसे भी लोग होते हैं जिन्‍होंने अपना पूरा जीवन केवल अपराध को समर्पित कर दिया है। उनको हत्‍या, खून-खूंरेजी, आतंक, भय, लूट और डकैती जैसे घिनौने कृत्‍यों में आनंद मिलता है। बेधड़क लोग ऐसे अपरधियों को कुख्‍यात माफिया या दुर्दांत अपराधी कहते हैं, जबकि डरपोंक देने वाले लोग उन्‍हें बाहुबली की उपाधि देते घूमते हैं। पुलिस उनकी सतत आपराधिक-माफियागिरी को देखकर हिस्ट्रीशीट खोलकर थाने के सूचना पट्ट पर इनके नाम-पिता का नाम-पता सहित दर्ज कर लेती है, ताकि आम आदमी इनकी करतूतों से वाकिफ हों, प्रशासन को भी पहचानने में सुभीता हो।

आज यहां बात हो रही है जुर्म की दुनिया के कुख्यात बादशाह बृजेश सिंह की, जो लूट, हत्या, धमकी, नरसंहार का मुल्जिम है। ब्रजेश के यह सारे किस्‍से पुलिस की डायरी में भरे-संजोये हुए हैं। हिस्‍ट्री-शीट बताती है कि किस तरह ब्रजेश सिंह और उसके परिवारी जनों ने पूर्वांचल ही नहीं, पूरे यूपी, बिहार, छत्‍तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा, एमपी, उत्‍तराखंड समेत कई राज्‍यों में जरायम की दुनिया का सिंहासन हासिल किया और आपराधिक गंदगी पर बैठकर पूंजीपतियों, दुकानदार ,ट्रांसपोर्टर, कोयला व्यापारियों को डरा धमकाकर अपनी तिजोरी भरी।

पुलिस हिस्‍ट्रीशीट के अनुसार ब्रजेश सिंह ने सिकरौरा कांड नरसंहार में दुधमुंहे बच्चे पर भी रहम नहीं किया औऱ यमलोक पहुंचा दिया। जिसके आतंक ने भतीजों को भी बिन पूंजी का व्यापार दे दिया औऱ दिवंगत भाई के गले में विधायक का हार दे दिया। कुनबे को मजबूत कर यह शातिराना अंदाज में प्रगट और गायब होता रहा और अंदर ही अंदर यूपी से बाहर दूसरे प्रदेशों में अपने आर्थिक साम्राज्य को बढ़ाता रहा। यहां इसके भतीजे इसके नाम को भुना कर आगे बढ़ते रहे। अपने तीन दशक के अपराधिक जीवन में बृजेश ठेकों से अरबों कमाता रहा। इसके नाम का आतंक ऐसा रहा कि हर बड़े व्यापार में इसको कमीशन चाहिए था। जो इंकार करता उसकी अंतिम तिथि भी तय हो जाती थी।

खैर समय बदला औऱ कुख्याति चरम पर हुई तो बस नाम ही काफी है। बृजेश ने सोचा कि जब टेरर तो बन चुका है तो क्यों न भाई-भतीजे की तरह नाम के आगे माननीय लगवा लूं। इसी मकसद को अंजाम देने के लिए बृजेश ताना बाना बुनने लगा। क़ामयाबी तब मिली जब चंदौली के मूल निवासी एक स्वजातीय कद्दावर नेता जो इनका सब राज जानते हुए भी इनका 'नाथ' बनने को तैयार हो गए वो वर्तमान में वो केन्द्रीय औऱ 'घर'के मंत्री हैं।

सूत्रों की माने तो इसी योजना के तहत एक दशक पूर्व दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने उड़ीसा से अरुण सिंह उर्फ बृजेश सिंह को गिरफ्तार किया। यह गिरफ्तारी किसी नाटक से कम नही था।

