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हाईकोर्ट: चला था पेपरलेस, हो गया ऑर्डरलेस

: हाईकोर्ट बार में बह रहे हैं जमीनी मसलों के चुनावी झोंके : लखनऊ बेंच में बिजली चोरी और वकीलों के चेम्बर के अलॉटमेंट को ले कर झौं-झौं : बिल्डिंग के निर्माण की गुणवत्ता की जांच होनी चाहिए कि नहीं, सवाल तो वाकई गंभीर हैं : पदाधिकारी लगे हैं जजों की चापलूसी में :

श्‍वेतपत्र संवाददाता

लखनऊ : इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खण्‍डपीठ में वकीलों के संगठन यानी अवध बार एसोसियेशन को लेकर नेता वकीलों ने मैदान पर अपनी-अपनी ताल ठोंकनी शुरू कर दी हैं। अब चूंकि जीतने के लिए इसके पहले की कमेटी के कामकाज को खारिज करना होगा, पुराने पदाधिकारियों को नाकारा साबित करना पड़ेगा, और पुरानी व्‍यवस्‍थाओं को खारिज करते हुए नयी फलक पर खुद को स्‍थापित करना किसी भी चुनाव की फितरत और जरूरत भी होती है, ऐसे में अवध बार एसोसियेशन भी इसी रौ में दौड़-तैर रहा है। ताजा मामला है हाईकोर्ट के नये परिसर में वकीलों के चैम्‍बर और वहां हो रही बिजली की खपत का घोटाला और अराजकता।

बार में चुनाव में अपनी जमीन खोजने की कवायद अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने शुरू कर दी है। उनके आरोप भले ही शक-शुबहों पर अमान्‍य किये जाएं, लेकिन जो मसले उन्‍होंने सवाल उठाये हैं, उनकी ओर कोई भी सवाल फिलहाल अब तक नहीं दिया गया है। अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने अभी दो दिनों पूर्व इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में वकीलों के चेम्बर के अलॉट्मेंट को ले कर एक प्रस्ताव OUDH BAR के पास भेजा है, ये अपने आप में वकीलों की स्थिति को बखान करने वाला है।

अमरेंद्र ने पूछा है कि HC की नयी बिल्डिंग में बिजली का जितना दुरुपयोग होता है वो किसी से छुपा नहीं है, यहाँ तो कोर्ट का चपरासी भी AC चला कर सोता है, हर कर्मचारी हो कोर्ट परिसर में, बाइथेने के लिए air conditioned space मिली हुयी है। सारी कोर्ट रूम chilled रहती हैं, पूरी रात हाई कोर्ट जगमग रहता है बिना बात के चारों तरफ lights जल रही होती हैं।

उत्तर प्रदेश जैसे पिछड़े राज्य में ये ऐय्याशी! जितने gadgets कोर्ट में साहब लोगों के तरफ लेगे हैं और उन से जितनी बिजली की खपत होती है, क्या वो सब जुड़ीशियल functioning के लिए आवस्यक है? क्या इस के बिना dispensation ऑफ justice संभव नहीं है?

जब वकीलों के चेम्बर के अलॉट्मेंट की बात आई तो फिर वही राग, वकील pre-paid मीटर लगाएगा।

क्या railway station पर passenger pre-paid मीटर ले कर प्लैटफ़ार्म का उपयोग करता है, क्या customer pre-paid मीटर लगा कर बैंक में घुसता है?...........

और वकीलों के चेम्बर में खर्च होने वाली बिजली, हाई कोर्ट में कुल बिजली की खपत का कितना प्रतिशत होने वाला है? लग रहा है जैसे वकील बिजली चुरा के जेब और बस्ते में भर के घर ले जाएगा!

फिर किस न्यायपालिका का दायित्व पूरे HIGH COURT परिसर में फ्री un-interrupted पावर सप्लाइ प्रदान करने की नहीं है?

ऊपर से मुंसी लोग air-condition में बैठेंगे। सरकारी वकील भाई लोग भी air-condition में बैठेंगे, सारे जुड्ग साहब, सारा HIGH COURT स्टाफ, चपरासी, अर्दली, सफाई कर्मचारी सब के सब.......

