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कान्‍हा ! अब तो हाईकोर्ट पधारो मेरे श्‍याम सांवरे लाला

: न जाने क्‍यों खफा हैं बड़े मुंसिफ हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच से : पूरी फरवरी खाली निपट गयी, लखनऊ दर्शन नहीं कर पाया इंसाफ के सबसे बड़े पहरूआ को : चंद्रचूड़ के जमाने में तय हुआ था कि महीने में दो हफ्ते गुजारा करेंगे आला हाकिम, बस अमल नहीं हो पाया :

कुमार सौवीर

लखनऊ : सारा श्रंगार झुरा गया है। सारी सेज जस की तस पड़ी-पसरी है। सारे फूल-गुलदस्‍ते चीमड़ होकर महक मारने लगे हैं। सारा तामझाम और सारा हल्‍लागुल्‍ला श्‍मशानी शांति तले दबा जा रहा है। सारी शहनाई-नगाड़े खामोश बैठे हैं, हारमोनियम भी खुद में हवा नहीं भर पा रहा है। सारी सजावट और बिजली के सारे लट्टू बुता-बुझा गये लगते हैं। बिछाये गये कालीन और गलीचों पर धूल चढ़ने लगी है। सारी कल्‍पनाएं, सारे सपने, सारी ख्‍वाहिशें, सारी तमन्‍नाएं पल-हर-पल स्‍खलित, मूर्छित, अचेत होती जा रही हैं। वगैरह-वगैरह।

झुरा जाना समझते हैं आप? अवध में झुराने का मतलब होता है सूख जाना। लेकिन अवध के न्‍याय-क्षेत्र में अब न्‍यायिक व्‍यवस्‍थाएं लगता है कि झुरानी जा रही हैं। मामला है इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ का, जहां के अधिकांश जिले अवध क्षेत्र के शामिल हैं। केवल इस अवधी बेंच में काफी कुछ सन्‍नाटा ही पसरा दिख रहा है।

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जस्टिस और न्‍यायपालिका

वहज है हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस, जो इलाहाबाद में ही जमे रहते हैं। लखनऊ की ओर रूख करने की उनकी कोई ख्‍वाहिश ही नहीं दीखती। बेहाल हैं लखनऊ खंडपीठ से जुड़े वकील, कर्मचारी और वादीगणों। बेहाल लोगों में झगड़ालू और अपराधी भी शामिल हैं। दरअसल, इन सब की ख्‍वाहिशें हैं कि अगर चीफ साहब लखनऊ में ज्‍यादा वक्‍त देना शुरू कर दें, तो लखनऊ खण्‍डपीठ की व्‍यवस्‍थाएं ज्‍यादा चौकस और व्‍य‍वस्थित हो सकती हैं।

मगर काश ऐसा हो पाता।

अब यह खुदा ही जाने कि मुख्‍य न्‍यायाधीश की क्‍या मजबूरियां हैं कि वे नियमित रूप से लखनऊ क्‍यों नहीं आ ही पा रहे हैं। वजह क्‍या है, इसको लखनऊ खण्‍डपीठ से जुड़े वकील भी नहीं समझ पा रहे हैं। लेकिन हकीकत यही है कि जब से लखनऊ बेंच का नया न्‍याय-भवन बना है, इसके प्रति मुख्‍य न्‍यायाधीश की रूचि ही खत्‍म सी हो गयी प्रतीत होती है। आलीशान भवन का आधा से ज्‍यादा हिस्‍सा खाली पड़ा है। किसी के भी यह समझ में ही नहीं पा रहा है कि आखिर जब आवश्‍यकता नहीं थी, तो इतना अभूतपूर्व इमारत काहे बना कर खड़ी कर दी गयी। इसकी इतनी सजावट है कि लोग भौंचक्‍का रह जाएं, लेकिन इस बेंच भवन में मुख्‍य न्‍यायाधीश द्वारा कम वक्‍त दिये जाने को लगता है कि इस भवन में मुखिया के स्‍वागत की सारी तैयारियां जस की तस धरी ही रहेंगी क्‍या।

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लर्नेड वकील साहब

परम्‍परा के अनुसार इलाहाबाद के मुख्‍य न्‍यायाधीश चार में से तीन हफ्ते इलाहाबाद में बिताते थे, जबकि एक हफ्ता लखनऊ को देखते थे। निवर्तमान चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने यह व्‍यवस्‍था की थी कि इसे तीन और एक के बजाय दो और दो हफ्ते के हिसाब से आवंटित किया जाए। हालांकि चंद्रचूड़ की यह व्‍यवस्‍था केवल प्रॉसेज तक ही सीमित रही। जजों की संख्‍या नहीं बढ़ पायी, और इसीलिए इस व्‍यवस्‍था को लागू भी नहीं किया जा सका।

लखनऊ बेंच से जुड़े एक वरिष्‍ठ अधिवक्‍ता नेता इस बारे में एक आंकड़ा पेश कर रहे हैं। उनका कहना है कि पिछले तीन महीने का मामला देख लीजिए, तो आपको यह बात समझने में आसानी हो जाएगी कि चीफ साहब की मौजूदगी लखनऊ में कैसी रही। आंकड़ों के अनुसार दिसम्‍बर-17 में केवल एक ही दिन मौजूदा चीफ जस्टिस लखनऊ में रहे। जनवरी-18 में केवल तीन दिन ही लखनऊ आये। 23, 24 और 25 जनवरी। लेकिन फरवरी में तो एक भी दिन आला मुंसिफ का दर्शन नहीं हो पाया।

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