खैर गिरफ्तारी के बाद हर जगह यह गिरफ्तारी चर्चा में रही। बाद में बृजेश को वाराणसी के सेंट्रल जेल में रखा गया। समय के साथ बृजेश ने योजना के तहत अपनी पत्नी को ' भारी ले-देकर' एक पार्टी से एमएलसी बनाया। बाद में उस पार्टी में भाव न मिलने पर चन्दौली के सैयदराजा से चुनाव लड़ा मगर करोड़ो रूपये पानी की तरह बहाने के बाद भी निर्दल मनोज सिंह डब्लू से मुँह की खा गया। उसके बाद स्थानीय निकाय चुनाव में करोड़ो रूपये पानी की तरह बहाने और 'नाथ' के अदृश्य समर्थन के बाद सपा प्रत्याशी मीना सिंह से 1986 मतों से बृजेश ने जीत दर्ज की। और यहीं से मान या न मान है कर मेरा जबरन सम्मान की शुरुआत हुई ।

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जिया रजा बनारस

एमएलसी बनते ही बृजेश के नाम के साथ माननीय शब्द ऐसे जुड़ गया। सूत्रों की माने तो एमएलसी बनते ही अपने टेरर को धार और काली कमाई को व्यापार बनाने के लिए बृजेश ने अपने गुर्गो को काम पर लगा दिया। एक तो मिनिस्टर 'नाथ'का साथ ऊपर से माननीय का दर्जा। यही कारण है कि सत्तासीन सरकार इस माफिया के लिए आंखें मुंद कर पड़ी रहने लगी। लोगों की माने तो इसी का नाजायज फायदा उठा बृजेश ने अपने मकसद को अंजाम देने के लिए येन केन प्रकारेण बीमारी का बहाना बना जेल से पूर्व के मुकदमों को प्रभावित करने और वसूली ठेको के लिए इलाज की आड़ में बीएचयू में डेरा डाल दिया। जब लम्बे समय तक हॉस्पिटल में पड़े रहने की खबर वाराणसी के अखबारों को हुई तो जाहिर सी बात है लोकतांत्रिक खम्भा ने अपना फर्ज निभाया और बृजेश के इलाज पर सवाल खड़े होने लगे। इससे तिलमिलाये माफिया मास्टर यानी बृजेश ने उन अखबारों को अर्दब और दवाब में लेने के लिए मानहानि का नोटिस भेज दिया।

आम तौर पर सामान्‍य लोग कहते घूमते रहते हैं कि इन अखबारों को नोटिस से कोई फर्क नही पड़ता है। क्योंकि मान उसी का है जो सम्मानित हो औऱ जो हिस्ट्रीशीटर हो उसका मान सम्मान कैसा और क्यों..?अभी कुछ दिनों पहले ही वाराणसी जिले के एक विधायक के बीजेपी अध्यक्ष ने एक सवाल के जवाब में 'चोर' कह दिए तो जिस एमलसी की पूरी जवानी जिंदगानी वसूली, रंगदारी ,अपराध में गुजरी हो उसका कैसा मान कैसी हानि..? बल्कि उसे तो अपने पूर्व के कर्मो के लिए उन पीड़ितों जो इसके अपराध कर्मो की वजह से अपनो को खो चुके हैं उनसे माफी मांगनी चाहिए आप माफिया से माननीय हो सकते हैं मगर आपसे लुटे पिटे बर्बाद हुए और उन विधवाओं की सुनी मांग चीख चीख कर आपको माफिया मर्डरर ही कहेगा क्योंकि आप सफेद शर्ट पर सैकड़ों खून के धब्बे हैं जो इस जीवन में आपको मान नही दिला सकते

औऱ ख्यात और कुख्यात में जनता फर्क जानती है आप जनता और अखबार से जबरन मान चाहते हैं तो आपका भरम है कम से कम मुझसे और मेरे अखबार से यह उम्मीद तो नही होनी चाहिए।

हम तो अपराध अपराधियों भ्र्ष्टाचार भ्र्ष्टाचारियों के खिलाफ यूँ ही मुखर रहेंगे चाहे भले ही अंजाम गौरी लंकेश जैसा हो। ( इनपुट: अमित मौर्या के साथ)

सुप्रीम कोर्ट जाएंगे जस्टिस विनीत सरन !

