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सुपाड़ी जर्नालिज्‍म: अखबार पास करेगा कालोजियम की लिस्‍ट ?

: इलाहाबाद हाईकोर्ट की कोलेजियम द्वारा भेजे गये नामों पर टाइम्‍स ऑफ इंडिया ने सवाल उठाये : कई प्रस्‍तावों पर हस्‍तक्षेप, जजों के रिश्तेदार हैं : अगर किसी वकील का रिश्‍तेदार जज है, तो उसकी अर्हता पर आक्षेप कैसे : अखबार में छपी इस सूची का स्रोत क्‍या है :

कुमार सौवीर

लखनऊ : हाईकोर्ट में पूरी जिन्‍दगी खपा चुके वकीलों को खुद को जज की कुर्सी हासिल करने के लिए अब केवल कोलोजियम की ही अनुमति ही पर्याप्‍त नहीं होगी। बल्कि उसके लिए उन्‍हें एक अनिवार्य बाधा पार करनी ही होगी। वहां से अपना चरित्र-प्रमाणन कराने के बाद ही यह तय हो पायेगा कि कौन वकील हाईकोर्ट में वकील बनने लायक है अथवा नहीं। इस बाधा का नाम है टाइम्‍स ऑफ इंडिया। इस अखबार की कवायदों को देखते हुए तो यही साबित होता दिख रहा है कि हाईकोर्ट में जस्टिस बनने के लिए अंतिम बैरियर अखबार ही उठायेगा, और तय करेगा कि अमुक को जज बनाया जाना होगा और अमुक को बाबा जी का ठिल्‍लू थमाया जाएगा।

सोमवार 12 फरवरी-18 को सुबह अंग्रेज़ी के एक बेहद प्रतिष्ठित अखबार टाइम्‍स ऑफ इंडिया ने जो खबर छापी है, उससे तो यही साबित होता है कि अब हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति में भी यह अखबार अपना हस्‍तक्षेप करने पर आमादा है। कहने की जरूरत नहीं कि इस अखबार को लेकर अब वकील समुदाय में अब गहरा आक्रोश फैल रहा है।

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जस्टिस और न्‍यायपालिका

इस अखबार के अनुसार हाल ही में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की कोलेजियम ने जो 33 वकीलों के नाम हाईकोर्ट जज बनाने के लिये सुप्रीम कोर्ट को भेजे थे उनमें से अधिकांश नाम ऐसे हैं जो किसी न किसी सिटिंग या रिटायर्ड हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट जज के संबंधी हैं। कोई वकील किसी जज का लड़का है तो कोई भतीजा। कोई किसी बड़े नेता की पत्नी का बिज़नेस पार्टनर है तो कोई किसी बड़े वकील का जूनियर।

हो सकता है कि यह बातें सही हों, और यह सारे प्रस्‍ताव उन वकीलों के अटूट परिश्रम, उनके अध्‍ययन, और उनकी प्रैक्टिस के परिणामों के आधार पर तैयार किये गये हों। उधर यह भी हो सकता है कि  कि यह नाम सिफारिश से आये हों। वैसे भी कई बार यह आरोप लगते ही रहे हैं कि कई जजों के रिश्‍तेदार वकालत में लिप्‍त हैं और उनके जजों के प्रभाव के चलते ही उन वकीलों की प्रैक्टिस फलती-फूलती रहती है। कई बार तो विभिन्‍न मंचों से ऐसे जजों और उनके रिश्‍तेदारों की सूची तक सार्वजनिक हो चुकी है।

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पत्रकार

मगर उधर दूसरी ओर सवाल यह भी उठता है कि अगर यह सब बातें सच हैं तो इन सब तथ्यों की जांच के लिये केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट मौजूद हैं। वैसे भी जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया का एक अहम हिस्सा आइबी द्वारा दी गई गोपनीय रिपोर्ट भी होती है जिसके आधार पर ही हर एक वकील का बैकग्राउंड चेक किया जाता है। ऐसे में सवाल यह उठता है की जब ये सारी प्रक्रिया अभी चल ही रही थी, तो ऐसे में इस अंग्रेजी अखबार को क्या जरूरत पड़ी ऐसी खबर छापने की?

इसको लेकर कई संशय और आरोप भी उठने लगे हैं। सवाल यह भी उठने लगा है कि क्या ये किसी के इशारे पर हो रहा है?

एक विश्‍वस्‍त सूत्र यह सवाल उठाते हैं कि जिन जजों पर बातचीत इस अखबार ने छेड़ी है, उसका स्रोत क्‍या है। क्‍या यह सूचना हाईकोर्ट प्रशासन द्वारा तैयार की गयी है। और अगर हां, तो फिर वह गोपनीय जानकारी कैसे सार्वजनिक हो रही है। सूत्र बताते हैं कि कोलोजियम को शामिल किये जाने वाले वकीलों के नामों की लिस्‍ट गोपनीय तोर पर सीलबंद लिफाफे होकर ही सुप्रीम कोर्ट को भेजी है। फिर क्‍या ऐसी ही कोई सूची इस अखबार के हाथों कैसे लग गई? क्या जजों की नियुक्ति को लेकर कोई राजनीति चल रही है? अगर ऐसी राजनीति चल भी रही है तो क्या किसी प्रतिष्ठित अखबार को इसका हिस्सा बनना चाहिये?

एक वरिष्‍ठ अधिवक्‍ता का सवाल यह है कि:- क्या ये सुपाड़ी जर्नलिस्म नही हैं?

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लर्नेड वकील साहब

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