हाँ कुछ गिने चुने व्हाइट कोलर वाले वकील भाई लोग भी (जिनके पास भरपूर पैसा है) air-condition में बैठेंगे ।

बस जो लोग बिजली का बिल अफफोर्ड नहीं कर सकते वो अंधेरे और गर्मी, में बैठ के client का इंतज़ार करें, और फिर सुरू होगा तथाकथित बड़े और छोटे वकील में अंतर दिखने वाली ब्यवस्था और फिर उसी के नाम पर दोहन शुरू.........

गांधीजी कोई भी कम करने से पहले, जिस अंतिम व्यक्ति के बारे में सोचने की बात करते थे, वो बेचारा कहीं कोने में बैठा सब देख रहा है।

ये कैसी विडम्बना है प्रभु, ये HIGH COURT तो तो चला था paperless होने, और हो गया ORDER-LESS।

इसे कोई तो बचाये। बात अब अधिवक्ताओं के अस्तित्व की आ पड़ी है, ये न्यायपालिका सुविधाभोगी हो चली है, इसे केवल अपनी सुविधाओं की चिंता है। कोर्ट को mall of justice में बादल दिया, और लग रहा है की बिना 5 स्टार होटल की सुविधाओं के justice delivery संभव ही नहीं है। कोई पूछने वाला नहीं है की 1 साल के अंदर ही कोर्ट की दीवारों पर लगे पत्थरों को पेंच से कसने की जरूरत क्यों पड़ गयी, और क्या पत्थर को ड्रिल करने से पत्थर में दरार नहीं पड़ रही होगी, उस की भव्यता पर आंच नहीं आ रही है, क्या?, और इस बिल्डिंग के निर्माण की गुणवत्ता की जांच होनी चाहिए कि नहीं?, large scale corruption की बू आ रही है इसके निर्माण में कि नहीं?

हाँ एक वादकारी का पक्ष भी है, वो मारा कुचला निरीह प्राणी कि सुध लेने वाला कोई नहीं है, न उसके बैठने कि जगह है न खड़े होने कि और न ही उसके लिये कोई भी सुविधा। जनता के पैसे पर और जनता के नाम पर नंगा नाच चल रहा है।

ऐसे बना के रख दिया है कि जैसे, हम सब फिर से सामंतवादी व्यवस्था में आ गए हैं या फिर, फिरसे अंगराजों के गुलाम हो गए हैं, ये गुलामी के दौर की मानसिकता वाली जुडीसीयरी लगती है, जो हर तरह के सुविधाओं से लैस है, और उसका काम केवल और केवल शाशन और सत्ता के काले कारनामों पर मुहर लगा कर, न्याय का मौखल उड़ाना भर रह गया है।

एक आम आदमी, जो की किसी बड़े वकील या सीनियर वकील को afford नहीं कर सकता, उसकी सुनवाई में न्यायपालिका उदासीन लगती है। बेचारा छोटा वकील ...

सब चुप हैं, हस्तिनापुर का दरबार बना के रख दिया है और द्रोपदी की चीरहरण जारी है।

सुना है की पेंच लगाने का भी ठेका दिया गया है, माननीय लोगों के लिये क्रिकेट की पिच तैयार की गयी है, लोग अब क्रिकेट की प्रैक्टिस करेंगे और अपना कौशल चमकाएंगे। खबर है कि OUDH BAR ने भी क्रिकेट टूर्नामेंट करवाया है, (हो सकता है बार कि तरफ से पैसे भी लुटाये गए होंगे, कोई बात नहीं कोई भी चारण प्रथा को त्यागने को तैयार नहीं है), और न जाने क्या क्या है जो कोर्ट room के उस तरफ हो रहा है और जिसे सीआरपीएफ़ के पहरे में रखा जाता है, कितने ही किस्से कोर्ट कॉरिडॉर में सुनने को मिलते हैं। जाने क्या क्या ...

बार के पदाधिकारी चुन के बार के सदस्यों के लिये कुछ करने के बजाए अधिक से अधिक जजेस कि चाटुकारिता में लगे हुये हैं। मत भूलिए आप हमारे वोट से आए हैं।

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