: सर्वोच्‍च न्‍यायालय में रिक्त हो रहे सात पदों के लिये जल्द हो सकता है नामों की ऐलान, न्‍याय-क्षेत्र में खलबली : इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सुप्रीम कोर्ट कोटे की एक सीट हो गई है रिक्त, एपी शाही, विक्रम नाथ व सुधीर अग्रवाल : सब की निगाहें कोलेजियम की अगली बैठक पर टिकीं :

कुमार सौवीर

लखनऊ : खबर है कि मूलरूप से इलाहाबाद उच्च न्यायालय के जज एवं वर्तमान में ओड़ीसा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस विनीत सरन को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया जा सकता है। जस्टिस सरन वर्ष 2002 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के जज बने थे। वर्ष 2015 में उनका तबादला कर्नाटका हाईकोर्ट कर दिया गया था। वर्ष 2016 में इनको मुख्य न्यायाधीश के पद पर प्रोन्नति देकर ओड़ीसा का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया था। तब से जस्टिस सरन वहीं पर तैनात हैं।

आपको बता दें कि हाल ही जस्टिस आरके अग्रवाल के सुप्रीम कोर्ट जज के पद से रिटायर हो जाने के कारण उत्तर प्रदेश के कोटे का एक पद सुप्रीम कोर्ट में रिक्त हो गया है। दरअसल हर राज्य का एक कोटा होता है सुप्रीम कोर्ट जज और चीफ जस्टिस के पदों पर तैनाती को लेकर। उत्तर प्रदेश का कोटा दो चीफ जस्टिस और दो सुप्रीम कोर्ट जज का है। वर्तमान में उत्तर प्रदेश के कोटे के दो चीफ जस्टिस के पदों पर जस्टिस विनीत सरन और जस्टिस कृष्ण मुरारी तैनात हैं। इसी तरह सुप्रीम कोर्ट जज के दो पदों के कोटे में से एक पर जस्टिस अशोक भूषण तैनात हैं व दूसरे पर तैनात रहे जस्टिस आरके अग्रवाल मई में रिटायर हो चुके हैं।

सूत्र बताते हैं कि ऐसी हालत में उस एक पद पर तैनाती के लिये जस्टिस विनीत सरन के नाम की चर्चा ज़ोरों पर है। इसी तरह अगर जस्टिस सरन सुप्रीम कोर्ट में प्रोन्नत हो जाते हैं तब उत्तर प्रदेश के कोटे का चीफ जस्टिस का एक पद भी रिक्त हो जायेगा। उस पद पर तैनाती के लिये इलाहाबाद हाईकोर्ट के सबसे वरिष्ठ जज जस्टिस एपी शाही, जस्टिस विक्रम नाथ व जस्टिस सुधीर अग्रवाल में से किसी की प्रोन्नति की चर्चा भी हो रही है।

मीडियाकर्मियों को भाषा-बोली सिखाएंगे भाषाविद

: लखनऊ समेत यूपी के न्‍यूज चैनलों के रिपोर्टरों को सटीक शब्द सिखाने वाली कार्यशाला 29 जुलाई को : ओसामा तलहा सोसाइटी ने छेड़ी कलमकारों में भाषा-सुधार वाली पहलकदमी : पत्रकारिता में शालीनता और सचाई के मसले भी अब उठाये जाएंगे :

मेरी बिटिया संवाददाता

लखनऊ : भाषा  और बोली को लेकर पत्रकारिता पिछले दो दशकों से बेहद बुरी  हालत से गुजर रही है। खास तौर पर न्यूज़ चैनल पर बोली जा रही भाषा की दुर्गति अब किसी से  छुपी नहीं है। अर्थ का अनर्थ  कर डालने वालों की  संख्या  टीवी चैनलों  पर लगातार बढ़ती ही जा रही है। ऐसी हालत में  अचानक एक किसी सुखद घटना  की तरह ही एक नई अनोखी पहल शुरू होने वाली है।

ओसामा तल्हा सोसाइटी की ओर से पत्रकार कुलसुम तल्हा पत्रकारों और खास कर न्‍यूज चैनल के पत्रकारों के लिए एक नई खुशखबरी लेकर आई है। अपनी इस पहल के तहत कुलसुम ने अपनी मां किश्वरी और पति ओसामा तल्हा की याद में एक कार्यशाला का आयोजन करेंगी, जहां प्रतिभागियों को बोलने और लिखने जाने वाले शब्दों को सुधारने और संवारने की दिशा दी जाएगी। कुलसुम बताती हैं यह कार्यशाला तलफ्फुज और मीडिया के विषय पर आयोजित होगी। तारीख है अगली 29 जुलाई की शाम।

कुलसुम ने बताया कि इस कार्यशाला में प्रोफेसर लखनऊ विश्वविद्यालय के उर्दू विभागाध्यक्ष प्रो अनीस अशफाक, प्रोफेसर साबरा हबीब, आयशा सिद्दीकी, करामत कॉलेज  की प्रिंसिपल रह चुकी साबिया अनवर, कमर खान आदि प्रतिभागियों को संबोधित करेंगे।

कुलसुम का कहना है कि वह भविष्य में भी ऐसी कार्यशालाओं का आयोजन करती रहेंगी, जिससे न केवल टीवी पत्रकारिता बल्कि अखबार और अन्य मीडिया कर्मी भी लाभांवित हो सकेंगे। कुलसुम इस बात से दुखी हैं कि खास तौर पर टीवी चैनल के कुछ कार्यक्रमों में शालीनता और सत्य का प्रभाव लगातार कम होता जा रहा है। यह चिंता का विषय है। हम सच को पूरी शालीनता के साथ बेहतर तरीके से लोगों तक पहुंचा सकते हैं, बजाय इसके कि उन्हें आक्रमण की शैली में बेहूदगी के साथ पेश किया जाए।

बातों-बातों में ही खुल गयी पत्रकारिता की पाठशाला

: अमर उजाला के समाचार संपादक प्रदीप मिश्र की सोशल-बैठकी में ही अनायास शुरू हुई चर्चा : अखबारों में सामान्‍य तौर ऐसे शब्‍द छपने शुरू हुए हैं, जो वाकई हैं असभ्‍य, अशिष्‍ट और व्‍याकरण के पैमाने पर अराजक और अनर्थकारी :

कुमार सौवीर

लखनऊ : आइये, एक नयी पाठशाला खोल दिया जाए। चलती-फिरती पाठशाला। इसके लिए कहीं आने-जाने की भी कोई जरूरत नहीं। बस, अपना मोबाइल ऑन कीजिए, फेसबुक या वाट्सऐप समूह में जुड़ कर वहां भाषा को लेकर हो रही गलती-गड़बडि़यों पर चर्चा शुरू कर दीजिए। बिना किसी संकोच, या फिर बिना किसी दुराग्रह के। आपका लहजा बस शांत, सौम्‍य और सहयोगी भाव में होना चाहिए। बाकी लोग खुद ब खुद आपके पास जुड़ने लगेंगे।

फेसबुक पर मैंने कल रात यही किया। अमर उजाला में वाराणसी के समाचार संपादक हैं प्रदीप मिश्र। आईआईएमसी यानी भारतीय जन संचार संस्‍थान के पढ़े-लिखे हैं। तीस साल हो चुके हैं पत्रकारिता करते हुए। लेकिन जैसे कोई परिंदा अपने पुराने घोंसले पर लौटता हो, जैसे कोई विवाहिता अपने लोगों का हालचाल लेने अपने मायके आती हो, प्रदीप भी आईआईएमसी पहुंचे। वहां की अपनी एक फोटो फेसबुक पर अपलोड की। फिर क्‍या था, कमेंट्स की बाढ़ आ गयी। सामान्‍य तौर पर वर्तनी की गड़बड़ होती है, तो मैं उसे सहज भाव में ले लेता हूं। लेकिन उसमें से एक कमेंट पर मेरी नजर पड़ी, गौर किया तो पाया कि यह पत्रकार हैं। मुझे लगा कि यह शख्‍स हमारे ही पत्रकारिता-परिवार का सदस्‍य है। इसलिए उसे मैंने समझाने के लिए मित्रतापूर्व परामर्श देना शुरू कर दिया।

आइये, उस कमेंट पर आया जाए, जिस पर बातचीत शुरू हो गयी। वह बातचीत बेहद शालीनता के साथ हुई। मैंने अपनी बात पूरी सहजता-सरलता के साथ कह दी, और उसने भी पूरी सौम्‍यता और शालीनता के साथ मेरे परामर्श को स्‍वीकार किया। कहीं भी किसी भी शख्‍स ने ऐसा नहीं किया जिससे किसी को बुरा लग सके। आइये, अब बातचीत को पढ़ने का कष्‍ट करें :-

Hemant Dubey कहा का है शीन है सर

Kumar Sauvir हेमंत जी। आपने जिस संदर्भ में शीन शब्द का प्रयोग किया है, वह सर्वथा भ्रमकारी, अशुद्ध और अनर्थकारी है। सही शब्द है सीन।और मैं समझता हूं कि यह सही समय है जब मैं इसी विषय पर पाठशाला प्रारम्भ कर दूं। अन्यथा मत लीजियेगा, लेकिन पत्रकारिता के गंभीर क्षेत्र में शब्द, वर्णमाला और व्याकरण सर्वथा अनिवार्य होते हैं।

जरा अब नोट करना शुरू कीजिए और अपने साथियों को भी इस बारे में जागरूक व सतर्क भी कीजियेगा।

सीन और शीन शब्द हिंदी अथवा अंग्रेजी में हैं ही नहीं।शीन तो उर्दू का अक्षर है, जिसका इस्तेमाल केवल श अक्षर को प्रयुक्त करने में किया जाता है। जबकि सीन अक्षर नहीं, बाकायदा एक शब्द होता है। अंग्रेजी में सीन का अर्थ है दृश्य, नजारा अथवा क्रिया में देखा जा चुका। जबकि उर्दू की वर्णमाला में शीन से श शब्द की उत्पत्ति होती है। आपको बता दूं कि उर्दू में शीन से पहले सीन शब्द आता है। सीन के बाद शीन, फिर स्वाद, फिर ज्वाद।

Pradeep Mishra पाठशाला अच्छी लगी।

Hemant Dubey छमा

Kumar Sauvir Hemant Dubey मेरे लाल। क्षमा के लिए नहीं, समझने की पाठशाला खोली है मैंने। सिर्फ सुधरो,सुधारो, और अक्षर-संधान कर ब्राह्मण और पंडित बनने के सेनानी बनो।

लेकिन पहले तो छमा नहीं, क्षमा शब्द का प्रयोग शुरू करो

Kumar Sauvir बेटा। मैं क्लास चला रहा हूँ, जिज्ञासा और उत्साह भाव रखो। यह जेल या हवालात नही, कि हम शर्मिंदा होते रहें

Hemant Dubey ओके सर

Kumar Sauvir जिज्ञासा, विचार, शब्द, भाव, विश्लेषण, लेखन, अभिव्यक्ति और सम्प्रेषण तुम ही न संभालोगे-सीखोगे, तो कौन करेगा?

उपसंहार:- हालांकि मैं जानता हूं कि ऐसी टोकाटाकी किसी को बुरी भी लग सकती है। लेकिन मुझे लगा कि ऐसा करना जरूरी है। हम पत्रकार लोग अपनी विश्‍वसनीयता और भाषागत अराजकता के बड़े खतरे से जूझ रहे हैं। इसलिए इस तरह की नुक्‍ताचीनी होनी ही चाहिए। और गर्व की बात है कि हेमंत दुबे ने मेरी हर बात पर सहमति व्‍य‍क्‍त की। अब आप सब लोग भी इस बारे में लोगों को जागरूक करें।

कुम्‍भ-पर्व: कहीं पे निगाहें,कहीं पे निशाना

: लक्ष्य है चुनाव-चुनाव, माध्यम है कुंभ और खजाना है सरकार का : अफसरों ने अभूतपूर्व कमर कस ली, खबरों की बात भूल जाइये : प्रसून जोशी की कंपनी को दिया गया रेवड़ियां बांटने का काम, जितना मुंह होगा, विज्ञापन ठूंस दिये जाएंगे :

कुमार सौवीर

लखनऊ : शतरंज का खेल। जिसके नाम पर बाकायदा एक फिल्म तक बॉलीवुड बनाई जा चुकी है, लखनऊ में लोकेशन थी और गोमती नदी के किनारे से लेकर चौक के इलाके तक फिल्माए गए थे। कलाकार थे संजीव कुमार और अमजद खान। लेकिन यह तो सिर्फ कहानी थी, मगर उसके पीछे जो चालें बिखेरी और चली गई थीं उसने ही इस फिल्म को कामयाब करा दिया था।

ठीक ऐसी कहानी अब कुंभ पर्व को लेकर रची जा रही है। अलग-अलग निशाने हैं, अलग-अलग निगाहें हैं। अलग-अलग लक्ष्‍य है, अलग-अलग बाण हैं। अलग-अलग माध्यम हैं, अलग-अलग पात्र हैं। लेकिन इसमें आत्मा के तौर पर जिस चीज को चिन्हित किया गया है उसका नाम है सरकारी खजाना। यह सरकारी खजाना ही तो वह साधन है, जो भाजपा का डंका बजा सकता है, अगर निशाना सटीक पड़ा, तो।

जी हां, इलाहाबाद में होने वाले कुंभ पर्व वहां आयोजित होने वाले  विश्व विख्यात मेला और उसकी तैयारियों को लेकर जो सरकारी कवायद चल रही है, उसमें बेशुमार रकम फूंकने की कोशिश हो रही है। सूत्र बताते हैं कि इस मेला के प्रचार में इतनी रकम फूंक डाली जाएगी, कि पिछली अखिलेश सरकार के आंकड़े फेल हो जाएंगे।

विश्वस्त सूत्रों ने बताया कि यह पूरा आयोजन कहने को तो कुंभ पर्व और उसके मेला को लेकर खर्च किया जाएगा। लेकिन इसके माध्यम से सरकार सीधे सन 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में अपनी मजबूत हैसियत बनाने की जुगत में है। क्योंकि यह पूरा आयोजन ठीक उसी वक्त पर हो रहा होगा जब लोकसभा चुनाव में चल रहे होंगे। ऐसी हालत में सरकारी खजाने से खर्च होने वाली रकम का लाभ भाजपा को चुनाव में मजबूती दिला सके, इसके लिए कुंभ पर्व की रणनीति प्रशासनिक तौर पर बनाई जाने की जोर-शोर कवायद चल रही हैं।

दिल्ली के एक वरिष्ठ पत्रकार ने बताया किया कि कुम्‍भ पर्व में पूरी प्रचार कैंपेन की बागडोर एक अंतरराष्ट्रीय कंपनी को थमा दे दी गई है जिसका नाम है 'मैकऐन इरिक्सन'। फैसले के तहत यह कंपनी ही इस पूरे मेला और पर्व क्षेत्र में न्यूज़ चैनल, टीवी चैनल, अखबार, आउटडोर और बैनर होर्डिंग का काम करेगी। यही कम्‍पनी क्रिएटिव, फोटो सेशन, चलाएगी आउटडोर शूटिंग करायेगी, और इसके अलावा जो भी उसके मन में आएगा, करेगी। यूपी सरकार के अफसर इस कंपनी के सामने हाथ जोड़े खड़े रहेंगे।

तो आइये, जरा समझ लिया जाए कि यह 'मैकऐन इरिक्सन' नामक कंपनी का आधार क्या है। कोई भी खास आधार नहीं है जनाब, कुछ भी नहीं। सिवाय इसके कि कंपनी के अध्यक्ष प्रसून जोशी हैं जो सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष भी हैं। और हाल ही नरेंद्र मोदी के करीबी बन चुके हैं। उसके बाद से ही उनकी पहुंच देश व यूपी के सभी बड़े भाजपा नेताओं तक हो गयी। फिर क्‍या था, प्रसून की इस कम्‍पनी की तूती कुम्‍भ पर्व में भी बजने लगी। सूत्र बताते हैं कि सूचना विभाग और मुख्यमंत्री सचिवालय के बड़े-बड़े अफसर इस कम्‍पनी के इस दायित्व को पूरा करने के लिए हाथ जोड़े खड़े रहते हैं। सभी माध्यम मीडिया में विज्ञापन वाले लोग प्रसून जोशी के दरवाजे पर अरदास लगाते हैं।

बताते हैं कि अखबारों और चैनलों को उनकी मांग से ज्यादा पैसा उनके मुंह में ठूंसा जा चुका है। ऐसे में अब यह उम्मीद पालना बंद कर दीजिएगा कि आपको आम आदमी को जोड़ने वाली खबर मिलेगी। सच बात तो यही रहेगी कि अब जो भी परोसा जाएगा चैनल और अखबारों में, वह वही मिलेगा जो सरकार चाहती है और जिसे अफसर उनके मुंह पर फेंकेंगे।

लक्ष्‍य होगा मिशन-2019

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